उदयपुर से लगभग 90 किलोमीटर दूर,पाली ज़िले में अरावली पर्वतमाला के घने जंगलों के बीच माघई नदी के किनारे मौजूद है रणकपुर जैन मंदिर (Ranakpur Jain Temple)। ये सिर्फ एक मंदिर नहीं बल्कि पत्थर पर उकेरी गई एक ऐसी दास्तान है जो सदियों से इंसानी अकीदत और हुनर की गवाह बनी हुई है। 15वीं सदी में बना ये मंदिर भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे शानदार स्थापत्य-स्मारकों में गिना जाता है और जैन धर्म का सबसे बड़ा और सबसे अहम तीर्थस्थल है।
इस मंदिर को देखकर ऐसा महसूस होता है जैसे किसी कारीगर ने संगमरमर के पत्थर पर कढ़ाई की हो। हर पत्थर, हर खंभा, हर गुंबद अपने आप में एक अलग कहानी कहता है। यहां की नक्काशी इतनी बारीक और दिल को मोह लेने वाली है कि देखने वाला उसे देर तक निहारता ही रह जाता है।

मंदिर का इतिहास
संस्कृत ग्रंथ ‘सोम-सौभाग्य काव्य’ और मंदिर परिसर में मिली ताम्रपत्र प्रशस्ति के मुताबिक, ये मंदिर 15वीं सदी के शुरूआत में बनाया गया था। इसका श्रेय धन्ना शाह नाम के एक अमीर व्यापारी और मंत्री को जाता है, जो मेवाड़ के शासक राणा कुंभा के दरबार में एक बड़े पद पर थे। धन्ना शाह पोरवाल समुदाय से थे और घनेराव के रहने वाले थे।
किंवदंती के अनुसार है कि एक रात धन्ना शाह ने ख़्वाब में एक ‘आकाशीय रथ’ देखा। सुबह उठते ही उनके मन में ये इच्छा जागी कि वे उसी आकार का एक मंदिर बनवाएं जो उनके सपने का प्रतीक हो। उन्होंने फौरन राजा राणा कुंभा को अपनी भावना बताई और उनसे मदद मांगी। राजा इस विचार से काफी खुश हुए, लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी कि मंदिर का नाम उनके (राणा के) नाम पर होगा। इस तरह ‘रणकपुर’ नाम पड़ा।

सन् 1394 के आसपास धन्ना शाह ने ऐसे कारीगर की खोज शुरू की जो उनके सपने को पत्थर में उतार सके। कई नामी शिल्पियों ने अपने नक्शे पेश किए, लेकिन कोई भी उनके मन की छवि को पकड़ नहीं पाया। आख़िर में मुंदरा के एक साधारण लेकिन प्रतिभाशाली शिल्पी दीपक (देपा) ने ऐसा नक्शा तैयार किया जो धन्ना शाह के दिल को छू गया।
लगभग 50 सालो की कड़ी मेहनत और हज़ारों कारीगरों के पसीने बहाने के बाद रणकपुर मंदिर बनकर तैयार हुआ। 1496 विक्रम संवत में आचार्य सोमसुंदरसूरी ने विधिवत रूप से मुख्य देवता की प्रतिमा स्थापित की। कहा जाता है कि इस मंदिर के निर्माण पर उस समय लगभग 99 लाख रुपये खर्च हुए थे।
वास्तुकला की बेमिसाल ख़ूबसूरती
ये विशाल मंदिर पूरी तरह से हल्के रंग के संगमरमर से बना है और 48,000 वर्ग फुट से ज़्यादा क्षेत्र में फैला हुआ है। मंदिर परिसर के अंदर कदम रखते ही इंसान अपनी सुध-बुध खो देता है। नक्काशीदार खंभों वाले गलियारों से रोशनी की किरणें छनकर अंदर आती हैं और सुंदर गुंबदों को अपनी गर्माहट से भर देती हैं।
इस मंदिर परिसर में चार मंदिर जो हैं पार्श्वनाथ मंदिर, चौमुखा मंदिर, सूर्य मंदिर और अंबा माता का मंदिर। इनमें चौमुखा मंदिर सबसे ख़ास है। जहां जैन धर्म के पहले तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की मुख्य प्रतिमा विराजमान है।

मंदिर की सबसे ख़़ास बात ये है कि यहां 1,444 नक्काशीदार खंभे हैं, 24 स्तंभित कक्ष हैं, 80 गुंबद हैं जो 400 स्तंभों पर टिके हैं। सबसे हैरानी की बात ये है कि यहां कोई भी दो खंभे एक जैसे नहीं हैं। हर खंभे की डिज़ाइन अलग है। इसी वजह से इस मंदिर को ‘खंभों का खज़ाना’ भी कहा जाता है।
मंदिर के पांच शिखर हैं, जिनमें से सबसे बड़े शिखर के नीचे भगवान आदिनाथ की छह फुट ऊंची प्रतिमा है। एक और ख़ास नक्काशी है। भगवान आदिनाथ की चार मुखों वाली प्रतिमा, जिसे 108 मुखों वाला सर्प अपनी अनेक पूंछों से ढके हुए है। ये चार मुख चारों दिशाओं की ओर हैं, जो तीर्थंकरों की सर्वव्यापी खोज का प्रतीक हैं।

मंदिर की छत पर ज्यामितीय डिज़ाइन और बेल-बूटों की नक्काशी की गई है। लेकिन सबसे ज़्यादा मंत्रमुग्ध करती हैं वे अप्सराओं और देवियों की मूर्तियां जो लगभग 45 फुट की ऊंचाई पर वाद्य यंत्र बजाती हुई दिखाई देती हैं।
मंदिर के आंगन में निकलते ही पूरी इमारत की बाहरी ख़ूबसूरती देखते ही बनती है। हर इंच पर बारीक नक्काशी है, और ऊंची छत जो अपने आप में जादू है।
आरती का नज़ारा
सूर्यास्त के बाद रणकपुर मंदिर में दीयों की कतारें जगमगा उठती हैं। मुख्य मंदिर में होने वाली संध्या आरती के लिए पुजारी हर शाम तैयारी करते हैं। ये दैनिक कार्यक्रम देखने लायक होता है।

मंदिर से जुड़े चार महान व्यक्तित्व
इस मंदिर का निर्माण चार महान भक्तों के सपनों और प्रयासों का परिणाम है। आचार्य सोमसुंदरसूरी, मंत्री धन्ना शाह, राणा कुंभा, और सबसे बढ़कर शिल्पी दीपक (देपा), जिसने इस सपने को साकार किया।
आचार्य सोमसुंदरसूरी 15वीं सदी के विक्रम संवत के एक बहुत ही प्रभावशाली शख्स थे। धन्ना शाह ने उनसे गहरी आध्यात्मिक प्रेरणा पाई। धन्ना शाह ने 32 साल की आयु में शत्रुंजय (जैन तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ) की यात्रा के दौरान आजीवन ब्रह्मचर्य का कठोर व्रत लिया था। अपने तेज़ दिमाग, प्रशासनिक क्षमता और नेतृत्व के गुणों की वजह से वो राणा कुंभा के दरबार में ऊंचे पद तक पहुंचे।
दीपक स्वभाव से लापरवाह और शानदार कलाकार थे। उन्हें गुलामी से गरीबी पसंद थी। वे अपनी कला को बहुत ऊंचा सम्मान देते थे। धन्ना शाह के नेक और भक्तिभाव वाले व्यक्तित्व से वे गहराई से प्रभावित हुए और उन्होंने वादा किया कि वे ऐसा मंदिर बनाएंगे जो मंत्री के सपने को साकार करेगा। इस तरह कला और भक्ति का एक दुर्लभ संगम हुआ।

राणा कुंभा ने न सिर्फ मंदिर के लिए भूमि दी, बल्कि धन्ना शाह को मंदिर के पास एक नगर बसाने की भी सलाह दी। नगर का नाम राणा कुंभा के नाम पर ‘रणपुर’ रखा गया, जो बाद में ‘रणकपुर’ के नाम से फेमस हुआ।
एक किंवदंती के अनुसार, शिल्पी दीपक ने नींव रखते समय धन्ना शाह की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए उनसे सात कीमती धातुएं, मोती, बहुमूल्य रत्न, कस्तूरी और दूसरे सुगंधित पदार्थ चढ़ाने को कहा। मंदिर की जटिलता और विशालता के बावजूद इसकी स्थापत्य संतुलन और समरूपता में जरा भी कमी नहीं आई।
मंदिर के मुख्य गर्भगृह में भगवान आदिनाथ की चार विशाल सफेद संगमरमर की प्रतिमाएं हैं, जो लगभग 72 इंच ऊंची हैं और चारों दिशाओं की ओर स्थापित हैं। दूसरी और तीसरी मंजिल के मंदिरों में भी चार समान प्रतिमाएं हैं। इन चार प्रतिमाओं के कारण ही इसे ‘चतुर्मुख जैन मंदिर’ कहा जाता है। इस मंदिर को ‘धरण विहार’, ‘त्रैलोक्य दीपक प्रसाद’ और ‘त्रिभुवन विहार’ भी कहा जाता है।
नक्काशी: पत्थर में जान डालती कारीगरी
मंदिर परिसर में 76 छोटे गुंबदनुमा मंदिर, चार रंगमंडप (सभा कक्ष), चारों दिशाओं में स्थित चार महाधर प्रसाद और 84 देवकुलिकाएं (उपमंदिर) हैं। ये सभी मंदिर की शोभा बढ़ाते हैं।
चार सुंदर मेघनाद-मंडप अपनी मूर्तिकला सुंदरता के लिए जाने जाते हैं। इनके 40 फुट ऊंचे खंभों पर बारीक नक्काशी है। कलात्मक तोरण (बंदनवार) मानो रत्नों से जड़े आभूषण हों, और शानदार गुंबद जिसमें बारीक नक्काशीदार लटकन है। सब कुछ आंखों को बांध लेता है।
मंदिर के गुंबदों और छतों पर अनेक ऐतिहासिक घटनाओं को दिखाती नक्काशी है। कलाकारों ने अपनी छेनी के जादुई छू से उनमें जान और शक्ति डाल दी है। सहस्रफणा (हज़ार फनों वाला सर्प), पार्श्वनाथ और सहस्रकूट को दर्शाती पत्थर की पट्टियां भी उतनी ही प्रभावशाली हैं।

मंदिर की सबसे बड़ी ख़ासियत है इसके अनगिनत खंभे। इसे ‘खंभों का खजाना’ या ‘खंभों का शहर’ कहा जा सकता है। जिधर भी देखो बड़े, छोटे, चौड़े, पतले, नक्काशीदार या सादे खंभे ही खंभे नजर आते हैं। लेकिन कुशल शिल्पी ने उन्हें इस तरह व्यवस्थित किया है कि कोई भी खंभा तीर्थयात्री के भगवान के दर्शन में बाधा नहीं डालता। मंदिर के किसी भी कोने से भगवान की प्रतिमा आसानी से देखी जा सकती है।
मंदिर के उत्तर में एक रायण वृक्ष (मिमोसा लैक्सेंड्रा) और संगमरमर की शिला पर भगवान ऋषभदेव के पदचिह्न हैं। ये भगवान ऋषभदेव के जीवन और उपदेशों और शत्रुंजय (जैन तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ) की याद दिलाते हैं।
आबू की नक्काशी और रणकपुर की अनोखी वास्तुकला
माउंट आबू के जैन मंदिर अपनी नक्काशी के लिए फेमस हैं, लेकिन रणकपुर मंदिर भी अपनी बारीक नक्काशी में किसी से पीछे नहीं है। लोगों में एक कहावत प्रचलित है कि ‘आबू की नक्काशी और रणकपुर की वास्तुकला अनोखी है।’
वक्त के थपेड़ों, प्रकृति के प्रकोप और विदेशी आक्रमणकारियों के विनाशकारी हमलों ने इस पवित्र तीर्थस्थल को बहुत नुकसान पहुंचाया। लंबे समय तक ये उजाड़ पड़ा रहा क्योंकि तीर्थयात्रियों को जंगली जानवरों और डाकुओं से भरे इस सुनसान इलाके में जाना सुरक्षित नहीं लगता था।

1897 ईस्वी (विक्रम संवत 1953) में सादरी की पूरी श्री संघ (जैन समाज) ने इस तीर्थस्थल का प्रशासन शेठ आनंदजी काल्याणजी ट्रस्ट (पेढ़ी) को सौंप दिया। प्रबंधन संभालते ही पेढ़ी ने तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाएं जुटाने और जंगली जानवरों के ख़तरे से सुरक्षा प्रदान करने का काम शुरू कर दिया। फिर मंदिर के जीर्णोद्धार का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम शुरू हुआ। विक्रम संवत 1990 में शुरू हुआ जीर्णोद्धारकाम ग्यारह सालों तक चला और 2001 में पूरा हुआ।
जिन कलाकारों ने इस पुरानी संरचना पर छेनी चलाई, उन्होंने इसे इतनी बारीक सुंदरता दी कि दुनिया के फेमस वास्तुकारों और मूर्तिकारों ने इसे दुनिया के अजूबों में से एक कहकर खूब सराहा है। हर साल दुनिया भर से हज़ारों कला-प्रेमी और आध्यात्मिक साधक इस रमणीय स्थल पर आते हैं।
भारत की सांस्कृतिक विरासत और अनोखी वास्तुकला का संगम
रणकपुर मंदिर की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि इसे दिव्य विमान ‘नलिनीगुल्म’ के रूप में कल्पना की गई थी। और जब वो कल्पना साकार हुई, तो उसमें ऐसी रोशनी आ गई कि देखने वाला खुद को एक सपनों की दुनिया में पाता है।

ये मंदिर भारत की सांस्कृतिक विरासत, उसकी अनोखी वास्तुकला और उसके पूर्वज कलाकारों की दूरदर्शिता का जीता-जागता प्रमाण है। रणकपुर मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक ऐसी कलाकृति है जो सदियों से इंसानी श्रद्धा, समर्पण और कला साधना की गवाह बनी है। अरावली की हरी-भरी वादियों में बसा ये सफेद संगमरमर का मंदिर आज भी आने वाले हर शख्स को सुकून और आध्यात्मिक शांति का एहसास कराता है।
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