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सरवत हुसैन: दर्द को लफ़्ज़ों में पिरोने वाला शायर

उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने अल्फ़ाज़ों से ज़्यादा अपनी ज़िंदगी की कहानी से दिल को छू जाते हैं। सरवत  हुसैन भी उन्हीं में से एक थे एक ऐसा शायर जिसने अपनी शायरी में दर्द, तन्हाई और मौत के फ़लसफ़े को बड़ी गहराई से बयान किया, और आख़िरकार वही दर्द उनकी अपनी ज़िंदगी का आख़िरी सफ़र बन गया।

शुरुआती ज़िंदगी और तालीम 

सरवत हुसैन 9 नवंबर 1949 को पैदा हुए थे। यह वह दौर था जब बरसों पुराना बरसों का बंटवारा हो चुका था और लाखों परिवार अपनी जड़ों से उखड़कर नई सरज़मीन की तलाश में निकल पड़े थे। उनका ख़ानदान भी उन्हीं में से एक था, जो बंटवारे के बाद कराची में जा बसा। नई जगह, नए हालात – मगर इसी माहौल में सरवत  हुसैन की परवरिश हुई और यहीं उनके अंदर लफ़्ज़ों से मोहब्बत पनपी। 

1973 में उन्होंने कराची यूनिवर्सिटी से उर्दू में एम.ए. की डिग्री हासिल की। तालीम पूरी करने के बाद वे जामिया मिल्लिया कॉलेज, कराची में उर्दू के लेक्चरर मुक़र्रर हुए। यह सिलसिला यहीं नहीं थमा। आगे चलकर उन्होंने कई और कॉलेजों में भी उर्दू पढ़ाई। एक तरफ़ वे क्लासरूम में नई नस्ल को उर्दू अदब की बारीकियां सिखाते रहे, तो दूसरी तरफ़ ख़ुद अपनी शायरी में गहरे और सोचने पर मजबूर करने वाले ख़याल पिरोते रहे।

शायरी का सफ़र

सरवत हुसैन की शायरी में एक अजीब सी संजीदगी और गहराई मिलती है। उनके कलाम में ज़िंदगी के दर्द, रिश्तों के उतार-चढ़ाव, तन्हाई और वजूद के सवालों को बड़ी ख़ूबसूरती से पेश किया गया है। उनका अंदाज़-ए-बयां सीधा-सादा होते हुए भी गहरे मआनी लिए हुए है यही वजह है कि पढ़ने वाला उनके शेर पढ़कर रुक जाता है, दोबारा पढ़ता है, और हर बार कोई नया मतलब निकाल लेता है।

सूरमा जिस के किनारों से पलट आते हैं
मैं ने कश्ती को उतारा है उसी पानी में

उनका पहला शायरी का मजमुआ “आधे सय्यारे पर” 1987 में लाहौर से शाया हुआ। इसके बाद उनका दूसरा मजमुआ “ख़ाकदान” उनके इंतक़ाल के तक़रीबन एक साल बाद मंज़र-ए-आम पर आया, और तीसरा मजमुआ “एक कटोरा पानी” साल 2012 में सामने आया। साल 2015 में उनकी मुकम्मल शायरी का “कुल्लियात” कराची से शाया हुआ, जिसने उनके अदबी क़द को और मज़बूत किया।


जिसे अंजाम तुम समझती हो
इब्तिदा है किसी कहानी की

सरवत हुसैन की शायरी में जो दर्द और उदासी झलकती थी, वह महज़ अल्फ़ाज़ नहीं थे शायद वह उनकी रूह की सच्ची तर्जुमानी थी। 9 सितंबर 1996 को उन्होंने एक चलती ट्रेन के आगे कूदकर अपनी जान दे दी। यह ख़बर उर्दू अदब की दुनिया के लिए एक गहरा सदमा थी। एक ऐसा शायर जिसने अपनी शायरी में मौत, तकलीफ़ और वजूद के सवालों को इतनी गहराई से बरता था, उसका इस तरह जाना पढ़ने वालों को आज भी सोचने पर मजबूर कर देता है।

सरवत  हुसैन आज भले ही हमारे दरमियान नहीं हैं, मगर उनकी शायरी आज भी उर्दू अदब के चाहने वालों के दिलों में ज़िंदा है। उनका कलाम इंसानी ज़िंदगी के उन पहलुओं को छूता है जिन्हें अक्सर लोग बयान नहीं कर पाते। तन्हाई, दर्द, उम्मीद और मायूसी के बीच का वह नाज़ुक रिश्ता। यही वजह है कि आज भी नई नस्ल के अदब-दोस्त उनकी शायरी पढ़ते हैं और उसमें अपने एहसासों की झलक पाते हैं।

मिलना और बिछड़ जाना किसी रस्ते पर
इक यही क़िस्सा आदमियों के साथ रहा

सरवत  हुसैन की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि ज़हनी सेहत और अंदरूनी तकलीफ़ों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए, चाहे इंसान कितना भी हुनरमंद या कामयाब क्यों न लगे।

ये भी पढ़ें: आगा हसन अमानत: वो शायर जिसने उर्दू को दिया पहला स्टेज ड्रामा

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