जथेदार अकाली Phula Singh (फूला सिंह): पंथ के महान जरनैल, अकाल तख़्त की शान और खालसाई मर्यादा के रखवाले
सिख इतिहास बहादुरों, शहीदों, संतों और जांबाज़ योद्धाओं की अनगिनत कहानियों से भरा हुआ है। इन्हीं महान शख्स़ियतों में जथेदार अकाली Phula Singh (फूला सिंह) का नाम बड़े एहतराम के साथ लिया जाता है। वो ऐसे बेख़ौफ़ सिख जरनैल थे, जिनकी ज़िंदगी में गुरसिखी, खालसाई मर्यादा, हिम्मत, उसूलों पर कायम रहने का जज़्बा और जंग के मैदान में बहादुरी सब एक साथ नज़र आते हैं। अकाली Phula Singh (फूला सिंह) उस दौर में सामने आए, जब महाराजा रणजीत सिंह की क़यादत में सिख राज का दायरा बढ़ रहा था। वो एक तरफ़ निहंग सिंहों की बड़ी जमात बूढ़ा दल के जथेदार रहे, तो दूसरी तरफ़ श्री अकाल तख़्त साहिब की सेवा से भी जुड़े रहे।
उनकी शख्स़ियत की सबसे ख़ास बात ये थी कि वो किसी भी राजसी ताक़त के दबाव में नहीं आते थे। उनके लिए पंथ की मर्यादा, उसूल और ज़िम्मेदारी सबसे ऊपर थी। यही वजह है कि सिख इतिहास में अकाली Phula Singh (फूला सिंह) को एक निडर जथेदार, बहादुर जरनैल और खालसाई मर्यादा के रखवाले के तौर पर याद किया जाता है। महाराजा रणजीत सिंह जैसे ताक़तवर हाकिम को भी एक धार्मिक मामले में श्री अकाल तख़्त साहिब के सामने पेश होने के लिए कहने की अकाली फूला सिंह की ये बहादुरी सिख इतिहास में उसूलों पर कायम रहने की मिसाल मानी जाती है।

साल 1823 की नौशेरा की जंग में उनकी शहादत ने इस बहादुर जरनैल के नाम को सिख इतिहास के यादगार पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया। अकाली Phula Singh (फूला सिंह) की पैदाइश 1761 में संगरूर ज़िले के लहरागागा इलाके के देहला सिहां गांव में हुई थी। उनके वालिद भाई ईशर सिंह शहीदां मिसल से जुड़े एक बहादुर सिख थे। अकाली Phula Singh (फूला सिंह) का बचपन उस दौर में गुज़रा, जब सिखों को मुग़ल और अफ़ग़ान हुकूमतों की तरफ़ से लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। वालिद की मौत के बाद उनकी परवरिश और तालीम की ज़िम्मेदारी निहंग परंपरा के प्रमुख रहनुमा बाबा नैना सिंह से जुड़ी बताई जाती है।
बचपन से ही उन्हें गुरमुखी, गुरबाणी, गुरसिखी ज़िंदगी और शस्त्र विद्या की तालीम मिली। घुड़सवारी, ने ज़ेबाज़ी, तलवारबाज़ी और जंग की मश्क उनकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गई। उस दौर में निहंग सिंहों के डेरे सिर्फ़ धार्मिक केंद्र नहीं थे, बल्कि गुरसिखी अनुशासन और जंग की तालीम के भी अहम केंद्र थे। इसी माहौल में फूला सिंह की शख्स़ियत में रूहानी मज़बूती और जंगी हुनर दोनों साथ-साथ पनपे।

जब अकाली फूला सिंह का अंग्रेज़ों से सामना हुआ
अकाली Phula Singh (फूला सिंह) ने अपनी ज़िंदगी के शुरुआती दौर में मालवा इलाके में अहम भूमिका निभाई। 1809 की अमृतसर संधि के बाद सतलुज के पार के इलाकों में अंग्रेज़ों का असर बढ़ने लगा। पटियाला, नाभा और जींद जैसी रियासतें भी अंग्रेज़ों के साथ अलग-अलग सियासी समझौते कर अपने हितों की हिफ़ाज़त कर रही थी। अंग्रेज़ अफ़सर सतलुज के आसपास के इलाकों का सर्वे और नक्शे तैयार कर रहे थे। अकाली Phula Singh (फूला सिंह) को उनकी ये गतिविधियां शक़ी लगी और उन्होंने अंग्रेज़ी दख़ल का विरोध किया। ऐतिहासिक रिवायतों के मुताबिक, एक मौक़े पर उन्होंने अपने निहंग सिंहों के साथ अंग्रेज़ अफ़सरों के एक दस्ते को रोक दिया और उन्हें वहां से वापस जाने पर मजबूर कर दिया।
इस घटना से उनकी बेख़ौफ़ी और अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ रुख़ और साफ़ हो गया। मालवा इलाके के लोगों और सिख योद्धाओं के बीच उनका असर लगातार बढ़ता गया।
करीब 1800 के आसपास अकाली Phula Singh (फूला सिंह) अपने निहंग जत्थे के साथ अमृतसर पहुंचे। उस वक़्त अमृतसर सिख पंथ का प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक केंद्र था। यहां उन्होंने श्री हरमंदिर साहिब और श्री अकाल तख़्त साहिब की मर्यादा और हिफ़ाज़त में अहम भूमिका निभाई। उनकी क़यादत में निहंग सिंहों का जत्था धार्मिक अस्थानों की हिफ़ाज़त के साथ-साथ पंथ के अहम मामलों में भी सक्रिय रहा। उनकी शख्स़ियत की सबसे बड़ी ख़ासियत ये थी कि वो धार्मिक मर्यादा को राजसी ताक़त से ऊपर मानते थे।

अमृतसर में ख़ून-ख़राबा रोकने की कोशिश और महाराजा रणजीत सिंह की अकाल तख़्त के सामने पेशी
1802 में महाराजा रणजीत सिंह ने अमृतसर को अपने राज में शामिल करने की कोशिश की। उस वक़्त शहर पर भंगी मिसल के असरदार नेताओं का कब्ज़ा था। दोनों पक्षों के बीच टकराव बढ़ने से बड़े पैमाने पर ख़ून-ख़राबे का ख़तरा था। अकाली Phula Singh (फूला सिंह) ने पंथ की एकता को ध्यान में रखते हुए बीच-बचाव किया। उनका मानना था कि सिखों का ख़ून सिखों के हाथों नहीं बहना चाहिए। उनकी कोशिशों से टकराव को बड़े ख़ून-ख़राबे से बचाने में मदद मिली और अमृतसर महाराजा रणजीत सिंह के राज का हिस्सा बन गया। ये वाक़या अकाली फूला सिंह की पंथ के लिए सोच और दूर की समझ को दिखाता है।
अकाली Phula Singh (फूला सिंह) की ज़िंदगी से जुड़ी सबसे मशहूर घटनाओं में से एक महाराजा रणजीत सिंह की श्री अकाल तख़्त साहिब के सामने पेशी है। इतिहास के मुताबिक, महाराजा की निजी ज़िंदगी से जुड़े एक मामले को सिख धार्मिक मर्यादा के ख़िलाफ़ माना गया। इसके बाद अकाली फूला सिंह ने महाराजा को श्री अकाल तख़्त साहिब के सामने पेश होने के लिए कहा। महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी राजसी ताक़त का हवाला देने के बजाय श्री अकाल तख़्त साहिब की अहमियत और ऊंचे मुकाम को माना और वहां पेश हुए। अकाली फूला सिंह ने उनके लिए सख़्त सज़ा का ऐलान किया। पुराने ऐतिहासिक बयानों में उन्हें कोड़ों की सज़ा दिए जाने का ज़िक्र मिलता है।

लेकिन जब महाराजा ने बड़ी नरमी और आजिज़ी के साथ अपनी ग़लती मान ली और सज़ा भुगतने के लिए तैयार हो गए, तो संगत और अकाली फूला सिंह ने सज़ा माफ़ कर धार्मिक दंड देने का फ़ैसला किया। ये वाक़या सिख इतिहास में इस सोच की मिसाल माना जाता है कि राजसी ताक़त से ऊपर पंथ की मर्यादा और जवाबदेही को रखा जाना चाहिए।
अकाली फूला सिंह सिर्फ़ एक धार्मिक रहनुमा नहीं थे, बल्कि एक मशहूर फौजी जर्नैल भी थे। उनकी क़यादत में निहंग सिंहों ने महाराजा रणजीत सिंह की कई फौजी मुहिमों में हिस्सा लिया।
क़सूर की मुहिम, मुल्तान की जंग और कश्मीर की फ़तह
क़सूर के पठान हाकिमों के ख़िलाफ़ सिख फौज की मुहिमों में अकाली फूला सिंह और उनके निहंग जत्थे ने अहम भूमिका निभाई। क़सूर का क़िला काफ़ी मज़बूत था और इसे जीतने के लिए सिख फौज को कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ा। अकाली सिंहों की बहादुरी ने सिख फौज का हौसला बढ़ाया और जंग में उनका जोश बनाए रखा। 1818 में मुल्तान की फ़तह सिख राज के फैलाव की एक अहम कड़ी थी। मुल्तान के क़िले पर क़ब्ज़ा करने के लिए सिख फौज को कड़ी जंग लड़नी पड़ी।
अकाली फूला सिंह ने आगे बढ़कर जंग में हिस्सा लिया और निहंग सिंहों की क़यादत की। इस मुहिम में उनकी बहादुरी और मुश्किल हालात में जोखिम उठाने का जज़्बा साफ़ दिखाई दिया। इसके बाद 1819 की कश्मीर मुहिम भी सिख राज की तारीख़ में अहम मानी जाती है। सिख फौज ने अफ़ग़ान असर को हटाकर कश्मीर को सिख राज में शामिल किया। इन फौजी मुहिमों में अकाली फौज और निहंग सिंहों की भी अहम हिस्सेदारी रही।

नौशेरा की आख़िरी जंग और अकाली फूला सिंह की शहादत
अकाली Phula Singh (फूला सिंह) की ज़िंदगी की सबसे अहम और आख़िरी जंग 1823 की नौशहरा की लड़ाई थी। पेशावर और अफ़ग़ान इलाकों में सिख राज के बढ़ते असर का विरोध करने के लिए अफ़ग़ान ताक़तें एकजुट हुई। इसके बाद अटक और नौशहरा के इलाकों में दोनों तरफ़ से ज़बरदस्त टकराव हुआ। इतिहास के मुताबिक, अकाली फूला सिंह अपने निहंग सिंहों के साथ सबसे आगे रहकर जंग में शामिल हुए। जंग से पहले उन्होंने अरदास की और अपने सिंहों को चढ़दी कला के साथ मैदान में उतरने का हौसला दिया।
सिख इतिहास की मशहूर रिवायतों के मुताबिक, महाराजा रणजीत सिंह ने हालात को देखते हुए हमले में थोड़ी देर करने की सलाह दी थी। लेकिन अकाली फूला सिंह ने अरदास के बाद पीछे हटने से इनकार कर दिया। उनके लिए अरदास सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं थी, बल्कि गुरु के सामने किया गया एक वादा थी। जंग के दौरान अकाली फूला सिंह घोड़े पर सवार होकर आगे बढ़े। गोलियों की बौछार के बावजूद वो अपने सिंहों की क़यादत करते रहे। उनका घोड़ा ज़ख़्मी हो गया, लेकिन उन्होंने पीछे हटने के बजाय हाथी पर सवार होकर भी जंग की क़यादत जारी रखी।
आख़िरकार वो ज़ख़्मी हुए और 14 मार्च 1823 को शहीद हो गए। उनकी शहादत ने सिख फौज के हौसले को और बुलंद कर दिया और नौशहरा की जंग में सिखों ने अहम फ़तह हासिल की। अकाली फूला सिंह की शहादत सिख जंगी इतिहास में बेख़ौफ़ी, वफ़ादारी और क़ुर्बानी की एक यादगार मिसाल के तौर पर दर्ज है।

अकाली फूला सिंह की विरासत सिर्फ़ जंग की फ़तह तक महदूद नहीं
अकाली Phula Singh (फूला सिंह) की विरासत को सिर्फ़ उनकी जंगों की फ़तह तक महदूद नहीं किया जा सकता। उनकी सबसे बड़ी देन उसूलों पर कायम रहने और बेख़ौफ़ी की वो मिसाल है, जो उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी से पेश की। उन्होंने दिखाया कि किसी दीनी ज़िम्मेदारी का मतलब सिर्फ़ सम्मान पाना नहीं, बल्कि उसे पूरी ईमानदारी से निभाना भी है। श्री अकाल तख़्त साहिब की मर्यादा के मामले में उन्होंने राजसी ताक़त के सामने भी अपने फ़र्ज़ से पीछे हटना मंज़ूर नहीं किया।
इसी तरह जंग के मैदान में भी वो अपने साथियों के पीछे नहीं, बल्कि सबसे आगे रहकर लड़ते थे। उन्होंने अपने साथियों के लिए ऐसी मिसाल कायम की, जिसमें हिम्मत, ख़ुद्दारी और क़ुर्बानी सबसे ऊपर थी। उनकी ज़िंदगी सिख पंथ की उस सोच को भी सामने लाती है, जिसमें धार्मिक आज़ादी, ख़ुद्दारी, इंसाफ़, बेख़ौफ़ी और क़ुर्बानी को बड़ी अहमियत दी जाती है।
जथेदार अकाली फूला सिंह सिख इतिहास की ऐसी महान शख्स़ियत हैं, जिनकी ज़िंदगी में संत-सिपाही की रिवायत साफ़ नज़र आती है। वो निहंग सिंहों के बड़े जथेदार, श्री अकाल तख़्त साहिब की मर्यादा के रखवाले और सिख राज के बेख़ौफ़ जरनैल के तौर पर याद किए जाते हैं।
लेख: सविंदर कौर
इस लेख को पंजाबी में पढ़ें
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