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अली जवाद ज़ैदी: आज़ादी के मतवाले से उर्दू के मोहसिन तक

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ शख़्सियतें ऐसी होती हैं जो सिर्फ़ शायर या अदीब बनकर नहीं रहतीं, बल्कि अपने वक़्त की तारीख़ का एक हिस्सा बन जाती हैं। सैयद अली जवाद ज़ैदी भी उन्हीं अज़ीम हस्तियों में शुमार होते हैं एक ऐसे इंसान जिन्होंने आज़ादी की जंग भी लड़ी, सरकारी ख़िदमात भी अंजाम दीं, और साथ ही उर्दू अदब को 80 से ज़्यादा किताबों का ख़ज़ाना भी दिया।

पैदाइश और तालीम

अली जवाद ज़ैदी 10 मार्च 1916 को उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले (अब मऊ ज़िला) के गांव करहन में एक सैयद ज़मींदार ख़ानदान में पैदा हुए। घर का माहौल मज़हबी था, इसलिए बचपन में ही उन्हें अरबी मदरसे में इस्लामी तालीम के लिए भेजा गया। महज़ 11 साल की उम्र में उनके सर से बाप का साया उठ गया, मगर तालीम का सिलसिला नहीं रुका। उन्होंने गवर्नमेंट जुबिली कॉलेज, लखनऊ से ग्रेजुएशन और लखनऊ यूनिवर्सिटी से एलएलबी की डिग्री हासिल की।

ये दुश्मनी है साक़ी या दोस्ती है साक़ी
औरों को जाम देना मुझ को दिखा दिखा के

आज़ादी की जंग में शिरकत

तालीम के दौरान ही ज़ैदी हिंदुस्तान की आज़ादी की तहरीक से जुड़ गए। उनकी इंक़लाबी शायरी इतनी असरदार थी कि सरोजिनी नायडू जैसी अज़ीम शख़्सियत ने भी उनकी तारीफ़ की। वे ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन के सेक्रेटरी-जनरल चुने गए और 1942 की भारत छोड़ो तहरीक में भी यही ज़िम्मेदारी निभाते रहे। अंग्रेज़ी हुकूमत ने उनकी नज़्मों पर पाबंदी लगा दी और उन्हें गिरफ़्तार करने का वारंट भी जारी किया। आख़िरकार नागपुर में गिरफ़्तार होकर उन्हें जेल की सज़ा हुई।

ऐश ही ऐश है न सब ग़म है
ज़िंदगी इक हसीन संगम है

सरकारी नौकरी और अदबी ख़िदमात

आज़ादी के बाद ज़ैदी सक्रिय सियासत से किनारा कर उत्तर प्रदेश सरकार की सूचना विभाग से जुड़े। बाद में इंडियन इंफ़ॉर्मेशन सर्विस में शामिल हुए और श्रीनगर, दिल्ली, मुंबई और तेहरान जैसी जगहों पर तैनात रहे। अगस्त 1978 में ऑल इंडिया रेडियो से ज्वाइंट डायरेक्टर के ओहदे से रिटायर हुए। नौकरी के साथ-साथ उनकी क़लम भी चलती रही। मीर अनीस और मिर्ज़ा ग़ालिब पर उनकी तहक़ीक़ी किताबें आज भी संदर्भ-ग्रंथ (reference material) मानी जाती हैं।

हिज्र की रात ये हर डूबते तारे ने कहा
हम न कहते थे न आएँगे वो आए तो नहीं

उर्दू अदब में उनकी ख़िदमात के एवज़ में हिंदुस्तान सरकार ने उन्हें 1988 में पद्मश्री से नवाज़ा। इसके अलावा उन्हें ग़ालिब अवॉर्ड, अनीस अवॉर्ड और आज़ादी की जंग में हिस्सा लेने पर ताम्र पत्र भी मिला। दिलचस्प बात यह है कि 1987 में उन्होंने ख़ुद सरकारी और अदबी इदारों से गुज़ारिश की कि उनकी किताबों को आगे किसी इनाम के लिए न देखा जाए।

अपनी ज़िंदगी के आख़िरी साल में कमज़ोर सेहत और आंखों की रौशनी कम होने की वजह से वे लखनऊ के अपने घर तक महदूद हो गए, मगर लिखना नहीं छोड़ा। किसी और से लिखवाकर अपना काम जारी रखा। 6 दिसंबर 2004 को उनका इंतक़ाल हुआ और उन्हें लखनऊ के मलका जहां क़ब्रिस्तान में पूरे सरकारी एज़ाज़ के साथ सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।

अली जवाद ज़ैदी की ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि क़लम और इंक़लाब का रिश्ता कितना गहरा हो सकता है जहां एक तरफ़ आज़ादी की जंग के लिए जेल काटी गई, वहीं दूसरी तरफ़ अदब की ख़िदमत के लिए पूरी ज़िंदगी वक़्फ़ कर दी गई। 

ये भी पढ़ें: आगा हसन अमानत: वो शायर जिसने उर्दू को दिया पहला स्टेज ड्रामा

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