नुसरत फ़तह अली ख़ान का नाम आते ही ज़ेहन में वो आवाज़ गूंजने लगती है जिसने दुनिया भर के दिलों को सूफ़ियाना रंग में रंग दिया। 13 अक्टूबर 1948 की पैदाइश और 16 अगस्त 1997 को इस दुनिया से रुख़सत हुए नुसरत साहब को “शहंशाह-ए-क़व्वाली” यानी क़व्वाली की दुनिया के बादशाहों का बादशाह कहा जाता है। वो पाकिस्तान के मशहूर गायक, गीतकार, संगीतकार और कई साज़ बजाने में माहिर फ़नकार थे।
बचपन और घराने की विरासत
नुसरत साहब की पैदाइश पंजाब के लायलपुर (आज का फ़ैसलाबाद) में एक पंजाबी मुस्लिम घराने में हुआ था। उनका ख़ानदान जालंधर से ताल्लुक़ रखता था, जहां उनके पुरखों ने संगीत सीखा और इसे अपना पेशा बना लिया। नुसरत साहब अपने पिता फ़तह अली ख़ान की 5वीं औलाद और पहले बेटे थे। उनके पिता ख़ुद एक बड़े संगीतज्ञ और क़व्वाल थे। दिलचस्प बात ये है कि उनके ख़ानदान में क़व्वाली की रवायत करीब 600 साल से चली आ रही थी।
शुरू में उनके वालिद नहीं चाहते थे कि नुसरत क़व्वाली के पेशे में जाएं। वो चाहते थे कि उनका बेटा डॉक्टर या इंजीनियर बने, क्योंकि उस ज़माने में क़व्वालों को समाज में उतनी इज़्ज़त नहीं मिलती थी। लेकिन नुसरत साहब का शौक़ और उनकी काबिलियत इतनी ज़्यादा थी कि आख़िरकार वालिद को उन्हें इजाज़त देनी पड़ी।
शुरुआती दौर
जवानी में नुसरत साहब ने पहले तबला बजाना शुरू किया और साथ-साथ गायकी के बारीक नुक्ते भी सीखते रहे। 1964 में जब उनके वालिद का इंतक़ाल हुआ, तो 1965 में नुसरत साहब अपने चाचा मुबारक अली ख़ान के साथ क़व्वाली पार्टी के मुख्य गायक बन गए। धीरे-धीरे उनकी शोहरत बढ़ती गई और पार्टी “नुसरत फ़तह अली ख़ान एंड पार्टी” के नाम से मशहूर हो गई।
उनका पहला बड़ा हिट गाना पंजाबी क़व्वाली “नी मैं जाना जोगी दे नाल” था, जो सूफ़ी शायर बुल्ले शाह के कलाम पर आधारित था। एक और मशहूर शुरुआती गाना “हक़ अली अली” भी काफ़ी पसंद किया गया।
दुनिया भर में शोहरत
1980 के दशक में नुसरत साहब ने कई शानदार क़व्वालियां पेश कीं, जिनसे इस सूफ़ी फ़न को दुनिया भर में पहचान मिली। इसी दौर में उन्होंने “मेरे रश्के क़मर” जैसा मशहूर गाना पेश किया। “सोचता हूं कि वो कितने मासूम थे” भी इसी दौर की मक़बूल ग़ज़ल-क़व्वाली रही।
1985 में उन्होंने लंदन के WOMAD फ़ेस्टिवल में परफ़ॉर्म किया, जिसने उन्हें पश्चिमी दुनिया में पहचान दिलाई। इसके बाद पेरिस, जापान और अमेरिका में भी उनके कॉन्सर्ट होने लगे। 1988 में उन्होंने मशहूर संगीतकार पीटर गैब्रियल के साथ मिलकर फ़िल्म “द लास्ट टेम्पटेशन ऑफ़ क्राइस्ट” के लिए संगीत दिया। इसी दोस्ती की वजह से वो 1989 में “रियल वर्ल्ड रिकॉर्ड्स” से जुड़ गए, जिससे उनकी पहचान और भी बड़े पैमाने पर फैली।
1990 में उनका मशहूर एल्बम “मस्त मस्त” रिलीज़ हुआ। इसी दौर में उन्होंने कनाडाई गिटारिस्ट माइकल ब्रूक के साथ भी काम किया। 1992-93 में वो अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ वॉशिंगटन में मेहमान कलाकार के तौर पर पढ़ाने भी गए।
1995 में उन्होंने पर्ल जैम बैंड के गायक एडी वेडर के साथ फ़िल्म “डेड मैन वॉकिंग” के लिए दो गाने गाए। इसके अलावा मशहूर संगीतकार ए. आर. रहमान के साथ “गुरूज़ ऑफ़ पीस” नाम का गाना भी रिकॉर्ड किया, जो भारत की आज़ादी की 50वीं सालगिरह पर आए एल्बम “वंदे मातरम” में शामिल हुआ। ये उनके आख़िरी कामों में से एक था इस एल्बम के रिलीज़ होने के सिर्फ़ चार दिन बाद उनका इंतक़ाल हो गया।
बॉलीवुड से रिश्ता
अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में नुसरत साहब ने तीन बॉलीवुड फ़िल्मों के लिए संगीत तैयार किया “और प्यार हो गया”, “कारतूस” और “कच्चे धागे”। इनमें से “कच्चे धागे” तो उनके इंतक़ाल के दो साल बाद 1999 में रिलीज़ हुई। सन्नी देओल की फ़िल्म “दिल्लगी” के लिए भी उन्होंने एक गाना गाया, जो 1999 में आया।
नुसरत साहब काफ़ी अरसे से बीमार चल रहे थे। इलाज के लिए जब वो लंदन गए, तो एयरपोर्ट से सीधे क्रॉमवेल हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां 16 अगस्त 1997 को दिल का दौरा पड़ने से उनका इंतक़ाल हो गया। वो सिर्फ़ 48 साल के थे। उनकी मय्यत फ़ैसलाबाद लाई गई, जहां बड़े पैमाने पर लोगों ने उन्हें आख़िरी सलाम पेश किया।
नुसरत साहब को “वर्ल्ड म्यूज़िक” की शुरुआत करने वालों में गिना जाता है। मशहूर गायक जेफ़ बकली उन्हें अपना “एल्विस” कहते थे और अपने कॉन्सर्ट्स में उनका गाना “ये जो हल्का हल्का सुरूर है” गाया करते थे। पीटर गैब्रियल, ए. आर. रहमान, मिक जैगर और अमिताभ बच्चन जैसी शख़्सियतें भी उनकी बड़ी मुरीद रहीं।
2015 में गूगल ने उनकी 67वीं सालगिरह पर भारत, पाकिस्तान, जापान समेत छह देशों में डूडल बनाकर उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश की।
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