दिसंबर 1704 ईस्वी की कड़ाके की ठंड वाली पोह की रातें थी। गुरु गोबिंद सिंह जी, जिनके साथ कभी एक बड़ा परिवार और लोगों का सम्मान था, उस दिन वो अकेले ही पैदल चले जा रहे थे। आनंदपुर साहिब से नीले घोड़े पर सवार होकर निकले गुरु जी सरसा नदी पार करके चमकौर की गढ़ी पहुंचे थे। लेकिन गढ़ी से निकलते वक़्त उन्होंने अपना घोड़ा भी छोड़ दिया और पैदल ही आगे चल पड़े।
गुरु जी ने कंधे पर बंदूक लटका रखी थी और शरीर पर शस्त्र सजे हुए थे। एक योद्धा की तरह वो गढ़ी से बाहर निकले। उन्हें मालूम था कि अगर रास्ते में दुश्मन से सामना हो गया, तो निहत्थे पकड़ लिए जाने से बेहतर है कि लड़ते हुए शहीद हो जाएं। गुरु जी के पास कुछ ख़ास हथियार भी थे, जो उनके बुज़ुर्गों की यादगार थे। वो इन हथियारों को हमेशा बहुत संभालकर रखते थे। गढ़ी छोड़ते वक़्त भी ये हथियार उनकी कमर से बंधे हुए थे।
ये वही हथियार थे, जो गुरु हरगोबिंद साहिब जी के वक़्त की निशानी माने जाते थे। गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने इन्हें संभालकर रखा था। दिल्ली जाने से पहले गुरु तेग बहादुर जी ने यही हथियार बाल गोबिंद राय को सौंप दिए थे। अब अंधेरी रात में चमकौर छोड़कर गुरु जी पश्चिम की तरफ़ चल पड़े। चलते-चलते वो एक गांव, रहिमपुर के पास से गुज़रे और कीड़ी गुज्जरां वाली के करीब पहुंचे। ये जगह चमकौर से करीब तीन मील दूर थी।
यहां गुरु जी को गांव के दो गुज्जर, अल्फ़ू और गामूं, अपनी खोई हुई भैंसों को तलाश करते हुए मिले। गुरु जी ने उन्हें कुछ मोहरें देकर ख़ामोश रहने को कहा और आगे बढ़ गए। वहां से तेज़ी से आगे बढ़ते हुए बारिश के मौसम की वजह से गुरु साहिब की जूती मिट्टी में धंस गई और वो नंगे पैर हो गए। नंगे पैर चलते हुए वो एक जंड के पेड़ के नीचे रुके। पैरों को साफ़ किया और फिर आगे चल पड़े। आज इसी जगह जंड साहिब नाम का गुरुद्वारा मौजूद है।
नंगे पैर चलते-चलते गुरु जी बहलोल पहुंचे। यहां उन्होंने गुरु घर से वाक़िफ़ नगीना मल को बुलाया। रात का अंधेरा था और गुरु जी थके हुए और बदहवास हालत में उनके सामने आए थे। उन्हें इस हालत में देखकर नगीना मल भी घबरा गया। इसके बाद नगीना मल गुरु जी को जंड और क्रीर के झाड़ों के बीच से निकालते हुए Machhiwara (माछीवाड़ा) से करीब तीन मील पहले एक जगह तक ले गया और फिर वापस लौट गया। आज इसी जगह झाड़ साहिब नाम का मशहूर गुरुद्वारा मौजूद है।
अब गुरु जी चलते-चलते Machhiwara (माछीवाड़ा) के करीब पहुंच चुके थे। उस वक़्त Machhiwara (माछीवाड़ा) एक मशहूर क़स्बा था। गांव के उत्तर की तरफ़ सतलुज दरिया की एक धारा बहती थी। गुरु जी Machhiwara (माछीवाड़ा) से बाहर एक घने बाग़ में पहुंचे। चारों तरफ़ अंधेरा था। बाग़ के पास ही एक कुआं था। गुरु जी कुएं के पास जाकर बैठ गए। उन्होंने कुएं से पानी निकाला और पानी पिया। थोड़ी दूर एक समतल जगह देखकर खाली टिंड को सिरहाने रखा और वहीं ज़मीन पर लेट गए।
ये जगह चमकौर साहिब से करीब 12 मील दूर थी। कई रातों से गुरु जी ठीक से सोए नहीं थे और लगातार पैदल चलने की वजह से बहुत थक चुके थे। इसलिए उनकी आंख जल्दी लग गई। इतिहासकार लिखते हैं कि उस वक़्त गुरु जी के लिए गहरी नींद और कुछ देर बेफ़िक्री से सोना भी बेहद ज़रूरी था। क्योंकि वो अपने बेटों को बहादुरी और शहादत की राह पर आगे बढ़ते हुए देख चुके थे।
सूरा सो पहिचानीऐ जु लरै दीन के हेत।
पुरजा पुरजा कट मरे कभू न छाडै खेत ।।
अर्थ: वही सच्चा सूरमा है, जो अपने दीन की ख़ातिर लड़े।
टुकड़े-टुकड़े होकर भी मर जाए, लेकिन कभी मैदान न छोड़े।

अभी कल ही दोनों बड़े साहिबज़ादों ने टुकड़े-टुकड़े होकर शहादत पाई थी। ये गुरु जी के अपने उसूल की जीत थी। दोनों बड़े साहिबज़ादों ने चमकौर का जंग का मैदान जीता और मौत को गले लगाया था। सुबह होने वाली थी और गुरु जी की आंख खुल गई।
पोह की ठंडी हवा और गीली ज़मीन ने उन्हें ज़्यादा देर तक सोने नहीं दिया था। आंख खुलते ही उनके दिल में ख़याल आया कि मेरे प्यारे भाई संगत सिंह और भाई संत सिंह भी शहीद हो चुके होंगे। उनकी रूहें अब अपने यार, अपने महबूब के पास जा रही होंगी।गुरु ने वैराग्य से भरे स्वर में गाया –
मित्र प्यारे को हाल मुरीदों का कहना ॥
तुधु बिनु रोगु रजाईआं दा ओढण नगु निवासां दा रहणा॥
शूल सुराही खंजर पियाला बिंगु कसाईयां दा सहणा ॥
यारड़े दा साणू सथ्थर चंगा भठ खेड़ियां दा रहणा ॥
अर्थ: मेरे प्यारे दोस्त को मेरा हाल-ए-दिल बता देना।
तेरे बिना रेशमी बिस्तर भी हमें रोग जैसे लगते हैं,
और सांपों के बसेरे में रहना भी मंज़ूर है।
कांटों को सुराही, खंजर को प्याला समझकर पीना पड़े,
तो भी यह दर्द सह लेंगे।
अपने यार के साथ ज़मीन पर सोना हमें अच्छा लगता है,
लेकिन बेगानों के महलों में रहना हमें बिल्कुल पसंद नहीं।

चमकौर की गढ़ी से गुरु जी के साथ निकले भाई दया सिंह, भाई धर्म सिंह और भाई मान सिंह बाद में उनसे बिछड़ गए थे। गुरु जी को तलाश करते हुए, उनकी आवाज़ सुनकर वो उसी तरफ़ चल पड़े। जब वो और करीब पहुंचे तो गुरु साहिब के दाएं हाथ के दस्ताने के अंगूठे में जड़ा एक नगीना चमकता हुआ दिखाई दिया।
तीर-कमान चलाने वाले माहिर सूरमा दस्ताना पहनकर कई-कई घंटे तक तीर चलाते थे। गुरु जी के दस्ताने पर भी एक ख़ूबसूरत नगीना जड़ा हुआ था। उसी नगीने की चमक ने इन सिंहों को गुरु जी तक पहुंचने का रास्ता दिखाया। जब सिंह पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि गुरु जी ज़मीन पर लेटे हुए हैं। उनके पैरों के तलवे छिल चुके थे और उनमें जमा हुआ ख़ून साफ़ दिखाई दे रहा था।
गुरु जी कुछ पूछते, उससे पहले ही सिखों ने अर्ज़ की—“हे नानक की दसवीं जोत, यहां बेफ़िक्री से पड़े रहने का वक़्त नहीं है। पातशाह, सूरज निकलने वाला है और यहां गांव से बाहर रुकना ठीक नहीं। अगर गांव के लोगों ने आपको देख लिया तो बात फैलते देर नहीं लगेगी।”
गुरु जी के सिखों ने बताया कि गुलाबा नाम के सिख मसंद का घर यहां से बहुत पास है। हमें वहां पहुंच जाना चाहिए। जब गुलाबे को इस बात का पता चला तो वो भी वहां पहुंच गया। उसने गुरुजी को नमन किया और अपने घर चलने की अर्ज़ की। उधर, जब पहाड़ी और मुग़ल फौजों को पता चला कि गढ़ी में जिसे उन्होंने मारा था, वो गुरु गोबिंद सिंह जी नहीं थे, तो उन्होंने करीब 10 हज़ार सैनिकों को अलग-अलग दस्तों में बांटकर गुरु जी को ज़िंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए चारों तरफ़ भेज दिया।
रात के वक़्त गुरु साहिब गुलाबे मसंद के चबूतरे वाले कमरे में पहुंचे। यहां गुलाबे मसंद और उसके भाई पंजाबी ने मिलकर गुरु जी की बहुत सेवा की। उन्हें प्रसादा छकाया और आराम करने के लिए अच्छा-सा पलंग भी तैयार किया। माछीवाड़े में गुलाबे और पंजाबी की एक बहन हर दई भी रहती थी। वो गुरुद्वारे की बहुत प्यारी श्रद्धालु थी और हर साल गुरु जी के दर्शन के लिए आनंदपुर साहिब जाती थी। वो हमेशा अपने हाथों से काते हुए खद्दर के कपड़े गुरु जी को भेंट करती थी।
लेकिन पिछले कई सालों से वो आनंदपुर साहिब नहीं जा सकी थी। उसके दिल में गुरु जी के दर्शन करने की बहुत तड़प थी। जब हर दई को पता चला कि गुरु जी Machhiwara (माछीवाड़े) आए हैं, तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पिछले दो-तीन सालों से वो जो पोशाकें गुरु जी को भेंट नहीं कर पाई थी, उन्हें लेकर वो अपने भाइयों गुलाबे और पंजाबी के घर पहुंच गई।
गुलाबे के घर गुरु जी को आए अभी एक ही रात बीती थी। दोनों भाइयों ने उनकी बहुत सेवा की। लेकिन जब उन्हें पता चला कि मुग़ल सेना गुरु जी को तलाश करते हुए Machhiwara (माछीवाड़े) तक पहुंच चुकी है, तो वो डर गए। उन्होंने ये बात गुरु जी को बता दी और साथ ही खद्दर का एक रेज़ा और कुछ नक़द रुपये रखकर गुरु जी को माथा टेका।
गुरु गोविंद सिंह जी मुस्कुराए। वो समझ गए कि गुलाबा डर गया है और अब उन्हें अपने घर से विदा करना चाहता है। Machhiwara (माछीवाड़ा) से कुछ दूर नबी ख़ां और गनी ख़ां नाम के दो पठान भाई रहते थे। दोनों गुरु घर के करीबी श्रद्धालुओं में से थे और दक्षिण दिशा की तरफ़ रहते थे। ये दोनों भाई गुरु जी को बहुत प्यारे थे। पहले कुछ समय तक उन्होंने आनंदपुर साहिब में नौकरी भी की थी। बाद में वो घोड़ों की सौदागरी करने लगे। वो दूर-दराज़ के इलाक़ों से अच्छे घोड़े लाकर बेचते थे और इसके बदले उन्हें अलग-अलग इनाम भी मिलते थे।
गुरु गोबिंद सिंह जी ने इन दोनों भाइयों को गुलाबे के चबूतरे वाले कमरे में बुलाया। दोनों भाई गुरु जी से मिलने के लिए गुलाबे के घर पहुंच गए। जब गुरु जी को पता चला कि नबी ख़ां और गनी ख़ां गुलाबे के घर पहुंच गए हैं, तो उन्होंने दोनों को अपने पास बुलाया। दोनों भाइयों ने गुरु जी के दर्शन किए और उन्हें सिजदा किया।
भाई संतोक़ सिंह जी ने अपनी रचना ‘सूरज प्रकाश’ में इस घटना का ज़िक्र इस तरह किया है।
सदन गुलाबे के तब आइ सुनि स्री प्रभ ने लीन हकार।
दर्शन ते अभि बंदन करके बैठ गइ ढिग कीन उचार
गुलाबे के घर जब वो पहुंचे, तो गुरु जी ने उन्हें अपने पास बुलाया। गुरु जी के दर्शन करके और उन्हें नमन करने के बाद, दोनों उनके पास बैठ गए। जब ये दोनों पठान भाई गुरु जी के पास पहुंचे, तो उनकी पूरी दाढ़ियां थी और वो पठानी लिबास में नीले कपड़े पहने हुए थे। गुरु जी ने प्यार भरे बोलों के साथ उन्हें अपने पास बिठाया। लेकिन दोनों भाई ग़म से भरे हुए थे।

उन्होंने गुरु जी से कहा कि मुग़ल फौज के दस्ते माछीवाड़े शहर में घूम रहे हैं। इसलिए गुलाबे के घर ठहरना आपके लिए ज़्यादा ठीक नहीं है। आप हमारे ग़रीबख़ाने में चलकर ठहरें और वहां से आगे की हिफ़ाज़त का इंतज़ाम सोचें।
गुरु जी उनकी बात सुनकर पहले ख़ामोश हो गए और फिर मुस्कुराए। भाई दया सिंह जी ने गुरु जी से उनकी ख़ामोशी और मुस्कुराने की वजह पूछी। गुरु जी ने फ़रमाया, “आख़िर कब तक छिपते फिरेंगे? पहले पंज प्यारों और गुरु खालसा के हुक्म को मानकर हमने चमकौर की गढ़ी छोड़ दी थी, लेकिन अब तो यहीं जूझकर मर जाना ही हमें बेहतर लगता है।” ये सुनकर सभी ने गुरु जी के चरण पकड़ लिए और अर्ज़ की, “महाराज, पंथ वाली, सतगुरु जी!
चमकौर से हमने जिस मक़सद के लिए आपको वहां से निकलने के लिए राज़ी किया था, वो अभी पूरा नहीं हुआ है। इसलिए अब जहां भी महफ़ूज़ जगह मिलती है, वहां जाने का इंतज़ाम करना चाहिए। फिलहाल पठान भाइयों की अर्ज़ क़बूल करके उनके घर चलना ही बेहतर होगा।”
तब गुरु जी ने गनी ख़ां और नबी ख़ां के साथ जाने की मंज़ूरी दे दी और उनकी हवेली में जाकर ठहर गए। गुलाबे और पंजाबी के घर एक रात गुज़ारने के बाद, गुरु जी ने नबी ख़ां और गनी ख़ां के घर दो रातें गुज़ारी। यहीं से उन्होंने फ़ारसी ज़बान के अपने उस्ताद सैयद अनायत अली को भी बुलावा भेजा। बचपन में सैयद अनायत अली ने ही गुरु गोबिंद सिंह जी को फ़ारसी ज़बान की तालीम दी थी। वो यहां से करीब दो मील दूर नूरपुरे बेट में अपने घर में रहते थे।
अपने शागिर्द के बारे में ये सुनकर कि गुरु जी इस तरफ़ आए हुए हैं, वो रुक नहीं सके और अगले ही दिन उनसे मिलने आ गए। लेकिन गुरुजी को देखते ही उनका कलेजा कांप उठा। वो जानते थे कि जिस शागिर्द को उन्होंने गुरु तेग बहादुर जी का शहज़ादा समझकर आनंदपुर साहिब में फ़ारसी की तालीम दी थी, वही आज दर-दर भटक रहा है।
उनके पैरों में छाले पड़े हुए थे, कपड़े मैले थे और वो एक मुसाफ़िर की तरह उजड़े हुए हाल में घूम रहे थे। गुरु जी ने अपने फ़ारसी के उस्ताद को पूरी बात विस्तार से बताई। इसके बाद सैयद अनायत अली ने गुरु जी के साथ मिलकर एक तरकीब सोची, ताकि उन्हें यहां से सुरक्षित निकाला जा सके।
भाई संतोक़ सिंह जी भी लिखते हैं कि गुरु जी और अनायत अली ने पहले एक पलंग पर भाई दया सिंह जी को ऊंच के पीर का रूप देकर बिठाया। जब शक की वजह से मुग़ल फौज ने उस पलंग को घेर लिया और अपनी हिरासत में ले लिया और एक रात तक उसे निगरानी में रखा, तो सैयद अनायत अली ने गवाही दी कि ये ऊंच के पीर हैं। ये हज करके आए हैं, बड़े नेक और करामात वाले हैं और इस वक़्त सफ़र पर हैं। ये वो शख़्स नहीं हैं, जिसे आप तलाश कर रहे हैं।
बाद में मौक़ा पाकर उसी पलंग पर भाई दया सिंह जी की जगह गुरु गोबिंद सिंह जी को बिठाया गया और उन्हें माछीवाड़े से आगे रवाना कर दिया गया। इससे पता चलता है कि न तो सैयद अनायत अली ने झूठ बोला और न ही गुरु जी ने अपनी ज़िंदगी के किसी उसूल को तोड़ा।
अब गुरु गोबिंद सिंह जी को पलंग पर बिठाकर, ऊंच के पीर के रूप में सैयद अनायत अली ख़ां और गुरु जी के सिख उन्हें घुलाल ले पहुंचे। घुलाल माछीवाड़े से करीब पांच-छह मील दक्षिण की तरफ़ बसा हुआ था। घुलाल से ही गुरु जी ने सैयद अनायत ख़ां को एक प्रशंसा-पत्र और हुक्मनामा देकर विदा किया।
घुलाल एक पुराना और अच्छी आबादी वाला गांव था। यहां गुरु जी ने फ़रमाया कि गांव के झंडा लुहार के पास हमारी एक अमानत है, उसे लेना है। जब झंडे लुहार को बुलाया गया, तो वो पहले गुरु जी को पहचान नहीं सका। तब गुरु जी ने उससे दो तलवारों, 21 तीरों और दो कमानों के बारे में पूछा। ये सुनते ही झंडे को वो बात याद आ गई, जब उसने गुरु घर में श्रद्धा से ये शस्त्र भेंट करने का परमात्मा से वादा किया था।
अब झंडा लुहार खुशी-खुशी वो सामान लेकर आया और गुरु जी के चरणों में भेंट कर दिया। गुरु जी ने उसे आशीर्वाद दिया। आज इसी जगह घुलाल में गुरुद्वारा शस्त्र भेंट साहिब स्थापित है। इस गुरुद्वारे की तारीख़ी अहमियत है। शस्त्र हासिल करने के बाद गुरु जी घुलाल से लल्लां की तरफ़ रवाना हो गए।
लेख– असिस्टेट प्रो. रविंदर सिंह
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