Thursday, October 15, 2026
24.6 C
Delhi

वहीद अख़्तर: शायरी, फ़लसफ़े और इल्म की दुनिया का एक अहम नाम

उर्दू अदब की दुनिया में शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं होती, बल्कि ज़िंदगी, इंसान और समाज को समझने का एक ज़रिया है। सैयद वहीद अख़्तर ऐसी ही एक शख़्सियत थे। वह उर्दू के शायर, लेखक, आलोचक, तक़रीर करने वाले और अपने दौर के अहम मुस्लिम विद्वानों और फ़लसफ़ियों में शुमार किए जाते थे। उनकी शायरी में ज़िंदगी के तजुर्बे, इंसानी कैफ़ियत, समाज की सच्चाइयां और वक़्त के साथ बदलते हालात की झलक दिखाई देती है।

12 अगस्त 1935 को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में पैदाइश, सैयद वहीद अख़्तर का ताल्लुक़ एक ऐसे ख़ानदान से था, जो नसीराबाद से आकर यहां बसा था। उन्होंने अपना बचपन औरंगाबाद में गुज़ारा और शुरुआती तालीम भी यहीं हासिल की। बचपन से ही उनका रुझान पढ़ने-लिखने और शायरी की तरफ़ था। उर्दू अदब से उनकी दिलचस्पी इतनी गहरी थी कि उन्होंने कम उम्र में ही शायरी कहना शुरू कर दिया। अपने शुरुआती दौर में वह ‘बर्क़’ के तख़ल्लुस से भी लिखते थे।

आगे की तालीम के लिए वह हैदराबाद गए और उस्मानिया यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया। हैदराबाद में उन्होंने करीब 8 साल गुज़ारे। इसी दौरान उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और पीएचडी की डिग्री हासिल की। उनकी मेहनत, इल्मी लगन और अदबी दिलचस्पी ने उन्हें एक अलग पहचान दी। पीएचडी पूरी करने के बाद उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लेक्चरर के तौर पर नियुक्त किया गया। इसके बाद अलीगढ़ उनकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गया। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के लंबे अरसे तक यहां तालीम और अदब की ख़िदमत की और 1995 में रिटायर हुए।

वहीद अख़्तर सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि वह अदब को समझने और उसकी गहराइयों तक पहुंचने वाले एक संजीदा आलोचक भी थे। उनकी शख़्सियत में इल्म, शायरी और फ़लसफ़े का ख़ूबसूरत मेल दिखाई देता था। वह अपने दौर के उन लोगों में शामिल थे, जिन्होंने उर्दू अदब को सिर्फ़ जज़्बात के इज़हार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सोचने, सवाल करने और ज़िंदगी को नए नज़रिए से देखने का ज़रिया भी बनाया।

उनकी शायरी की ख़ास बात यह है कि उसमें इंसान के भीतर चलने वाली कशमकश और दुनिया की हक़ीक़त, दोनों साथ-साथ नज़र आती हैं। 

“जो सुनना चाहो तो बोल उठेंगे अंधेरे भी
न सुनना चाहो तो दिल की सदा सुनाई न दे”

इन अशआर में शायर ने बहुत सादगी से इंसान की सोच और उसकी सुनने-समझने की इच्छा को बयान किया है। कभी-कभी ख़ामोशी भी बहुत कुछ कहती है, लेकिन उसे समझने के लिए दिल और दिमाग़ का खुला होना ज़रूरी है। अगर इंसान किसी हक़ीक़त को सुनना ही न चाहे, तो उसके सामने कही गई बात भी बेअसर रह जाती है। यह शेर हमें अपने आसपास की दुनिया को ध्यान से देखने और दूसरों की आवाज़ सुनने का पैग़ाम देता है।

“हज़ारों साल सफ़र कर के फिर वहीं पहुंचे
बहुत ज़माना हुआ था हमें ज़मीं से चले”

यह शेर इंसान के लंबे सफ़र और उसकी तलाश की तरफ़ इशारा करता है। ज़िंदगी में हम अक्सर नए रास्तों की तलाश में आगे बढ़ते हैं, लेकिन कई बार बहुत दूर जाने के बाद एहसास होता है कि जिन सवालों के जवाब बाहर ढूंढ़ रहे थे, उनका रिश्ता हमारी अपनी ज़िंदगी और हमारी जड़ों से भी था।

“तू ग़ज़ल बन के उतर बात मुकम्मल हो जाए
मुंतज़िर दिल की मुनाजात मुकम्मल हो जाए”

यहां ग़ज़ल महज़ शायरी की एक किस्म नहीं, बल्कि दिल की उस ख़्वाहिश का रूप बन जाती है, जो अपने एहसास को मुकम्मल अल्फ़ाज़ देना चाहती है। शायर चाहता है कि उसकी बात इस तरह सामने आए कि दिल की दुआ और इंतज़ार, दोनों को अपना मुकम्मल बयान मिल जाए। यही वह ख़ूबसूरती है, जो उर्दू शायरी को दिल के क़रीब लाती है।

“मिरी उड़ान अगर मुझ को नीचे आने दे
तो आसमान की गहराई में उतर जाऊं”

इन अशआऱ में शायर की सोच की ऊंचाई दिखाई देती है। आम तौर पर इंसान आसमान को बुलंदी की निशानी मानता है, लेकिन वहीद अख़्तर यहां एक दिलचस्प बात कहते हैं। वह सिर्फ़ ऊंचाई तक पहुंचना नहीं चाहते, बल्कि आसमान की गहराई में उतरने की बात करते हैं। यानी उनकी तलाश सतह पर दिखाई देने वाली चीज़ों तक सीमित नहीं है; वह हर हक़ीक़त की तह तक पहुंचना चाहते हैं।

“कल जहां ज़ुल्म ने काटी थीं सरों की फ़सलें
नम हुई है तो उसी ख़ाक से लश्कर निकला”

वहीद अख़्तर ने ग़ज़ल के साथ-साथ मरसिये की परंपरा में भी योगदान दिया। उनकी किताब ‘कर्बला ता कर्बला’ में कर्बला के शहीदों से संबंधित मरसिये शामिल हैं। मरसिया उर्दू अदब की वह विधा है, जिसमें कर्बला की घटना, इमाम हुसैन और उनके साथियों की क़ुर्बानी तथा सब्र और इंसाफ़ जैसे मूल्यों को बयान किया जाता है। इस विधा से उनका जुड़ाव उनकी अदबी दिलचस्पी और कर्बला की परंपरा के प्रति उनके संजीदा नज़रिए को सामने लाता है।

उनके प्रमुख काव्य-संग्रहों में ‘शब का रमज़िया’, ‘पत्थरों का मुग़न्नी’ और ‘ज़ंजीर का नग़्मा’ के नाम लिए जाते हैं। इन रचनाओं के ज़रिये उन्होंने उर्दू शायरी में अपनी अलग पहचान बनाई। इसके अलावा, उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के विभिन्न केंद्रों पर होने वाली बातचीत, चर्चाओं और मुशायरों में भी हिस्सा लिया। रेडियो के ज़रिए उनकी आवाज़ और अदबी विचार लोगों तक पहुंचे।

सैयद वहीद अख़्तर का इंतकाल 13 दिसंबर 1996 को हुआ। उनकी ज़िंदगी का सफ़र भले ही उस दिन ख़त्म हो गया, लेकिन उनकी शायरी और इल्मी योगदान आज भी उर्दू अदब के पाठकों के लिए अहमियत रखते हैं।

वहीद अख़्तर को याद करना एक ऐसे शायर को याद करना है, जिसने अल्फ़ाज़ के ज़रिये इंसान के भीतर की दुनिया को समझने की कोशिश की। उनकी शायरी में कहीं मोहब्बत है, कहीं सवाल, कहीं हौसला और कहीं ज़िंदगी की गहरी फ़लसफ़ियाना सोच।

सैयद वहीद अख़्तर की शायरी हमें याद दिलाती है कि अच्छे अल्फ़ाज़ सिर्फ़ दिल को छूते नहीं, बल्कि सोच के नए दरवाज़े भी खोलते हैं। यही उनकी अदबी विरासत है, जो आने वाली नस्लों को भी उर्दू शायरी की ख़ूबसूरती और उसकी गहराई से रूबरू कराती रहेगी।

ये भी पढ़ें: मुजतबा हुसैन: हंसी के पीछे छुपी सच्चाई का बेमिसाल क़लमकार 

आप हमें Facebook,Instagram,Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब  कर सकते हैं

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

हसन नईम: ग़म को अपनी ताक़त बनाने वाले शायर

हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के...

5,000 घंटे की उड़ान, चार दशक की ख़िदमत: Air Chief Marshal AP Singh का शानदार सफ़र

जब कोई लड़ाकू विमान आवाज़ की रफ़्तार को पार...

मुजतबा हुसैन: हंसी के पीछे छुपी सच्चाई का बेमिसाल क़लमकार

उर्दू अदब में तंज़-ओ-मज़ाह की बात हो और मुजतबा...

Topics

हसन नईम: ग़म को अपनी ताक़त बनाने वाले शायर

हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के...

5,000 घंटे की उड़ान, चार दशक की ख़िदमत: Air Chief Marshal AP Singh का शानदार सफ़र

जब कोई लड़ाकू विमान आवाज़ की रफ़्तार को पार...

मुजतबा हुसैन: हंसी के पीछे छुपी सच्चाई का बेमिसाल क़लमकार

उर्दू अदब में तंज़-ओ-मज़ाह की बात हो और मुजतबा...

Balbir Singh Senior: भारतीय हॉकी को गोल्ड की राह दिखाने वाले

भारतीय हॉकी के इतिहास में जब भी बड़े खिलाड़ियों...

Related Articles

Popular Categories