उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ शख़्सियत ऐसी हैं जो अपने उस्ताद की रिवायत को आगे बढ़ाने के लिए याद किए जाते हैं। नूह नारवी उन्हीं में से एक हैं। उनका पूरा नाम मुहम्मद नूह था और वो “नूह” तख़ल्लुस के साथ शायरी करते थे। वो दाग़ देहलवी के शागिर्द थे, और दाग़ के इंतिक़ाल के बाद उनके जानशीन (उत्तराधिकारी) के तौर पर पहचाने गए।
पैदाइश और बचपन
नूह नारवी की पैदाइश सितंबर 1878 या 1879 में उत्तर प्रदेश के नारा (इलाहाबाद के क़रीब एक छोटे-से क़स्बे) में हुई। एक ही किताब में कई जगह तारीख़ और जगह को लेकर अलग-अलग बातें मिलती हैं। कहीं रायबरेली लिखा है, तो कहीं नारा। इसलिए इस बारे में तस्दीक़ ज़रूरी है। कहा जाता है कि उनके वालिद मौलवी अब्दुल मज़ीद एक जागीरदार थे।
नूह अभी 4 साल के भी नहीं हुए थे कि वालिद का साया सर से उठ गया। इसके बाद सौतेली मांओं की आपसी रंजिश ने जागीर को मुसीबतों का घर बना दिया और उनकी तालीम पर भी इसका असर पड़ा। फिर भी उन्होंने अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी में महारत हासिल की। उन्होंने अदब का सफ़र नस्र (गद्य) से शुरू किया और बाद में पाबंदी से शेर कहने लगे।
बरसों रहे हैं आप हमारी निगाह में
ये क्या कहा कि हम तुम्हें पहचानते नहीं
दाग़ की शागिर्दी
नूह ने अपनी शायरी में वही ज़बान की सादगी, रवानी और बांकपन रखने की कोशिश की जो दाग़ की पहचान थी। रोज़मर्रा के आसान लफ़्ज़ों में दिल की बात कहना उनका हुनर था। उनकी ग़ज़ल में इश्क़, इंतिज़ार, जुदाई और दर्द के रंग मिलते हैं, लेकिन ज़बान की शाइस्तगी और वक़ार कभी हाथ से नहीं जाता।
आज आएंगे कल आएंगे कल आएंगे आज आएंगे
मुद्दत से यही वो कहते हैं मुद्दत से यही हम सुनते हैं
नाम के साथ खेल
नूह की ख़ास बात यह भी है कि उन्होंने अपने तख़ल्लुस को शायरी और किताबों के नामों में बड़ी ख़ूबसूरती से बरता। उनके मजमूओं के नाम देखिए: सफ़ीन-ए-नूह (नूह की कश्ती), तूफ़ान-ए-नूह और एजाज़-ए-नूह। हज़रत नूह की कश्ती और तूफ़ान की मिसाल उनके कलाम में बार-बार नज़र आती है।
इश्क़ में कुछ नज़र नहीं आया
जिस तरफ़ देखिए अंधेरा है
शायरी का रंग
उनके कलाम में मोहब्बत, इंतिज़ार, जुदाई और मुसीबतों का ज़िक्र मिलता है। उनके कुछ अशआर आज भी ज़बान-ज़द हैं, जैसे “इश्क़ में कुछ नज़र नहीं आया” वाला शेर, जिसमें इश्क़ की बेख़ुदी को अंधेरे से जोड़ा गया है। इसी तरह “आज आएंगे, कल आएंगे” वाला शेर वादा-ख़िलाफ़ी और इंतिज़ार की कैफ़ियत को बड़े सादा अंदाज़ में बयान करता है। “महफ़िल में तेरी आ के यूं बे-आबरू हुए” वाला शेर भी लोगों की ज़बान पर चढ़ा हुआ है।
दोस्ती को बुरा समझते हैं
क्या समझ है वो क्या समझते हैं
वफ़ात और विरासत
नूह नारवी का इंतिक़ाल 1962 में हुआ। आज भी उर्दू अदब के हलक़ों में उनका नाम इज़्ज़त से लिया जाता है। उन्होंने साबित किया कि क्लासिकी रिवायत को ज़िंदा रखते हुए भी अपनी अलग आवाज़ पैदा की जा सकती है। उनकी शायरी में लफ़्ज़ों की सफ़ाई, जज़्बात की गहराई और ज़बान का वक़ार, तीनों एक साथ मिलते हैं।
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