उर्दू अदब और ज़बान की तारीख़ में प्रोफ़ेसर मसऊद हुसैन ख़ां का नाम बड़े अदब और एहतराम से लिया जाता है। वे एक नामवर मुहक़्क़िक़ (शोधकर्ता), तनक़ीदनिगार (आलोचक) और माहिर-ए-लिसानियात (भाषाविद) थे। उन्होंने उर्दू की जो ख़िदमत की, उसे भुलाया नहीं जा सकता।
पैदाइश और तालीम
मसऊद हुसैन ख़ां की पैदाइश उत्तर प्रदेश के क़स्बे क़ायमगंज में हुई। शुरुआती तालीम उन्होंने ढाका (अब बांग्लादेश) में हासिल की। इसके बाद वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पहुंचे, जहां से उन्होंने एम.ए. और पी.एचडी. की डिग्रियां लीं। इल्म की प्यास अभी बुझी नहीं थी, इसलिए वे यूरोप गए और पेरिस यूनिवर्सिटी से भाषाविज्ञान में डी.लिट. की डिग्री हासिल की।
तुझे बहार मिली मुझ को इंतिज़ार मिला
इस इंतिज़ार में लेकिन किसे क़रार मिला
नौकरी और तदरीस का सफ़र
हिंदुस्तान लौटकर उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में काम किया, लेकिन यह काम उनके दिल को नहीं भाया। उनकी असली दिलचस्पी पढ़ाने में थी। रेडियो की नौकरी छोड़कर वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग में लेक्चरर बने। कुछ वक़्त बाद उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के उर्दू विभाग में प्रोफ़ेसर हो गए। फिर अलीगढ़ लौटे और भाषाविज्ञान विभाग के पहले प्रोफ़ेसर और सदर (विभागाध्यक्ष) बने।
तिरे ख़याल में दिल आज सोगवार सा है
मुझे गुमान है कुछ उस को इंतिज़ार सा है
उनकी क़ाबिलियत की क़द्र दूर-दूर तक हुई। वे अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया और श्रीनगर की कश्मीर यूनिवर्सिटी में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर भी रहे। साल 1973 में उन्हें जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली का वाइस चांसलर बनाया गया। वहां से रिटायर होने के बाद वे जामिया उर्दू, अलीगढ़ के मानद कुलपति रहे और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के भाषाविज्ञान विभाग में प्रोफ़ेसर एमेरिटस के ओहदे पर रहे। बाक़ी ज़िंदगी उन्होंने अलीगढ़ में रहकर लिखने-पढ़ने में गुज़ारी।
शायरी और तसनीफ़ात
मसऊद हुसैन ख़ां सिर्फ़ आलिम ही नहीं, शायर भी थे। उनके दो शेरी मजमूए (काव्य संग्रह) हैं: “रूप बंगाल” और “दो नीम”। “रूप बंगाल” का हिंदी तर्जुमा भी छप चुका है। इसके अलावा “बिकट कहानी”, “आशूरा नामा” और “मसनवी कदम राव पदम राव” जैसी पुरानी तहरीरों को वैज्ञानिक उसूलों के मुताबिक़ संपादित करके उन्होंने बड़ा काम किया।
तिरे दयार में कोई भी हम-ज़बां न मिला
हज़ार नक़्श मिले कोई राज़दां न मिला
हैदराबाद में रहते हुए उन्होंने “क़दीम उर्दू” नाम का तहक़ीक़ी रिसाला निकाला। इसका मक़सद था कि पुरानी किताबों को जदीद (आधुनिक) उसूलों के साथ छापा जाए। उन्होंने एक लुग़त (शब्दकोश) तैयार करने का काम भी किया।
उनकी कुछ अहम किताबें ये हैं:
इक़बाल की नज़री-ओ-अमली शेरियात: इसमें अल्लामा इक़बाल की शायरी को भाषाविज्ञान की रोशनी में परखा गया है।
शेर-ओ-ज़बान, उर्दू ज़बान-ओ-अदब और उर्दू का अलमिया: ये मज़ामीन (लेखों) के मजमूए हैं, जिनमें भाषाविज्ञान हर जगह बुनियादी हैसियत रखता है।
मुक़द्दमा तारीख़-ए-ज़बान उर्दू: यह उनका सबसे बड़ा कारनामा माना जाता है। इसमें उर्दू की पैदाइश और तरक़्क़ी पर दलील के साथ बहस की गई है।
एज़ाज़ और मक़ाम
उनकी इल्मी और अदबी ख़िदमात की क़द्र करते हुए उन्हें 1984 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से नवाज़ा गया।
तेरे खोने का किस क़दर ग़म है
आज आलम तमाम मुबहम है
प्रोफ़ेसर मसऊद हुसैन ख़ां ने साबित किया कि ज़बान सिर्फ़ बोलचाल का ज़रिया नहीं, बल्कि एक पूरी तहज़ीब की तारीख़ है। उन्होंने उर्दू को तहक़ीक़ और भाषाविज्ञान की मज़बूत बुनियाद दी। आज भी उर्दू के तालिब-ए-इल्म और अदब के शौक़ीन उनकी किताबों से रोशनी हासिल करते हैं।
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