बुराई पर अच्छाई की जीत का त्योहार दशहरा नज़दीक है और पूरे हिमाचल प्रदेश में इसकी तैयारियां ज़ोरों शोरों पर हैं। इसी बीच सिरमौर ज़िले के पांवटा साहिब से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो दिल को सुकून देती है। यहां एक मुस्लिम परिवार दशकों से दशहरे के लिए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाता आ रहा है। यह सिलसिला आज भी उसी मोहब्बत और लगन के साथ जारी है।
पीढ़ियों से चला आ रहा हुनर
पुतले बनाने वाले कारीगर मोहम्मद अज़हर और मोहम्मद शादाब बताते हैं कि यह फ़न उन्हें अपने बुज़ुर्गों से विरासत में मिला है। उनके पूर्वजों ने यह काम शुरू किया था और आज उनकी नई पीढ़ी भी इसे पूरी मेहनत से निभा रही है। उनका कहना है कि यह काम उनके लिए सिर्फ़ रोज़ी-रोटी का ज़रिया नहीं है। यह एक ऐसी रिवायत है, जिससे उनके परिवार की कई नस्लों की यादें जुड़ी हैं।

इस साल पांवटा साहिब के दशहरा उत्सव के लिए तीनों पुतले विशाल आकार में तैयार किए जा रहे हैं:
- रावण का पुतला: 50 फीट
- कुंभकर्ण का पुतला: 45 फीट
- मेघनाद का पुतला: 40 फीट
इन्हें बनाने में बांस की खपच्चियों यानी लचीली लकड़ी और रंग-बिरंगे काग़ज़ों का इस्तेमाल हो रहा है। कारीगर दिन-रात जुटे हैं, ताकि दशहरे के दिन ये पुतले अपनी पूरी शान के साथ खड़े नज़र आएं। हर खपच्ची को सलीके से जोड़ा जाता है और हर रंग बड़ी बारीकी से चढ़ाया जाता है। यही मेहनत इन पुतलों को देखने लायक बनाती है।
दशहरे के जश्न के साथ पर्यावरण की फ़िक्र भी
इस बार एक और अच्छी बात यह है कि पुतला दहन के दौरान आतिशबाज़ी में पर्यावरण के अनुकूल पटाखों के इस्तेमाल पर ख़ास ध्यान दिया जा रहा है। इससे त्योहार की रौनक भी बनी रहेगी और हवा-पानी को नुक़सान भी कम होगा। यह सोच बताती है कि परंपरा निभाते हुए भी हम अपनी ज़िम्मेदारियां नहीं भूले हैं।

हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की जीती-जागती मिसाल
पांवटा साहिब की यह दास्तान हमें याद दिलाती है कि त्योहार किसी एक मज़हब या तबके की जागीर नहीं होते। जब एक मुस्लिम परिवार अपने हाथों से दशहरे के पुतले तैयार करता है और हिंदू भाई उन्हें पूरे दिल से अपनाते हैं, तो वहां मज़हब की दीवारें अपने आप छोटी पड़ जाती हैं। यहां न कोई ग़ैर है, न कोई पराया। सब एक ही समाज का हिस्सा हैं, जो एक-दूसरे की ख़ुशियों में शरीक होता है।
हमारा मुल्क हमेशा से गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए जाना जाता रहा है। यहां ईद की सेवइयां हिंदू घरों में भी बंटती हैं और दीवाली के दीये मुस्लिम आंगनों में भी जगमगाते हैं। पांवटा साहिब का यह परिवार उसी साझा विरासत का एक रोशन चेहरा है। इनके हाथों से बने पुतले सिर्फ़ बांस और काग़ज़ के ढांचे नहीं हैं। इनमें भाईचारे, भरोसे और आपसी एहतराम की ख़ुशबू बसी है।
इंसानियत और मोहब्बत का रिश्ता हर फ़र्क़ से बड़ा है। जब हम एक-दूसरे के त्योहारों का सम्मान करते हैं और मिल-जुलकर ख़ुशियां मनाते हैं, तभी हमारी साझा संस्कृति मज़बूत होती है।
दशहरे पर जब रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलेंगे, तो वह बुराई के अंत का प्रतीक होगा। लेकिन उन्हें बनाने वाले हाथों की कहानी हमें यह भी सिखाएगी कि नफ़रत को मिटाने का सबसे अच्छा तरीक़ा मोहब्बत और मेल-जोल ही है।
ये भी पढ़ें: मुजतबा हुसैन: हंसी के पीछे छुपी सच्चाई का बेमिसाल क़लमकार
आप हमें Facebook,Instagram,Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं



