भारतीय हॉकी के इतिहास में जब भी बड़े खिलाड़ियों का ज़िक्र होगा, बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) का नाम सबसे आगे लिया जाएगा। उन्होंने लगातार तीन ओलंपिक खेलों में भारत को गोल्ड मेडल दिलाने में अहम भूमिका निभाई। ये ओलंपिक खेल थे- 1948 में लंदन, 1952 में हेलसिंकी और 1956 में मेलबर्न। उनकी काबिलियत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1956 के ओलंपिक में वो भारतीय हॉकी टीम के कप्तान भी थे।
बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) का पूरा नाम बलबीर सिंह दोसांझ था और उनके पिता का नाम दलीप सिंह था। उनकी पत्नी का नाम सुशील कौर था। उनकी ज़िंदगी में परिवार से जुड़ी कई मुश्किलें भी आईं। परिवार की ज़िम्मेदारियों को निभाने के साथ-साथ उन्होंने अपनी ज़िंदगी हॉकी के नाम कर दी।
बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) की काबिलियत को पहचानने वालों में कोच हरबैल सिंह का ख़ास स्थान था। वो खालसा कॉलेज से जुड़े एक मशहूर कोच थे। बाद में वो भारतीय हॉकी टीम के कोचिंग स्टाफ़ का हिस्सा बने। उनके मार्गदर्शन में भारतीय टीम ने 1952 और 1956 के ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीते। बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) पंजाब यूनिवर्सिटी की तरफ़ से हॉकी खेलते थे। 1940 के दशक में उन्होंने लगातार तीन बार ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी का ख़िताब जीता। उनकी इन जीतों ने उन्हें देशभर में पहचान दिलाई।

आज़ाद भारत का पहला ओलंपिक गोल्ड मेडल
1948 में लंदन में हुए ओलंपिक खेल बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) के लिए ऐतिहासिक रहे। अर्जेंटीना के ख़िलाफ़ अपने पहले ही ओलंपिक मैच में उन्होंने 6 गोल किए। फाइनल में भारत ने ग्रेट ब्रिटेन को 4-0 से हराया और आज़ाद भारत ने हॉकी में अपना पहला ओलंपिक गोल्ड मेडल जीता। इस फाइनल में भी बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) ने 2 गोल किए। आज़ादी के बाद भारत का पहला ओलंपिक गोल्ड जीतना उनके लिए बेहद ख़ास था।
1952 में हेलसिंकी ओलंपिक के दौरान बलबीर सिंह ने ऐसा शानदार खेल दिखाया, जिसे आज भी याद किया जाता है। नीदरलैंड के ख़िलाफ़ फाइनल में भारत ने 6-1 से जीत हासिल की। इस मैच में बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) ने अकेले 5 गोल किए। पुरुषों की ओलंपिक हॉकी के फाइनल में किसी एक खिलाड़ी के सबसे ज़्यादा गोल करने का ये रिकॉर्ड आज भी कायम है। इस ओलंपिक में उन्हें भारतीय दल का ध्वजवाहक बनने का सम्मान भी मिला।
1956 में मेलबर्न ओलंपिक के दौरान बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) भारतीय हॉकी टीम के कप्तान थे। पूरे टूर्नामेंट में भारतीय टीम ने शानदार प्रदर्शन किया और बिना कोई गोल खाए टोटल 38 गोल किए। फाइनल में भारत ने पाकिस्तान को 1-0 से हराकर गोल्ड मेडल जीता। इस तरह बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) ने लगातार तीसरी बार ओलंपिक गोल्ड मेडल जीतने का कारनामा किया। मेलबर्न ओलंपिक में भी उन्हें भारतीय दल का ध्वजवाहक बनने का सम्मान मिला।

टूटी उंगली, लेकिन हौसला नहीं टूटा
1956 के ओलंपिक के दौरान बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) की एक उंगली में गंभीर चोट लग गई थी। इस चोट की वजह से वो कुछ मैच नहीं खेल पाए, लेकिन सेमीफाइनल और फाइनल में दर्द के बावजूद मैदान पर उतरे। उनकी चोट को विरोधी टीम से छिपाने की भी कोशिश की गई थी। ये दिखाता है कि हॉकी के लिए उनका जज़्बा कितना मज़बूत था और मुश्किल हालात में भी उन्होंने हार नहीं मानी।
खिलाड़ी के तौर पर कामयाबी हासिल करने के बाद बलबीर सिंह ने अपने अनुभव का इस्तेमाल नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को तैयार करने में किया। 1971 के हॉकी वर्ल्ड कप में भी वो भारतीय टीम की कोचिंग से जुड़े रहे। इस टूर्नामेंट में भारत ने ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। इसके बाद आया 1975 का ऐतिहासिक साल। मलेशिया के कुआलालंपुर में हुए हॉकी वर्ल्ड कप में भारत ने पहली बार ख़िताब अपने नाम किया। बलबीर सिंह सीनियर ने टीम के मैनेजमेंट और कोचिंग से जुड़े कामों में अहम भूमिका निभाई। उनके साथ गुरचरण सिंह बोढ़ी भी टीम की तैयारी और कोचिंग से जुड़े थे।

फाइनल में भारत ने पाकिस्तान को 2-1 से हराकर वर्ल्ड कप जीता। भारतीय पुरुष हॉकी टीम का ये अब तक का इकलौता वर्ल्ड कप ख़िताब है। 1975 के वर्ल्ड कप की तैयारी के दौरान बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) की निजी ज़िंदगी में भी कई दुखद घटनाएं हुईं। ट्रेनिंग कैंप शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद उनके पिता बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) का इंतकाल हो गया।
इसी दौरान उनकी पत्नी सुशील कौर को ब्रेन हैमरेज हुआ और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। परिवार में इतने मुश्किल हालात होने के बावजूद बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) भारतीय टीम की तैयारी में जुटे रहे। देश के लिए उनका ये समर्पण उनके मज़बूत इरादों और ज़िम्मेदारी के एहसास को दिखाता है।
पंजाब पुलिस से खेल विभाग तक का सफ़र
बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) ने 1945 में पंजाब पुलिस में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर (ASI) के तौर पर नौकरी शुरू की। वहां रहते हुए उन्होंने पंजाब पुलिस की हॉकी टीम को कई राष्ट्रीय ख़िताब जीतने में मदद की। 1961 में उन्होंने पंजाब पुलिस छोड़कर पंजाब के खेल विभाग में काम करना शुरू किया। यहां उन्होंने डिप्टी डायरेक्टर ऑफ़ स्पोर्ट्स से लेकर डायरेक्टर ऑफ़ स्पोर्ट्स तक की ज़िम्मेदारी संभाली। इस दौरान उन्होंने पंजाब में खेलों को बढ़ावा देने के लिए काम किया। इसी विभाग में उनकी मुलाक़ात और काम का सिलसिला मशहूर एथलीट मिल्खा सिंह के साथ भी रहा।
बलबीर सिंह सीनियर को मिले ख़ास सम्मान
1957 में पद्म श्री: बलबीर सिंह सीनियर खेलों के क्षेत्र में पद्म श्री पाने वाले पहले खिलाड़ी बने।
1982 के एशियाई खेल: नई दिल्ली में हुए एशियाई खेलों में उन्हें मशाल जलाने का सम्मान दिया गया।
2012 में IOC का सम्मान: अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) ने उन्हें दुनिया के 16 महान ओलंपिक खिलाड़ियों में शामिल किया।
2015 में मेजर ध्यानचंद लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड: हॉकी के लिए लंबे समय तक दिए गए उनके योगदान के लिए उन्हें ये सम्मान मिला।
2019 में महाराजा रणजीत सिंह अवॉर्ड: पंजाब सरकार ने खेलों के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें इस अवॉर्ड से सम्मानित किया।

बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) सिर्फ़ मैदान पर खेलने वाले खिलाड़ी ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने किताबों के ज़रिए अपने अनुभव और हॉकी की समझ को अगली पीढ़ी तक भी पहुंचाया। उनकी आत्मकथा The Golden Hat Trick साल 1977 में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद 2008 में उनकी दूसरी किताब The Golden Yardstick: In Quest of Hockey Excellence प्रकाशित हुई। इन किताबों से पता चलता है कि हॉकी उनके लिए सिर्फ़ एक खेल नहीं, बल्कि ज़िंदगी का मक़सद थी।
मैदान पर बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) विरोधी टीम के लिए बड़ी चुनौती थे, लेकिन निजी ज़िंदगी में वो बेहद सादगी से रहते थे और उनमें बिल्कुल घमंड नहीं था। एशियन हॉकी फेडरेशन ने भी उनकी सादगी, मिलनसार स्वभाव, हाज़िरजवाबी और दूसरों के साथ अपना अनुभव बांटने की आदत को ख़ास तौर पर याद किया। 25 मई 2020 को 96 साल की उम्र में चंडीगढ़ में उनका इंतकाल हो गया। उनकी यादों को हमेशा ज़िंदा रखने के लिए मोहाली के अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम का नाम ‘ओलंपियन बलबीर सिंह सीनियर इंटरनेशनल हॉकी स्टेडियम’ रखा गया।
बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Senior) की कहानी सिर्फ़ तीन ओलंपिक गोल्ड मेडल और एक वर्ल्ड कप जीतने तक महदूद नहीं है। ये एक ऐसे खिलाड़ी की कहानी है, जिसने मैदान पर गोल किए, चोट लगने के बावजूद हौसला नहीं खोया और परिवार में मुश्किल हालात होने के बाद भी भारतीय टीम की ज़िम्मेदारी निभाई। खेल से जुड़ी ज़िम्मेदारियों के बाद भी उन्होंने अपना अनुभव अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों तक पहुंचाने का काम किया। जब भी भारतीय हॉकी के सुनहरे दौर की बात होगी, बलबीर सिंह सीनियर का नाम मेजर ध्यानचंद के साथ हमेशा सम्मान से लिया जाएगा। भारतीय हॉकी के इतिहास में उनका नाम हमेशा ज़िंदा रहेगा।
लेख: सुखमिंदर भंगू
इस लेख को पंजाबी में पढ़ें
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