उर्दू शायरी की तारीख़ में कुछ नाम ऐसे हैं जो कम उम्र में दुनिया से रुख़्सत हो गए, मगर अपने पीछे ऐसी आवाज़ छोड़ गए जो आज भी सुनाई देती है। मुस्तफ़ा ज़ैदी उन्हीं में से एक हैं। उनका पूरा नाम सैयद मुस्तफ़ा हसनैन ज़ैदी था। वे 10 अक्टूबर 1930 को पैदा हुए और 12 अक्टूबर 1970 को, अपनी चालीसवीं सालगिरह के सिर्फ़ दो दिन बाद, कराची में इस दुनिया से चले गए।
इन्हीं पत्थरों पे चल कर अगर आ सको तो आओ
मिरे घर के रास्ते में कोई कहकशां नहीं है
शुरुआती ज़िंदगी और नौकरी
ज़ैदी साहब का बचपन और शुरुआती दौर हिंदुस्तान में गुज़रा। शायरी की दुनिया में वे पहले “तेग़ इलाहाबादी” के नाम से मशहूर हुए। तक़सीम के बाद जब वे पाकिस्तान गए, तो यही नाम बदलकर मुस्तफ़ा ज़ैदी हो गया।
मैं किस के हाथ पे अपना लहू तलाश करूं
तमाम शहर ने पहने हुए हैं दस्ताने
वे सिर्फ़ शायर नहीं थे। 1954 में उन्होंने सी.एस.एस. का मुक़ाबले का इम्तिहान पास किया और तरबियत के लिए इंग्लैंड भेजे गए। वापस आकर वे डिप्टी कमिश्नर और डिप्टी सेक्रेटरी जैसे ओहदों पर रहे। उनकी शादी वेरा नाम की एक जर्मन ख़ातून से हुई, जिनसे उनका एक बेटा और एक बेटी हुई। जून 1970 में जनरल याह्या ख़ान की हुकूमत ने उन्हें अड़तीस दूसरे सी.एस.पी. अफ़सरों के साथ नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया। यह उनकी ज़िंदगी का बहुत बड़ा सदमा था।
दिल के रिश्ते अजीब रिश्ते हैं
सांस लेने से टूट जाते हैं
शायरी का सफ़र
ज़ैदी साहब ने बहुत छोटी उम्र में लिखना शुरू कर दिया था। 17 साल की उम्र में उनका पहला मजमुआ “ज़ंजीरें” (1949) छपा। इसके बाद उनके ये संग्रह आए:
- रौशनी (1950)
- शहर-ए-आज़र (1958)
- मौज मेरी सदफ़ सदफ़ (1960)
- गरेबान (1964)
- क़बा-ए-साज़ (1967)
- कोह-ए-निदा (1971, मौत के बाद प्रकाशित)
उनका पूरा कलाम “कुल्लियात-ए-मुस्तफ़ा ज़ैदी” के नाम से भी शाया हुआ।
इश्क़ इन ज़ालिमों की दुनिया में
कितनी मज़लूम ज़ात है ऐ दिल
शुरुआत में उनकी शायरी रूमानी रंग लिए हुए थी, यानी मोहब्बत, जुदाई और दिल की कैफ़ियतों की बातें। वक़्त के साथ उसमें गहराई आती गई। उनके यहां इश्क़ के साथ साथ दुनिया की बेरहमी, तन्हाई और अंदर की टूट-फूट का बयान भी मिलता है। उनकी ग़ज़लों और नज़्मों की ख़ूबी यह है कि बात सीधे दिल में उतरती है, लेकिन लफ़्ज़ों के पीछे एक ख़ामोश-सा दर्द छिपा रहता है। उनका सबसे मशहूर शेर एक ऐसे रास्ते की बात करता है जिसमें पत्थर तो हैं मगर सितारों की कहकशां नहीं, और यह शेर उर्दू-हिंदी जानने वालों की ज़ुबान पर आज भी है। उनके हमअस्रों में नासिर काज़मी का नाम भी आता है, जो हिंदुस्तान में पैदा होकर लाहौर की अदबी फ़िज़ा का हिस्सा बने।
हम अंजुमन में सब की तरफ़ देखते रहे
अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला
ज़ैदी साहब की मौत आज तक एक मुअम्मा बनी हुई है। 12 अक्टूबर 1970 को कराची में वे मुर्दा पाए गए और उनके पास शहनाज़ गुल नाम की एक ख़ातून बेहोश मिलीं। कुछ लोग इसे क़त्ल मानते हैं और कुछ का ख़्याल है कि यह ख़ुदकुशी थी। हक़ीक़त आज तक पूरी तरह सामने नहीं आ सकी। उन्हें कराची के वादी-ए-हुसैन क़ब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। 2024 में सबा इम्तियाज़ और तूबा मसूद ख़ान ने “सोसाइटी गर्ल” के नाम से एक किताब लिखी, जो इसी वाक़ये को मौज़ू बनाती है।
कोई रफ़ीक़ बहम ही न हो तो क्या कीजे
कभी कभी तिरा ग़म ही न हो तो क्या कीजे
मुस्तफ़ा ज़ैदी की ज़िंदगी छोटी थी, मगर उनकी शायरी में वह सच्चाई है जो पढ़ने वाले को अपने दिल की बात लगती है। इसी वजह से 50 साल से ज़्यादा गुज़र जाने के बाद भी लोग उनके शेर पढ़ते और सुनाते हैं। वे उन शायरों में से हैं जिन्होंने कम वक़्त में ज़्यादा कह दिया और जिनका दर्द आज भी नई नस्लों को अपना-सा लगता है।
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