फिलीग्री (Karimnagar’s Silver Filigree) एक ऐसी नफ़ीस और लतीफ़ कारीगरी है जिसमें चांदी या सोने की बारीक तारों को नाज़ुक मोड़ों, लूप्स और ज़िग-ज़ैग पैटर्न में पिरोकर ज्वेलरी और आर्ट पीस तैयार किए जाते हैं। अंग्रेज़ी लफ़्ज़ filigree लातीनी शब्दों ‘फ़िलुम’ यानी तार और ‘ग्रेनम’ यानी छोटा दाना से निकला है। ये हुनर सिर्फ़ गहनों तक महदूद नहीं, बल्कि यह एक ऐसा फ़न है जिसमें धातु को तराशने की बजाय जोड़कर, सोल्डर करके नक़्श उभारे जाते हैं।

तारीख़ का सफ़र
मेसोपोटामिया की खुदाई से पता चलता है कि फिलीग्री 3,000 ईसा पूर्व से ज़ेवरों में शामिल थी। फ़ोनीशियन साइट्स पर सोने की तारों से बने नक़्श मिले हैं, लेकिन इस फ़न को अपनी बुलंदी ग्रीक और एट्रस्कन फिलीग्री (छठी से तीसरी सदी ईसा पूर्व) में मिली। भारत और मध्य एशिया में ये कारीगरी बहुत क़दीम ज़माने से बिना किसी तब्दीली के चली आ रही है। हैरानी की बात ये है कि आज भी भारतीय फिलीग्री कारीगर वही नक़्श और वही तकनीक इस्तेमाल करते हैं जो क़दीम यूनानी कारीगरों के थे।
करीमनगर: फिलीग्री का गढ़
तेलंगाना के करीमनगर (Karimnagar’s Silver Filigree) में ये हुनर ‘तरकसी’ के नाम से मशहूर है और तक़रीबन 400 साल पुराना माना जाता है। एलगंडल फ़ोर्ट, जो करीमनगर से क़रीब 10 किलोमीटर दूर है, मुग़लों और निज़ामों की हथियार बनाने की जगह थी। दूर-दराज़ से माहिर कारीगर यहां आए और उन्होंने स्थानीय लोगों को ये फ़न सिखाया। मुग़लों, निज़ामों, रॉयल्स और स्थानीय रईसों ने इस कारीगरी को ख़ूब सरपरस्ती दी।

डेवलपमेंट और पहचान
करीमनगर सिल्वर फिलीग्री क्लस्टर को 2007 में Geographical Indication (GI) का दर्जा मिला। इसे ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ में शामिल किया गया। MSME, DIC और NABARD इसे बढ़ावा दे रहे हैं। 2008 में ‘सिल्वर फिलीग्री ऑफ़ करीमनगर वेलफ़ेयर सोसाइटी’ (SIFKA) बनी, जिसने 520 कारीगरों को जोड़ा-जिनमें 90 फीसदी सिल्वरस्मिथ हैं। विश्वकर्मा समुदाय के सुनार ही पीढ़ियों से यह हुनर संजोए हुए हैं। स्वर्गीय कडारला नारायण को 1967 में पहला राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, और तब से इस इलाक़े से 8 राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निकले।
कच्चा माल और औज़ार
मेन है कच्चा माल..शुद्ध चांदी की बिस्किट, जिसे 3 फीसदी तांबा मिलाकर पिघलाया जाता है। नवसागरम पाउडर डालकर चांदी को आसानी से बहने दिया जाता है। औज़ारों में आयरन टॉन्ग्स, वायर और शीट मशीन, कम्पास, येलिगराम (वेल्डिंग का चिपकाने वाला पाउडर), क्रूसिबल, रीठा (प्राकृतिक साबुन जैसा बीज), ब्रास ब्रश और ड्रॉइंग मशीन शामिल हैं।

बनाने का तरीक़ा
पहले डिज़ाइन के मुताबिक़ चांदी की छड़ें और तार बनाए जाते हैं। ड्रॉइंग मशीन से तारों को पतला किया जाता है। लकड़ी या पत्थर की स्लैब पर मोम (beeswax) की परत बिछाकर फ़्रेम जमाया जाता है। तारों को U-मोड़, 8 का आकार, स्पाइरल, त्रिकोण जैसी शक्लों में मोड़ा जाता है। फिर बोरैक्स पाउडर और सिल्वर फ़्लक्स से पूरे नक़्श को वेल्ड किया जाता है। इसके बाद शेपिंग, कई बार गर्म करना और हल्के हथौड़ों से पीटना, फिर तेज़ाब में डुबोकर साफ़ करना। आख़िर में ब्रास ब्रश और मुलायम कॉटन कपड़े से पॉलिश करके चमक पैदा की जाती है।

उत्पाद और डिज़ाइन
ज्वेलरी, की-चेन, गिफ़्ट बॉक्स, अठरदान, पानदान, कुमकुम डिब्बे, ट्रे, पूजा सामान, फूलदान, दीवार के फ़्रेम, मशहूर इमारतों और देवताओं की मूर्तियां-ये सब फिलीग्री से बनता है। फूलों और ज्यामितीय नक़्शों का ख़ूबसूरत संगम करीमनगर की पहचान है।

बाज़ार
चांदी के महंगे दामों से कारोबार को झटका लगा, लेकिन सरकारी और निजी संस्थाओं की मदद से इस फ़न ने अपनी रौनक़ फिर हासिल कर ली है। ग्लोबल हैंडीक्राफ़्ट मार्केट में हाई-एंड सेगमेंट में इसकी ख़ासी मांग है।
यूं कहें तो करीमनगर की सिल्वर फिलीग्री सिर्फ़ एक कारीगरी नहीं, बल्कि सदियों की विरासत, सब्र और फ़न का ऐसा नमूना है जो चांदी की नाज़ुक तारों में इंसानी जज़्बात और रिवायतों को पिरोता है।
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