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कृष्ण एक नाम, कई नज़रिए… जब उर्दू शायरों ने कान्हा को अपने अल्फ़ाज़ में उतारा

कृष्ण सिर्फ़ एक धार्मिक आस्था का नाम नहीं हैं। वो मोहब्बत हैं, हुस्न हैं, शरारत हैं, उम्मीद हैं और सबसे बढ़कर इंसान के दिल से जुड़ा एक एहसास हैं। यही वजह है कि कृष्ण की कहानी सिर्फ़ मंदिरों, भजनों और लोकगीतों तक महदूद नहीं रही। उर्दू के कई शायरों ने भी कान्हा को अपने-अपने अंदाज़ में देखा, महसूस किया और अपने अल्फ़ाज़ में जगह दी।

जन्माष्टमी का मौक़ा आते ही कृष्ण के जन्म की वो रात याद आती है, जब मथुरा की जेल में देवकी और वसुदेव के घर नंदलाल ने जन्म लिया। उर्दू के मशहूर शायर नज़ीर अकबराबादी ने अपनी नज़्म में इसी जन्म-पल को बेहद दिलकश अंदाज़ में बयान किया है। उनके लिए कृष्ण का जन्म सिर्फ़ एक बच्चे की पैदाइश नहीं, बल्कि अंधेरे में रोशनी आने का पैग़ाम है।

“था नेक महीना भादों का और दिन बुध गिनती आठन की
फिर आधी रात हुई जिस दम और हुआ नछत्तर रोहिनी भी।”

नज़ीर की ज़बान में कृष्ण का जन्म किसी दूर की कहानी जैसा नहीं लगता। ऐसा महसूस होता है जैसे कोई अपने ही घर में होने वाली खुशी का ज़िक्र कर रहा हो। नज़्म के आख़िर में वो उसी खुशी को झूले और पालने से जोड़ते हुए कहते हैं।

“कर याद नज़ीर अब हर साअ’त, उस पालने और उस झूले की
आनंद से बैठो चैन करो, जै बोलो कान्ह झंडूले की।”

यानी नज़ीर के लिए कृष्ण जन्म खुशी, उल्लास और इंसानी मेल-जोल का जश्न है।

इसी सिलसिले में एक नाम ऐसा भी है, जिसके बिना कृष्ण-भक्ति की ये दास्तान अधूरी लगती है रसखान

रसखान का कृष्ण-प्रेम इतना गहरा था कि उन्होंने अपनी मशहूर रचना में अपनी अगली हर मुमकिन ज़िंदगी को कृष्ण की धरती से जोड़ दिया। 

“मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गांव के ग्वारन
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मंझारन
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन
जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी-कूल कदम्ब की डारन।”

रसखान की इन पंक्तियों में भक्ति के साथ ऐसी मोहब्बत है, जिसमें कृष्ण से जुड़ी हर चीज़ उन्हें प्यारी है। वो कहते हैं कि इंसान बनूं तो गोकुल में रहूं, पशु बनूं तो नंद बाबा की गायों के बीच चरूं, पत्थर बनूं तो गोवर्धन का बनूं और पक्षी बनूं तो यमुना किनारे कदंब की डाल पर बसेरा करूं।

ये सिर्फ़ भक्ति नहीं, बल्कि उस मिट्टी से मोहब्बत है जिसे कृष्ण ने अपनी मौजूदगी से मुक़द्दस बना दिया।  अपने कलम से अलग अलग अंदाज़ में कृष्ण-प्रेम को शायरों ने सुनहरे अल्फ़ाज़ में बयां किया । 

इसी तरह उर्दू शायरी में इंशा अल्लाह ख़ां ‘इंशा’ ने कृष्ण के हुस्न और उनकी दिलकश शख़्सियत को अपने अंदाज़ में देखा। वहीं हफ़ीज़ जालंधरी ने कृष्ण में रोशनी और रूहानी असर महसूस किया। उनकी नज़्म “कृष्ण कन्हैया” इस बात की मिसाल है कि कृष्ण किस तरह उर्दू शायरी के विषय बने।

फ़िराक़ गोरखपुरी ने कृष्ण की कहानी को इतिहास और इंसानी जज़्बात के आईने में देखा। वसुदेव का नवजात कृष्ण को लेकर मथुरा की कैद से निकलना उनके अशआर में एक बेहद असरदार मंज़र बनकर सामने आता है।

“वो रातों-रात ‘सिरी-कृष्ण’ को उठाए हुए
बला की क़ैद से ‘बसदेव’ का निकल जाना।”

फ़िराक़ के कृष्ण सिर्फ़ एक धार्मिक किरदार नहीं, बल्कि भारतीय तहज़ीब और उसकी सदियों पुरानी सांस्कृतिक याद का हिस्सा हैं।

कृष्ण पर लिखने वालों की फेहरिस्त और भी दिलचस्प है। इन तमाम शायरों को पढ़ते हुए एक बात साफ़ नज़र आती है कृष्ण हर शायर के लिए एक जैसे नहीं हैं।

किसी ने उनमें हुस्न देखा, किसी ने मोहब्बत। किसी ने उन्हें रोशनी माना, किसी ने उम्मीद का पैग़ाम। नज़ीर ने कृष्ण जन्म की खुशी को आम इंसान की खुशी की तरह महसूस किया, रसखान ने कृष्ण की धरती को अपनी हर संभावित ज़िंदगी से जोड़ दिया और फ़िराक़ ने कृष्ण की कहानी को भारतीय इतिहास और तहज़ीब के एक हिस्से की तरह देखा।

शायद यही उर्दू शायरी की सबसे ख़ूबसूरत बात है वो किसी किरदार को सिर्फ़ एक दायरे में क़ैद नहीं करती। वो उसे इंसानी एहसासों के आईने में देखती है। अता आबिदी ने इसी साझा एहसास को बहुत ख़ूबसूरती से कहा

“आज भी ‘प्रेम’ के और ‘कृष्ण’ के अफ़्साने हैं
आज भी वक़्त की जम्हूरी ज़बां है उर्दू।”

और शायद जन्माष्टमी के मौक़े पर इन अल्फ़ाज़ का मतलब और गहरा हो जाता है।

कृष्ण एक नाम हैं, मगर उन्हें देखने के अंदाज़ अनगिनत हैं। वो किसी के लिए कान्हा हैं, किसी के लिए मुरलीधर, किसी के लिए प्रेम के प्रतीक और किसी के लिए हिंदुस्तानी तहज़ीब की साझा विरासत।

इस जन्माष्टमी, कृष्ण की कहानी सिर्फ़ उनके जन्म की कहानी न हो। इसे उन अल्फ़ाज़ की कहानी की तरह भी देखें, जिन्होंने सदियों से कृष्ण को अपने दिल में जगह दी।

क्योंकि शायद हिंदुस्तान की ख़ूबसूरती यही है यहां मोहब्बत सरहदों में नहीं बंधती। कृष्ण सिर्फ़ मंदिरों में नहीं मिलते, वो कविताओं में मिलते हैं, नज़्मों में मिलते हैं, उर्दू के अल्फ़ाज़ में मिलते हैं और उस साझा तहज़ीब में मिलते हैं, जिसे हिंदुस्तान सदियों से अपने सीने में संजोए हुए है।

ये भी पढ़ें: राबिया बसरी: मोहब्बत-ए-इलाही की पहली सूफ़ी शायरा 

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