सोचिए, एक ऐसा दौर जब औरत का किताब छूना गुनाह था। जहां माना जाता था कि अगर लड़की पढ़-लिख गई, तो उसके पति की मौत हो जाएगी और घर पर आफत आ जाएगी। उस ज़माने में बंगाल की एक बहू ने चुपचाप, चूल्हे की राख में छिपाकर, अपने बच्चे की तख्ती और पति के धर्मग्रंथ का पन्ना मिलाकर अक्षर पहचानना शुरू किया। ये कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि रससुंदरी देवी (Rassundari Devi) की हकीकत है, जिन्हें भारत की पहली महिला आटोबायोग्राफर (India’s first female autobiographer) होने का ताज मिला हुआ है।
गुलामी की ज़ंजीर में जकड़ी ज़िंदगी
1809 के आसपास पोटाजिया गांव (आज का बांग्लादेश) में जन्मी रससुंदरी की शादी सिर्फ़ बारह साल की उम्र में एक अमीर ज़मींदार परिवार में कर दी गई थी। उस वक़्त बंगाल के कुलीन घरों में औरतों की तालीम को ‘अपशकुन’ समझा जाता था। मान्यता थी कि पढ़ने-लिखने वाली औरतें ‘विधवा’ हो जाती हैं या परिवार पर कहर टूटता है। रससुंदरी की ज़िंदगी भी रसोई, बच्चों और घर के कामों में कैद हो गई। उन्होंने बारह बच्चों को जन्म दिया, लेकिन उनके अंदर एक हसरत थी-धर्मग्रंथ पढ़ने की, ईश्वर को समझने की।
चूल्हे की राख में छिपा ‘जुर्म’
जब वो 26 साल की थीं, तब एक सपने ने उन्हें झकझोरा। उन्होंने तय किया कि चाहे जो हो जाए, वो पढ़ना सीखेंगी। लेकिन सवाल ये था सिखाएगा कौन? तो उन्होंने खुद ही रास्ता निकाला। उन्होंने अपने पति की ‘चैतन्य भागवत’ का एक पन्ना चुपके से फाड़ लिया और अपने बेटे की तख़्ती (जिस पर वो अक्षर लिखता था) उठा ली। इन दोनों चीज़ों को उन्होंने रसोई के चूल्हे के पास, राख में छिपा दिया।
जब घर के लोग सो जाते या रसोई खाली होती, वो राख से पन्ना निकालती, तख्ती पर लिखे अक्षरों से मिलान करती और धीरे-धीरे अक्षर पहचानने लगती। ये सिलसिला सालों तक चला। बाद में उन्होंने कोयले से काली की हुई रसोई की दीवारों पर उंगली से अक्षर लिखने की प्रैक्टिस शुरू की। ये कोई आसान काम नहीं था। एक तरफ़ घर की ‘सख्त पाबंदियां’ थीं, दूसरी तरफ़ पढ़ने की ‘दीवानगी’।

जब किताब बनी ‘आमार जीबन’
सालों की मेहनत के बाद रससुंदरी ने सिर्फ़ पढ़ना ही नहीं, बल्कि लिखना भी सीख लिया। उन्होंने अपनी आपबीती को कागज़ पर उतारा। 1876 में उनकी किताब ‘आमार जीबन’ (मेरी ज़िंदगी) प्रकाशित हुई। ये सिर्फ़ एक किताब नहीं थी बल्कि ये बंगाली भाषा की पहली पूरी आत्मकथा थी, और भारत में किसी महिला द्वारा लिखी गई पहली आत्मकथाओं में से एक थी। इसमें उन्होंने बड़ी बेबाकी से अपनी क़ैद, अपनी तड़प और अपनी जीत को लिखा। उन्होंने लिखा-आहा! क्या अफ़सोस की बात है। मेरी तरह औरतें चोरों की तरह क़ैद रहती हैं, क्या इसीलिए उन्हें विद्या सीखने से रोका जाता है?’।
आज भी क्यों मायने रखती है ये कहानी?
रससुंदरी देवी की कहानी सिर्फ़ एक औरत के पढ़ने की कहानी नहीं है। ये ‘हौसले’ की कहानी है कि कैसे एक औरत ने अपने ही घर में, अपने ही लोगों से छिपकर, तालीम हासिल की और दुनिया को दिखा दिया कि औरत का दिमाग़ रसोई तक महदूद नहीं होता। जब समाज उन्हें ‘बेज़ुबान’ रखना चाहता था, तब उन्होंने क़लम उठाई और अपनी ज़ुबान खुद बन गईं। आज भी जब लड़कियों की तालीम पर सवाल उठते हैं, तब रससुंदरी की ये कहानी एक ‘मशाल’ की तरह रास्ता दिखाती है कि हौसला हो तो राख में से भी उम्मीद की किरण निकल ही आती है।
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