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“ड्यूटी थी, ड्यूटी निभानी थी”—1965 की जंग को देखने वाले लेफ्टिनेंट जनरल Tajinder Singh Shergill से ख़ास बातचीत

65 की जंग: पंजाब के जांबाज़

सितंबर का महीना आते ही 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग की याद ताज़ा हो जाती है। ये वो दौर था, जब सरहद पर भारतीय फौज के जवानों ने हौसले और मज़बूती के साथ मोर्चा संभाला था। इस जंग को समझने के लिए उन लोगों की यादें बेहद अहम हैं, जिन्होंने खुद जंग के मैदान में रहकर हालात देखे थे। इसी सिलसिले में ‘साड्डा पंजाब’ के ख़ास पॉडकास्ट ‘गल्लां अनप्लग्ड’ की सीरीज़ ‘65 की जंग—पंजाब के जांबाज़’ में रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल Tajinder Singh Shergill (तजिंदर सिंह शेरगिल) से ख़ास बातचीत की गई।

ख़ास बात ये है कि 1965 की जंग में उनके परिवार के तीन लोग उनके पिता मेजर जनरल रजिंदर सिंह ‘स्पैरो’, उनके भाई और खुद तजिंदर सिंह शेरगिल भारतीय फौज की तरफ़ से जंग में शामिल थे। इस बातचीत में उन्होंने 1965 की जंग के कारणों, कच्छ से कश्मीर और फिर पंजाब तक जंग के फैलने, हाजी पीर और खेमकरण जैसे अहम मोर्चों, अपने परिवार की फौजी विरासत और जंग के दौरान पंजाब के लोगों की भूमिका के बारे में विस्तार से बात की।

सवाल: 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग के हालात क्यों बने?

जवाब: मेरे हिसाब से इसके कई कारण थे। सबसे पहले पाकिस्तान को अमेरिका से काफी मॉडर्न हथियार और फौजी सामान मिला था। उनके पास टैंक, हथियार और लड़ाकू विमान जैसी चीज़ें थी। इससे पाकिस्तान का अपनी फौजी ताकत पर भरोसा बढ़ गया था। दूसरी बात, पाकिस्तान को लगा कि 1962 की चीन-भारत जंग के बाद भारतीय फौज कमज़ोर हुई है। उन्हें लगा कि ऐसे समय में भारत के खिलाफ़ कार्रवाई की जा सकती है। इसके अलावा कश्मीर को लेकर भी पाकिस्तान की अपनी सोच थी। उन्हें लगता था कि अगर कश्मीर में कोई कार्रवाई की गई तो वहां के लोग उनका साथ देंगे।

सवाल: क्या कच्छ की लड़ाई को 1965 की जंग की शुरुआती कड़ी माना जा सकता है?

जवाब: अप्रैल 1965 में कच्छ के इलाके में पाकिस्तानी फौज ने हमला किया। उस समय वहां हमारी फौज की तैनाती कम थी। पहली बार हमें वहां पाकिस्तान के M48 पैटन टैंक भी दिखाई दिए। ये बहुत बड़े पैमाने की लड़ाई नहीं थी, लेकिन पाकिस्तान को वहां कुछ कामयाबी मिली। बाद में बातचीत और कूटनीतिक कोशिशों के ज़रिए ये लड़ाई रुक गई। लेकिन इस घटना से पाकिस्तान को लगा कि वो भारत के खिलाफ़ इससे बड़ी कार्रवाई भी कर सकता है।

सवाल: कश्मीर में ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ क्या था?

जवाब: 12 अगस्त को पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ शुरू किया। इसके तहत पाकिस्तानी फौज के कई जवानों को बिना फौजी वर्दी के कश्मीर में भेजा गया। उन्हें उम्मीद थी कि कश्मीर के लोग उनका साथ देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कश्मीर के लोगों ने उनका साथ नहीं दिया और कई जगहों पर भारतीय फौज को ज़रूरी जानकारी भी दी। इस वजह से पाकिस्तान का ये प्लान उसकी उम्मीद के मुताबिक कामयाब नहीं हुआ।

सवाल: हाजी पीर की लड़ाई को आप कैसे याद करते हैं?

जवाब: हाजी पीर बहुत अहम इलाका था। 28 अगस्त को मेजर रणजीत सिंह दयाल और उनकी पैरा बटालियन की टुकड़ी हाजी पीर की तरफ़ बढ़ी। रात का काफी वक़्त रास्ते में बीता और सुबह तक उन्होंने हाजी पीर पर कब्ज़ा कर लिया। इस कार्रवाई में मेजर रणजीत सिंह दयाल और कई दूसरे जवानों ने बहुत बहादुरी दिखाई। बाद में मेजर दयाल को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

सवाल: इसके बाद जंग का रुख़ कैसे बदला?

जवाब: पाकिस्तान को समझ आ गया कि कश्मीर में उसका प्लान उम्मीद के मुताबिक कामयाब नहीं हुआ। इसके बाद उसने अखनूर की तरफ़ हमला किया। इस कार्रवाई को ‘ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम’ कहा गया। इसके साथ हवाई हमले भी हुए। इसके बाद भारत ने जवाबी कार्रवाई का फैसला किया और जंग कश्मीर से आगे पंजाब के मोर्चों तक पहुंच गई।

सवाल: भारत का जंगी प्लान क्या था?

जवाब: भारत के सामने कुछ अहम मक़सद थे। एक मक़सद था कि कश्मीर में पाकिस्तान को ऐसा जवाब दिया जाए कि वो दोबारा ऐसी कोशिश न करे। दूसरा मक़सद पाकिस्तान के मॉडर्न हथियारों और टैंकों की ताकत को नुकसान पहुंचाना था। इसके साथ ये भी हिदायत थी कि जितनी ज़मीन फौजी कार्रवाई के लिए ज़रूरी हो, उतनी ही ली जाए। जंग ख़त्म होने और अमन होने के बाद ये ज़मीन वापस की जानी थी। एक और अहम बात थी कि आम लोगों को नुकसान न पहुंचे। फौज को हिदायत थी कि आम नागरिकों को निशाना नहीं बनाया जाए।

सवाल: जंग पंजाब तक कैसे पहुंची?

जवाब: 6 सितंबर के बाद जंग पंजाब के अलग-अलग इलाकों में फैल गई। खेमकरण, खालड़ा, बरकी, लाहौर का रास्ता, डेरा बाबा नानक और सियालकोट अहम इलाके बन गए। लाहौर की तरफ़ बढ़ रही एक भारतीय यूनिट ने पहले ही दिन इछोगिल नहर पार कर ली थी। बाद में कुछ कम्युनिकेशन से जुड़ी वजहों से उन्हें वापस बुला लिया गया।
डोगराई की लड़ाई भी काफी अहम रही। वहीं सियालकोट सेक्टर में फिल्लौरा की लड़ाई के दौरान भी भारतीय फौज ने बड़ी कार्रवाई की।

सवाल: 1965 की जंग में टैंकों की क्या भूमिका रही?

जवाब: सियालकोट सेक्टर में टैंकों की बड़ी भूमिका रही। पाकिस्तान के पास पैटन टैंक थे और उसने कई आर्मर्ड यूनिट्स तैयार कर रखी थी। जंग के दौरान भारतीय फौज ने पाकिस्तान के कई टैंक तबाह किए। असल उत्तर और सियालकोट सेक्टर में हुई लड़ाइयों में बड़ी तादाद में पाकिस्तानी टैंकों को नुकसान पहुंचा। मेरे हिसाब से अगर जंग के मक़सदों को देखें तो पाकिस्तान की आर्मर्ड ताकत को नुकसान पहुंचाने का मक़सद काफी हद तक पूरा हुआ।

सवाल: जब आपको पता चला कि जंग शुरू होने वाली है तो आपके मन में पहला ख़्याल क्या आया?

जवाब: “जंग की ख़बर मिली तो कोई रोना-धोना नहीं हुआ।” जंग पर बनी फ़िल्मों में हम अक्सर देखते हैं कि परिवार रोते हैं और एक-दूसरे को गले लगाते हैं। लेकिन हमारा माहौल कुछ और था। ये पंजाब है। इस धरती ने बहुत कुछ देखा है और यहां के लोगों में बहुत हौसला है। मेरी रेजिमेंट अंबाला में थी और उस वक़्त मुझे दो महीने की छुट्टी मिली हुई थी। मैं अपने बड़े भाई के पास नागालैंड गया हुआ था।

जब अख़बारों में जंग के हालात के बारे में पढ़ा तो मैंने वापस आने का फैसला किया। मैं जालंधर अपने घर आ गया। फिर एक दिन फोन आया कि वापस आ जाओ। मैंने पहले से ही अपनी तैयारी कर रखी थी। मैप केस और ज़रूरी सामान तैयार था। रात की ट्रेन से हम आगे चले गए।

सवाल: आपके पिता जी और भाई भी जंग में थे। घर का माहौल कैसा था?

जवाब: हमारे परिवार में ये कोई अजीब बात नहीं थी। मेरे पिता जी भी फौज में थे और मैं और मेरा बड़ा भाई भी फौज में थे। बाद में हम दोनों लेफ्टिनेंट जनरल के रैंक तक पहुंचे।
पंजाब में ऐसे कई परिवार थे, जहां दो या तीन भाई फौज में रहे और जंगों में शामिल हुए। लेकिन उनमें से बहुत से लोगों के नाम इतिहास में सामने नहीं आ पाए। हमारे लिए ये ड्यूटी थी। हम ड्यूटी करने गए थे। कोई रोना-धोना नहीं था।

सवाल: आपके पिताजी ने जंग में जाने से पहले आपको कोई ख़ास सलाह दी थी?

जवाब: उनके लिए भी ये सिर्फ़ ड्यूटी थी। उन्होंने खुद कई जंगें लड़ी थी। जम्मू-कश्मीर में नौशेरा, झंगड़, चीता फोर्स, जोजिला, उड़ी और चकोठी जैसे कई मोर्चों पर उन्हें लड़ाई का तजुर्बा था। 1947-48 की जंग भी काफी लंबी चली थी। इसलिए उनके लिए जंग कोई नई चीज़ नहीं थी। उनका मिज़ाज भी बहुत सीधा था—ड्यूटी है तो ड्यूटी निभानी है।

सवाल: ‘स्पैरो’ नाम आपके पिताजी के साथ कैसे जुड़ा?

जवाब: मेरे पिताजी की याददाश्त बहुत अच्छी थी और वो शुरू से गाते भी थे। एक बार अंग्रेज़ी साहित्य की क्लास में बच्चों को एक लंबी कविता याद करने के लिए दी गई। जब प्रिंसिपल ने पूछा कि कौन कविता सुना सकता है तो मेरे पिताजी ने हाथ खड़ा कर दिया। उन्होंने पूरी कविता सुना दी। उस कविता का नाम था ‘I Am a Little Sparrow’।
प्रिंसिपल ने कहा—“Yes, you are a little sparrow in class and on the hockey field.” वो हॉकी भी बहुत अच्छी खेलते थे। इसके बाद ‘स्पैरो’ नाम उनके साथ जुड़ गया और आगे चलकर फौज में भी यही नाम मशहूर हो गया। खेमकरण का मोर्चा और एक नौजवान अफ़सर की जंग

सवाल: 1965 की जंग के दौरान आप ख़ुद किस मोर्चे पर थे?

जवाब: जब जंग शुरू हुई तो मेरा बड़ा भाई पूर्वी इलाके में नागालैंड में था। कुछ दिनों बाद उसकी यूनिट भी हमारे इलाके में आ गई और खेमकरण और खालड़ा इलाके में पहुंची। मेरी पूरी जंग खेमकरण के इलाके में हुई। उस वक़्त मैं सेकंड लेफ्टिनेंट था। शुरुआत में मेरे साथ एक ट्रूप था। बाद में मुझे एक और ट्रूप दिया गया। मेरा कॉल साइन ‘यैंकी’ था। “मेरे हीरो सिर्फ़ फौजी नहीं, कश्मीर के आम लोग भी थे”

सवाल: 1965 की जंग में आपके लिए सबसे बड़े हीरो कौन थे?

जवाब: मेरे हीरो कश्मीर के आम लोग भी हैं। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि कश्मीर के लोग उसका साथ देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो भारतीय फौज के साथ रहे और जानकारी देकर मदद की। ये बहुत बड़ी बात थी। मेरे दूसरे हीरो पंजाब के लोग हैं। जब भी सरहद पर फौज आती है, पंजाब के लोग उसकी मदद करते हैं। मोर्चे बनाने से लेकर जवानों के लिए खाने-पीने तक, पंजाब के लोगों और फौज के बीच एक अलग रिश्ता रहा है।

सवाल: क्या आपको जंग के दौरान पंजाब के लोगों की मदद की कोई घटना आज भी याद है?

जवाब: हां। जब हम कच्छ के दौरान एक गांव के पास तैनात थे, हमारे 14 टैंक एक बाग के आसपास खड़े थे।
एक शाम एक औरत सफेद सलवार-कमीज़ और सफेद दुपट्टे में दो लोगों के साथ हमारे पास आई। वो दो टोकरियां लेकर आए थे। उन्होंने कहा कि ये आपके लिए लाए हैं। पंजाब में ऐसा रिश्ता है कि जवान भी अपने लगते हैं और मासी, दादी जैसे रिश्ते भी हर किसी से जुड़ जाते हैं। ये पंजाबी समाज की एक ख़ास खूबी है। “पंजाब सिर्फ़ एक धर्म का नहीं, सभी पंजाबियों का है”

सवाल: आप बंटवारे और पंजाब के इतिहास को जंग से कैसे जोड़ते हैं?

जवाब: पंजाब ने बहुत कुछ देखा है। बंटवारे के वक़्त पंजाब और बंगाल को बहुत बड़ी चोट लगी। लोगों ने अपनी ज़मीनें और घर छोड़े। बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। लाहौर दरबार के समय महाराजा रणजीत सिंह का राज बहुत बड़े इलाके तक फैला हुआ था। उस वक़्त पंजाब की अपनी एक अलग पहचान थी। आज भी चढ़ते और लहंदे पंजाब के लोगों के बीच भाषा, खाना, रीति-रिवाज और शादी-ब्याह की कई समान परंपराएं हैं। मज़हब अलग हो सकता है, लेकिन पंजाबी होने की कई साझा चीज़ें आज भी मौजूद हैं। जंग के मैदान में धर्म नहीं, साथ था

सवाल: 1965 की जंग में अलग-अलग धर्मों के जवानों की भूमिका के बारे में आप क्या कहेंगे?

जवाब: भारतीय फौज में अलग-अलग मज़हब के लोग एक साथ लड़े। खेमकरण के मोर्चे पर कंपनी कमांडर अब्दुल हमीद भी बड़े हीरो थे। उनके पास रिकॉयलेस राइफल थी और उन्होंने कई पाकिस्तानी टैंकों को निशाना बनाया। वो जंग में शहीद हुए और उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। सियालकोट सेक्टर में भी अलग-अलग जगहों से आए जवानों ने बहादुरी से लड़ाई लड़ी। भारतीय फौज की एक बड़ी ताकत ये है कि अलग-अलग मज़हब और इलाकों के लोग एक साथ देश के लिए लड़ते हैं। मेरे लिए फौज खुद एक हीरो है। सही वक़्त पर सही फैसला—जंग में कमांड की अहमियत

सवाल: 1965 की जंग में कमांडरों के फैसलों को आप कैसे देखते हैं?

जवाब: उस वक़्त के कई बड़े कमांडरों ने द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ाई देखी थी। उन्हें बड़े स्तर की जंग का काफी तजुर्बा था। इसलिए वो बड़े पैमाने पर सोचते थे। लेकिन 1965 की जंग सिर्फ 23 दिनों में ख़त्म हो गई। इस दौरान कई मोर्चों पर हालात तेज़ी से बदले और कमांडरों को तुरंत फैसले लेने पड़े। जंग में सिर्फ़ हथियार ही ज़रूरी नहीं होते, बल्कि सही वक़्त पर सही फैसला लेना भी बहुत ज़रूरी होता है।

सवाल: क्या आपको लगता है कि पंजाबी परिवारों की फौजी विरासत आज भी ज़िंदा है?

जवाब: बिल्कुल। पंजाब में बहुत से परिवार हैं, जिनकी कई पीढ़ियां फौज में रही हैं। कई परिवारों के दो या तीन भाई एक ही वक़्त में जंग में गए। मेरे अपने परिवार में मेरे पिताजी, मेरा भाई और मैं 1965 की जंग से जुड़े रहे। लेकिन ये सिर्फ़ हमारे परिवार की कहानी नहीं है। पंजाब के बहुत से परिवारों ने देश की हिफाज़त के लिए अपने बेटों को फौज में भेजा है। इसी वजह से पंजाब की मिट्टी को जंगों और कुर्बानियों की यादों से जोड़ा जाता है।

आखिर में 1965 की जंग सिर्फ़ सरहद पर लड़ी गई एक फौजी लड़ाई नहीं थी। इससे जुड़ी कहानियों में फौजी प्लानिंग, जवानों की बहादुरी, आम लोगों की मदद, परिवारों की कुर्बानी और पंजाब की सामाजिक और ऐतिहासिक यादें सब शामिल हैं। लेफ्टिनेंट जनरल Tajinder Singh Shergill (तजिंदर सिंह शेरगिल) की यादें आज की पीढ़ी के लिए उस दौर को समझने का एक अहम मौका देती हैं।

Tajinder Singh Shergill (तजिंदर सिंह शेरगिल) से बातचीत में एक बात बार-बार सामने आती है—जंग में जाने वाले सैनिक के लिए सबसे पहले उसकी ड्यूटी होती है। और इस ड्यूटी के पीछे सिर्फ़ एक जवान नहीं होता, बल्कि उसका परिवार, उसका गांव, उसकी ज़मीन और पूरा समाज भी जुड़ा होता है। ‘65 की जंग—पंजाब के जांबाज़’ इसी विरासत को याद करने और उन लोगों की कहानियां अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की एक कोशिश है।

इस लेख को पंजाबी में पढ़ें

ये भी पढ़ें: आसल उत्ताड़ की जंग और परमवीर चक्र विजेता Abdul Hamid की लासानी शहादत  

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