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राखी के धागे में बंधा भाई-बहन का प्यार, उर्दू शायरों ने भी सजाए जज़्बात

रक्षाबंधन भाई-बहन के अटूट प्यार और ख़ुलूस का त्योहार है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और भाई उनकी हिफ़ाज़त और खुशियों का वादा करते हैं। राखी का यह नाज़ुक-सा धागा दरअसल मोहब्बत, भरोसे और रिश्ते की मज़बूती की निशानी है।

भाई-बहन के इस ख़ूबसूरत रिश्ते को उर्दू शायरों ने भी अपने अंदाज़ में बयां किया है। किसी ने राखी को मोहब्बत का पैग़ाम कहा, तो किसी ने इसे बहन के जज़्बात और भाई की हिफ़ाज़त से जोड़कर देखा। रक्षाबंधन के मौके़ पर आइए पढ़ते हैं कुछ ऐसे ही दिल को छू लेने वाले अशआर।

मुनव्वर राना ने बहन की अहमियत को बेहद सादगी और असरदार अंदाज़ में बयां किया।

किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बांधेगा
अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बांधेगा

मुनव्वर राना

राखी का रंगीन धागा महज़ एक डोर नहीं, बल्कि भाई-बहन के प्रेम और रिश्ते की मज़बूत ज़ंजीर है।

यूंही देखूं जो राखी को तो ये रंगीन डोरा है
जो देखूं ग़ौर से इस को तो है ज़ंजीर लोहे की

जो बढ़ कर क़ैद कर लेती है आफ़त अपने भाई की

फौज़िया मुग़ल

वहीं इमाम आज़म राखी को सिर्फ़ एक धागा नहीं, बल्कि उम्मीद और आस्था से जोड़ते हुए कहते हैं।

आस्था का रंग आ जाए अगर माहौल में
एक राखी ज़िंदगी का रुख़ बदल सकती है आज

इमाम आज़म

मुस्तफ़ा अकबर ने कहा- राखी बहनों की मोहब्बत और रिश्ते की अज़मत की निशानी है।

बहनों की मोहब्बत की है अज़मत की अलामत
राखी का है त्योहार मोहब्बत की अलामत

मुस्तफ़ा अकबर

उर्दू के मशहूर शायर फ़िराक़ गोरखपुरी ने भी रक्षाबंधन की सुबह का बेहद दिलकश मंज़र अपनी रुबाई में पेश किया।

रक्षा-बंधन की सुब्ह रस की पुतली
छाई है घटा गगन पे हल्की हल्की

फ़िराक़ गोरखपुरी

नज़ीर अकबराबादी की नज़र में राखी

राखी पर उर्दू शायरी की बात हो और नज़ीर अकबराबादी का ज़िक्र न हो, ऐसा मुमकिन नहीं। नज़ीर ने आम हिंदुस्तानी ज़िंदगी, उसके त्योहारों और रस्मों को अपनी शायरी का हिस्सा बनाया। उनकी लंबी नज़्म ‘राखी’ में उस दौर के बाज़ार, रंग-बिरंगी राखियों और त्योहार की रौनक का बेहद खूबसूरत चित्र मिलता है।

चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी
सुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी

नज़ीर अकबराबादी

उनकी नज़्म में राखी सिर्फ़ भाई की कलाई पर बंधने वाला धागा नहीं है, बल्कि पूरे समाज में फैली खुशी और रंगीनियों की तस्वीर है। कहीं रेशम और ज़री की राखियां हैं, तो कहीं मोतियों की चमक और मेहंदी से सजे हाथ।

मची है हर तरफ़ क्या क्या सलोनों की बहार अब तो
हर इक गुल-रू फिरे है राखी बांधे हाथ में ख़ुश हो

नज़ीर अकबराबादी

नज़ीर की ख़ासियत यही थी कि उन्होंने आम आदमी की ज़िंदगी और हिंदुस्तान की मिली-जुली तहज़ीब को अपनी शायरी में बड़ी ख़ूबसूरती से जगह दी। उनकी ‘राखी’ भी इसी गंगा-जमुनी तहज़ीब, भाईचारे और मोहब्बत की एक दिलकश तस्वीर पेश करती है।

रक्षाबंधन का त्योहार हमें याद दिलाता है कि रिश्ते सिर्फ़ ख़ून के नहीं, बल्कि मोहब्बत, भरोसे और अपनापन से भी मज़बूत होते हैं। राखी का छोटा-सा धागा इसी बड़े जज़्बे की मिसाल है एक ऐसा रिश्ता, जिसे शायरों ने अपने अल्फ़ाज़ में हमेशा के लिए अमर कर दिया।

ये भी पढ़ें: Raksha Bhandan पर क्रोशिया राखियां बनाती निज़ामुद्दीन बस्ती की महिलाएं 

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