क़बीलाई समाज हमेशा प्रकृति के सबसे क़रीब रहा है। वो धरती मां की नेमतों को पूजता है, उनकी हिफ़ाज़त करता है और अपनी ज़िंदगी उसी के इर्द-गिर्द बसाता है। महाराष्ट्र और गुजरात, दादरा-नगर हवेली और दमन-दीव के इलाक़ों में बसने वाला वर्ली ट्राइब (Warli tribe) इसका एक ज़िंदा सबूत है। इनकी मशहूर वर्ली पेंटिंग्स (Warli paintings) दीवारों पर उकेरी गई वो अनोखी दास्तानें हैं, जो सिर्फ़ काली-सफ़ेद रंगों और बुनियादी जियोमेट्रिकल डिजाइन से बनी हैं। ये सादा लेकिन गहरी पेंटिंग्स देखने वाले को एक अलग ही दुनिया में ले जाती हैं जैसे इनमें कोई जान हो।

हज़ारों साल पुरानी विरासत
वर्ली पेंटिंग्स की तारीख़ बहुत पुरानी है। माना जाता है कि इसका आग़ाज़ 10,000 ईसा पूर्व में हुआ था। भीमबेटका की रॉक शेल्टर्स (Bhimbetka Rock Shelters) में इन्हीं पेंटिंग्स की झलक मिलती है। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि वर्ली लोग वरलात के बाशिंदों की नस्ल हैं, जिनका ज़िक्र यूनानी इतिहासकार मेगस्थनीज़ (The Greek historian Megasthenes) ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में किया था। ये इलाक़ा आज के धरमपुर (महाराष्ट्र) के क़रीब था। यानी वर्ली क़बीला कम से कम 2,300 सालों से यहां रह रहा है और उनकी कला उनकी पहचान बन चुकी है।

रीति-रिवाज और परंपराएं
वर्ली पेंटिंग्स दरअसल इबादत का हिस्सा हैं। इनमें लकीरें, नुक़्ते, तिकोन, गोले, चौकोर और आयत जैसी आसान आकृतियों से रोज़मर्रा की ज़िंदगी के मंज़र बनाए जाते हैं। ये पेंटिंग्स त्योहारों, फ़सल कटाई और शादी जैसे मौक़ों पर दीवारों पर बनाई जाती हैं। ये क़बीले की ज़िंदगी, उनके गांव, देवता, जानवर, रस्म-रिवाज और फ़ितरत से जुड़ाव की सच्ची तस्वीर होती हैं।

इन्हें बनाने का तरीक़ा भी बड़ा दिलचस्प है। सबसे पहले लिपाने में दीवार पर गेरू की तह चढ़ाई जाती है। फिर गोबर और पानी का घोल फैला कर सफ़ेद बेस तैयार की जाती है। सफ़ेद रंग पीठा चा रंग यानी चावल के पाउडर के पेस्ट से बनता है। आख़िर में लिहाने में बांस की कड़ी (सलातीची काडी) से बने ब्रश से पेंटिंग उकेरी जाती है।
आज के महाराष्ट्र में वर्ली
आज वर्ली पेंटिंग्स काग़ज़, किताबों के कवर, स्टेशनरी, फ़र्नीचर, आईने, लकड़ी के फ़्रेम, हाथी-दांत और कपड़ों पर भी बनाई जाती हैं। ये महाराष्ट्र की संस्कृति का अहम हिस्सा हैं और घरों को एक मिट्टी जैसी सादगी और रूहानी नूर बख़्शती हैं। 2014 में वर्ली पेंटिंग्स को जियोग्राफ़िकल इंडिकेशन (GI) का दर्जा मिला, जो उनकी असलियत और क़बीले की विरासत का ऐतराफ़ है।

आज महाराष्ट्र के शॉपिंग सेंटर्स में ये आसानी से मिल जाती हैं। तो अगली बार जब आप महाराष्ट्र जाएं, तो ये असली वर्ली पेंटिंग्स ज़रूर ख़रीदें और अपने घर को एक अनोखी ख़ूबसूरती से सजाएं।
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