मिर्ज़ा यास यगाना चंगेज़ी उर्दू शायरी की दुनिया का एक ऐसा नाम है जो अपने ज़माने के दूसरे शायरों से बिल्कुल जुदा नज़र आता है। उनका असली नाम मिर्ज़ा वाजिद हुसैन था। शुरू में वह “यास” तख़ल्लुस (शायराना नाम) इस्तेमाल करते थे, बाद में “यगाना” रख लिया और यही नाम उर्दू अदब में हमेशा के लिए मशहूर हो गया।
उनकी पैदाइश 17 अक्तूबर 1884 को अज़ीमाबाद (आज का पटना) के मुहल्ला मुग़लपुरा में हुई थी। 1903 में उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से मैट्रिक पास किया, मगर घर की माली हालत ठीक न होने की वजह से आगे की पढ़ाई पूरी नहीं कर सके। 1904 में उन्हें वाजिद अली शाह के नवासे शहज़ादा मिर्ज़ा मुहम्मद मुक़ीम बहादुर को अंग्रेज़ी पढ़ाने की नौकरी मिली, लेकिन वहां की आबोहवा उन्हें रास नहीं आई और वह वापस अज़ीमाबाद लौट आए।
लखनऊ से मोहब्बत
बीमारी लगातार पीछा करती रही, इसलिए 1905 में सेहत सुधारने की ग़रज़ से यगाना ने लखनऊ का रुख़ किया। यह सफ़र उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। लखनऊ की तहज़ीब, उसकी रंगीन महफ़िलें और वहां का माहौल उन्हें इतना भाया कि वह हमेशा के लिए वहीं के होकर रह गए। यहीं उन्होंने शादी की और यहीं उनकी आख़िरी सांस भी निकली। रोज़ी-रोटी की तलाश में वह लाहौर और हैदराबाद भी गए, मगर दिल हमेशा लखनऊ में ही अटका रहा और आख़िरकार वापस लौट आए।
शोहरत और दुश्मनी
लखनऊ पहुंचने के शुरुआती बरसों में यगाना की बहुत इज़्ज़त हुई। मुशायरों में उन्हें बुलाया जाता, और अपनी गहरी शायरी और सुरीली आवाज़ की बदौलत वह ख़ूब दाद बटोरते। लेकिन धीरे-धीरे उनकी बढ़ती लोकप्रियता लखनऊ के मक़ामी शायरों को खटकने लगी। एक “बाहरी” शायर का इतनी इज़्ज़त पाना उन्हें बर्दाश्त नहीं हुआ, और उनके ख़िलाफ़ साज़िशें रचनी शुरू हो गईं। उनकी आर्थिक तंगी बढ़ाने की कोशिशें की गईं।
यह दुश्मनी उस वक़्त अपनी हद पार कर गई जब यगाना ने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी सालों में कुछ ऐसी रुबाइयां लिखीं जिनसे मज़हबी सोच रखने वाले लोग नाराज़ हो गए। विरोधियों ने इसका फ़ायदा उठाकर माहौल इतना बिगाड़ दिया कि जोश में आए लोग यगाना को गलियों में घसीट लाए, उनके चेहरे पर कालिख़ पोत दी और जुलूस निकाला। असल में यगाना की लड़ाई सिर्फ़ लोगों से नहीं थी। वह उस सोच से लड़ रहे थे जिसमें कुछ गिने-चुने लोग ज़बान, अदब और तालीम को अपनी निजी जागीर समझ बैठते हैं।
शायरी में नयापन
यगाना की सबसे बड़ी ख़ूबी यह थी कि उन्होंने लखनऊ की घिसी-पिटी परंपरागत शायरी को चुनौती दी। उस दौर के ज़्यादातर शायर दाग़ और मुसहफ़ी की बनाई लीक पर ही चलते रहते थे न कोई नया ख़याल, न ज़बान का नया अंदाज़। यगाना ने इसे तोड़ा और अपनी अलग राह बनाई। उन्होंने बीसवीं सदी के सामाजिक, सांस्कृतिक और इंसानी अंदरूनी मसलों को जिस तरह ग़ज़ल में पिरोया, वह उनके समकालीनों में कहीं और नज़र नहीं आता। उनकी यही सोच आगे चलकर आधुनिक उर्दू ग़ज़ल की बुनियाद बनी। ग़ालिब की शायरी पर उनकी तीखी टिप्पणियां भी उस दौर की बे-हद ग़ालिब-भक्ति के जवाब में सामने आई थीं।
मशहूर किताबें
यगाना की अहम रचनाओं में शामिल हैं: नश्तर-ए-यास, आयात-ए-वज्दानी, तराना (शेर संग्रह), गंजीना-ए-दीगर, चराग़-ए-सुख़न और ग़ालिब शिकन।
लखनवी और दिल्ली स्कूल का फ़र्क़
उर्दू शायरी में दो बड़े स्कूल माने जाते हैं दिल्ली स्कूल और लखनवी स्कूल। दिल्ली स्कूल में मीर, ग़ालिब जैसे शायर गहरे दर्द और सादगी को अहमियत देते थे, जबकि लखनवी स्कूल में अलफ़ाज़ की सजावट, नज़ाकत और मुहावरों पर ज़्यादा ज़ोर था। यगाना, बहरी तौर पर लखनऊ में रहकर भी, फ़िक्री तौर पर दिल्ली स्कूल के क़रीब माने जाते हैं, क्योंकि उनकी शायरी में गहराई और फ़लसफ़ा साफ़ झलकता है। यही वजह थी कि वह लखनऊ के पारंपरिक अंदाज़ से टकराते रहे। उनकी शायरी वहां की चली आ रही रवायत को चुनौती दे रही थी, इसलिए मुख़ालफ़त लाज़मी थी।
आज यगाना को उर्दू अदब में उन चंद शायरों में गिना जाता है जिन्होंने रवायत से बग़ावत करके अपनी अलग पहचान बनाई और यही बग़ावत उन्हें हमेशा के लिए यादगार बना गई।
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