भारत में दशहरा (Dussehra) आते ही रावण के पुतले और आतिशबाज़ी की तस्वीरें सामने आने लगती हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर दशहरे (Bastar Dussehra) की कहानी कुछ अलग है। यहां न रावण का पुतला जलाया जाता है और न ही ये त्योहार सिर्फ़ एक दिन में ख़त्म होता है। यहां दशहरा करीब 75 दिनों तक चलता है। मां दंतेश्वरी की आस्था, आदिवासी तहज़ीब, पारंपरिक रथ और सदियों पुरानी रस्में इसे देश के दूसरे दशहरा पर्वों से अलग बनाती हैं। बस्तर दशहरे (Bastar Dussehra) सिर्फ़ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यहां के लोगों की पहचान, उनकी विरासत और आपसी एकता का जश्न है।
600 साल पुरानी परंपरा
बस्तर दशहरे (Bastar Dussehra) का इतिहास करीब 600 साल पुराना माना जाता है। माना जाता है कि इसकी शुरूआत 15वीं सदी में, लगभग 1408 ईसवी में बस्तर के काकतीय राजवंश के राजा पुरषोत्तम देव के शासनकाल से जोड़ी जाती है। एक पारंपरिक मान्यता के मुताबिक राजा पुरूषोत्तम देव जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर गए थे। वहां उन्होंने भगवान जगन्नाथ को सोना और गहने अर्पित किए।
उनकी भक्ति से प्रभावित होकर उन्हें रथपति की उपाधि दिए जाने की कहानी भी मशहूर है। माना जाता है कि पुरी से लौटने के बाद बस्तर में रथ से जुड़ी परंपराओं को बढ़ावा मिला। समय के साथ ये परंपरा बस्तर की सांस्कृतिक पहचान बन गई। आज भी इस उत्सव में पुराने रीति-रिवाज़ और धार्मिक रस्में उसी आस्था के साथ निभाई जाती हैं।

रावण दहन नहीं, मां दंतेश्वरी की पूजा
बस्तर दशहरे (Bastar Dussehra) की सबसे दिलचस्प बात ये है कि यहां रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है। इसकी वजह ये है कि इस पर्व का केंद्र रामायण में रावण के वध की कहानी नहीं, बल्कि स्थानीय देवी – देवताओं और ख़ास तौर पर मां दंतेश्वरी के प्रति लोगों की अकीदत है। दंतेवाड़ा में तो दंतेश्वरी का मंदिर बस्तर के प्रमुख धार्मिक केंद्रों में से एक है। दशहरे के दौरान देवी से जुड़ी परंपराओं, उनके प्रतीकों और अलग-अलग इलाकों से आने वाले देवी-देवताओं का ख़ास महत्व होता है। इस तरह बस्तर दशहरे (Bastar Dussehra) दिखाता है कि भारत में एक ही त्योहार अलग-अलग इलाकों में अपनी ख़ास पहचान और मान्यताओं के साथ मनाया जाता है।
हरियाली अमावस्या से होती है शुरुआत
करीब 75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत श्रावण महीने की हरियाली अमावस्या से होती है। पहली अहम रस्म है ‘पाट जात्रा’। इसमें रथ बनाने के लिए जंगल से लकड़ी लाई जाती है और पूरे रीति-रिवाज़ के साथ उसकी पूजा की जाती है। इसके बाद पारंपरिक रथ बनाने का काम शुरू होता है। स्थानीय कारीगर अपने हुनर से लकड़ी का रथ तैयार करते हैं। इस काम में साल की लकड़ी का खास इस्तेमाल होता है।
रथ बनाना केवल कारीगरी नहीं, बल्कि बस्तर की सामूहिक मेहनत और आस्था का भी प्रतीक है। इसके बाद काछिन गादी, जोगी बिठाई और मावली परघाव जैसी रस्में निभाई जाती हैं। काछिन गादी में काछिन देवी की पूजा होती है। वहीं, जोगी बिठाई में एक व्यक्ति के नौ दिनों तक योग की मुद्रा में बैठने की परंपरा है।

जब पूरा बस्तर एक साथ आता है
बस्तर दशहरे (Bastar Dussehra) के दौरान अलग-अलग गांवों और इलाकों से देवी-देवताओं के प्रतीक, पालकियां और छतरियां जगदलपुर पहुंचती हैं। मां मावली का पारंपरिक स्वागत भी इस उत्सव का अहम हिस्सा है। रथ यात्रा के दौरान स्थानीय लोग मिलकर पारंपरिक रथ खींचते हैं। लोक संगीत, पारंपरिक वाद्य यंत्र और धार्मिक गीत पूरे माहौल को खास बना देते हैं। भीतर रैनी, बाहर रैनी और निशा जात्रा जैसी रस्में भी इस लंबे उत्सव का हिस्सा हैं।
इस दौरान बस्तर की आदिवासी तहज़ीब खुलकर सामने आती है। यहां के अलग-अलग समुदाय अपनी परंपराओं के साथ इस आयोजन में हिस्सा लेते हैं। यही वजह है कि बस्तर दशहरे (Bastar Dussehra) किसी एक शहर या गांव का नहीं, बल्कि पूरे इलाके की साझा विरासत का पर्व बन जाता है।
मुरिया दरबार: जहां सुनी जाती थी लोगों की बातें
बस्तर दशहरे (Bastar Dussehra) के आख़िरी दौर में मुरिया दरबार का आयोजन होता है। पुरानी परंपरा में ये ऐसा मंच था, जहां मुरिया जनजाति समेत अलग-अलग समुदायों के प्रतिनिधि और मांझी-मुखिया अपनी परेशानियां और सामुदायिक मुद्दे रखते थे। राजा की मौजूदगी में लोगों की बातें सुनने की ये परंपरा बस्तर की सामाजिक ज़िंदगी का अहम हिस्सा थी। आज ये परंपरा आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था के साथ नए रूप में जारी है। मुरिया दरबार इस बात की याद दिलाता है कि बस्तर दशहरा केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि लोगों को एक साथ लाने और उनकी आवाज़ सुनने का ज़रिया भी रहा है।

बस्तर दशहरे (Bastar Dussehra) की असली खूबसूरती इसकी लंबी अवधि या भव्य रथ में ही नहीं, बल्कि उन लोगों में है जो पीढ़ियों से इस परंपरा को ज़िंदा रखे हुए हैं। मां दंतेश्वरी में अकीदत, आदिवासी संस्कृति, कारीगरों का हुनर और समुदायों की साझेदारी इसे एक अनोखा रंग देते हैं। बस्तर दशहरे (Bastar Dussehra) एक ऐसा पर्व है, जहां इतिहास सिर्फ़ याद नहीं किया जाता, बल्कि हर साल रस्मों, रिवाज़ों और लोगों की भागीदारी के साथ जिया भी जाता है।
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