उर्दू अदब की दुनिया में कुछ नाम ऐसे हैं जो शोर-शराबे से दूर रहकर चुपचाप अपना काम करते रहे, और जब वक़्त ने हिसाब लगाया तो पता चला कि उन्होंने अदब को बहुत कुछ दिया। अली अब्बास हुसैनी भी ऐसे ही अदीब थे। उनकी गिनती उर्दू अफ़साने की उस रोशन रिवायत में होती है जिसे “प्रेमचंद स्कूल” कहा जाता है। वे हक़ीक़तपसंद कहानीकार थे, यानी उन्होंने ज़िंदगी को वैसा ही दिखाया जैसी वह है, बिना बनावट और बिना झूठी चमक-दमक के।
पैदाइश और ख़ानदान
अली अब्बास हुसैनी की पैदाइश 3 फ़रवरी 1897 को मौज़ा पारा में हुई, जो उत्तर प्रदेश के ज़िला ग़ाज़ीपुर में पड़ता है। उनके वालिद का नाम सैयद मोहम्मद सालेह था। उस दौर में पढ़ाई-लिखाई का रास्ता आसान नहीं होता था, और हुसैनी साहब का सफ़र भी कई मोड़ों से होकर गुज़रा।
तालीम का सफ़र
हुसैनी साहब की इब्तिदाई तालीम मदरसा सुलेमानिया, पटना में हुई, जहां उन्होंने अरबी ज़बान और दीनियात (धर्मशास्त्र) की पढ़ाई की। इसके बाद उनका दाख़िला मुहम्मडन स्कूल, पटना की छठी जमात में करा दिया गया। लेकिन पटना में रहते हुए वे बीमार पड़ गए और उन्हें ग़ाज़ीपुर लौटना पड़ा। वहां उन्होंने जर्मन मिशन स्कूल की सातवीं जमात में दाख़िला लिया। बाद में वे इलाहाबाद गए, जहां दो साल तक पढ़ने के बाद 1915 में उन्होंने मैट्रिक का इम्तिहान पास किया।
आगे का सफ़र भी मेहनत और लगन की कहानी है। 1917 में उन्होंने क्रिश्चियन कॉलेज से इंटरमीडिएट किया और 1919 में कैनिंग कॉलेज से बी.ए. की डिग्री हासिल की। 1921 में टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, इलाहाबाद से उन्होंने एल.टी. की सनद ली और 1924 में प्राइवेट तौर पर इतिहास में एम.ए. की डिग्री पाई। ग़ौर करने की बात यह है कि बीमारी, शहरों की तब्दीली और मुश्किल हालात के बावजूद उन्होंने पढ़ाई का दामन नहीं छोड़ा। यही लगन आगे चलकर उनके अदबी काम में भी नज़र आती है।
नौकरी और तरक़्क़ी का दौर
तालीम पूरी करने के बाद हुसैनी साहब ने तदरीस (शिक्षण) का पेशा अपनाया। 28 जुलाई 1921 को उनकी तैनाती गवर्नमेंट हाई स्कूल, रायबरेली में अंग्रेज़ी और तारीख़ के उस्ताद के तौर पर हुई। रायबरेली में वे 5 साल रहे। फिर 1927 में उन्हें तरक़्क़ी मिली और तबादला लखनऊ के हवेली कॉलेज में हो गया, जहां उन्होंने पूरे 12 साल गुज़ारे।
इसके बाद वे कानपुर चले गए और वहां से फिर तरक़्क़ी पाकर 1941 में हुसैनाबाद इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल बने। इस तरह उन्होंने तालीम के महकमे में पूरे 37 साल की ख़िदमत की और 30 जून 1954 को प्रिंसिपल के ओहदे से रिटायर हुए। एक उस्ताद के तौर पर उन्होंने न जाने कितने तलबा (विद्यार्थियों) की ज़िंदगी संवारी होगी, और साथ-साथ अपने क़लम से अदब की ख़िदमत भी करते रहे।
प्रेमचंद स्कूल के हक़ीक़तपसंद अफ़सानानिगार
उर्दू अफ़साने की तारीख़ में अली अब्बास हुसैनी का मक़ाम बहुत अहम है। वे प्रेमचंद की रिवायत के कहानीकार थे और उन्होंने मग़रिबी (पश्चिमी) अदब, ख़ासकर वहां के कथा-साहित्य का गहरा मुताला (अध्ययन) किया था। शायद इसी वजह से उनकी कहानियों में क़िस्सा कहने का बहुत उम्दा सलीक़ा मिलता है। उनकी तनक़ीद (आलोचना) भी किसी ख़ास नज़रिये या विचारधारा की पाबंद नहीं थी; वे आज़ाद सोच रखते थे। अफ़साने के अलावा उन्होंने ड्रामे, तनक़ीदी मज़ामीन (आलोचनात्मक लेख) और नावेल में भी अपना हाथ आज़माया।
उनकी कहानियों में इंसानी हमदर्दी, शराफ़त, शर्म-ओ-हया और हस्सासियत (संवेदनशीलता) जैसे अनासिर बार-बार नज़र आते हैं। उनके किरदारों के लिए उनके दिल में दर्द और अपनापन झलकता है, और वे इंसानी जज़्बात को बड़ी नरमी और बारीकी से पकड़ते हैं। तहज़ीब और नेक-नीयती की क़द्र उनके यहां हर जगह महसूस होती है।
उनकी सबसे बड़ी ख़ूबी यह थी कि वे समाज के निचले तबक़े की औरतों के मसाइल (समस्याओं) और उनके फ़ितरी (स्वाभाविक) व नफ़सियाती (मनोवैज्ञानिक) जज़्बात को अपनी कहानियों का मौज़ू (विषय) बनाते थे। जिन औरतों की बात आम तौर पर कोई नहीं सुनता था, हुसैनी साहब ने उनकी आवाज़ को अपने अफ़सानों में जगह दी।
उनकी अहम किताबें
उर्दू में उनके दो मशहूर नावेल हैं: “सर सैयद अहमद पाशा या काफ़ की परी” और “शायद कि बहार आई”। अफ़साने के मजमूओं (कहानी संग्रहों) में “बासी फूल”, “आई.सी.एस.”, “रफ़ीक़-ए-तन्हाई”, “हमारा गांव” और “मेला घूमनी” शामिल हैं, जिनमें “मेला घूमनी” को सबसे ज़्यादा शोहरत मिली।
उनके बहुत से अफ़सानों में से कुछ ख़ास तौर पर पढ़े और सराहे जाते हैं, जैसे “बूढ़ा और बाला”, “बहू की जिंसी” और “रफ़ीक़-ए-तन्हाई”। इनके साथ “चहार टोली” भी है, जो औरतों के मसाइल पर लिखी गई एक अहम कहानी है।
अफ़साने और नावेल के अलावा हुसैनी साहब ने उर्दू नावेल के फ़न और उसके विकास पर भी एक बेहतरीन किताब लिखी, जिसका नाम है “उर्दू नाविल की तारीख़ और तनक़ीद”। यह किताब उर्दू नावेल को समझने वालों के बीच बहुत मशहूर है और आज भी अदब के तालिब-ए-इल्मों के काम आती है।
अली अब्बास हुसैनी की तमाम कहानियों को एक जगह जमा करके कुल्लियात (समग्र संग्रह) की शक्ल दी गई है। इसे नंद किशोर विक्रम ने दो बड़ी जिल्दों (खंडों) में मुरत्तब (संपादित) किया है। यह काम इस बात का सबूत है कि हुसैनी साहब का अदबी सरमाया आज भी अहमियत रखता है।
अली अब्बास हुसैनी एक ऐसे अदीब थे जिन्होंने उस्ताद के तौर पर भी इज़्ज़त कमाई और अफ़सानानिगार के तौर पर भी। उन्होंने न कोई शोर मचाया, न किसी ख़ास नारे के पीछे चले। बस ज़िंदगी को क़रीब से देखा, आम लोगों के दुख-सुख को समझा और उसे सादगी, हमदर्दी और सच्चाई के साथ काग़ज़ पर उतार दिया। ख़ासकर निचले तबक़े की औरतों के जज़्बात को आवाज़ देना उनका वह कारनामा है जिसे उर्दू अदब कभी भुला नहीं सकता।
अगर आप उर्दू कहानी की हक़ीक़तपसंद रिवायत को समझना चाहते हैं, तो अली अब्बास हुसैनी को पढ़ना एक बहुत अच्छा आग़ाज़ हो सकता है।
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