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मुनीर शिकोहाबादी: 1857 की क्रांति और शायरी की बुलंद आवाज़

उत्तर प्रदेश के फिरोज़ाबाद ज़िले में बसा शिकोहाबाद सिर्फ़ अपनी पहचान के लिए ही मशहूर नहीं, बल्कि इसका रिश्ता उर्दू अदब के एक जांबाज़ और क्रांतिकारी शायर मुनीर शिकोहाबादी से भी रहा है। मुनीर उन शायरों में शामिल थे, जिनकी ज़िंदगी में शायरी के साथ-साथ वतन से मोहब्बत और आज़ादी का जज़्बा भी दिखाई देता है।

मुनीर शिकोहाबादी की पैदाइश 1814 में शिकोहाबाद में हुई। उनका असली नाम सैयद इस्माईल हुसैन था और ‘मुनीर’ उनका तख़ल्लुस था। उनके वालिद नौकरी के सिलसिले में अकबराबाद में रहते थे, इसलिए मुनीर की शुरुआती तालीम भी वहीं हुई। बाद में वह लखनऊ चले आए।

उस दौर का लखनऊ उर्दू शायरी और अदब का बड़ा मरकज़ था। इसी शे’री माहौल ने मुनीर के अंदर शायरी का शौक़ पैदा किया। उन्होंने पहले मशहूर शायर नासिख़ से अपना कलाम दुरुस्त कराया और फिर रश्क की शागिर्दी इख़्तियार की। धीरे-धीरे उनकी पहचान एक बेहतरीन शायर के तौर पर बनने लगी।

लेकिन मुनीर की ज़िंदगी सिर्फ़ शायरी तक महदूद नहीं रही। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और आज़ादी की जद्दोजहद से जुड़े। वह नवाब बांदा के उन लोगों में शामिल हो गए जो अंग्रेज़ों से बदला लेना चाहते थे। इस गिरोह की ख़बर अंग्रेज़ों को लग गई और कई लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया। मुनीर को भी लंबे समय तक क़ैद और बंद की तकलीफ़ झेलनी पड़ी।

रिहाई के बाद उनकी ज़िंदगी का एक नया दौर शुरू हुआ और आख़िरकार वह रामपुर दरबार से जुड़ गए। 1880 में रामपुर में ही उनका इंतक़ाल हुआ।

शायरी की ख़ास पहचान  

मुनीर शिकोहाबादी की शायरी पर नासिख़ का असर साफ़ तौर पर नज़र आता है। उन्होंने मुश्किल ज़मीनों में लंबी-लंबी ग़ज़लें कहीं। उनके कलाम की ख़ास पहचान लफ़्ज़ों की दिलकशी, ख़ूबसूरत तर्ज़-ए-बयान और शब्दों के फ़नकाराना इस्तेमाल में दिखाई देती है। उन्होंने ग़ज़ल को भी क़सीदे जैसी शान, वक़ार और असर देने की कोशिश की। उनकी शायरी में हर दिल के जज़्बात की ज़बान को अलग ही अंदाज़ में पेश किया गया। 

“जाती है दूर बात निकल कर ज़बान से
फिरता नहीं वो तीर जो निकला कमान से”

इस शेर में मुनीर ने बड़ी सादगी से ज़बान से निकली बात की अहमियत समझाई है। जैसे कमान से निकला तीर वापस नहीं आता, उसी तरह इंसान की कही हुई बात भी वापस नहीं ली जा सकती।

“आंखें ख़ुदा ने बख़्शी हैं रोने के वास्ते
  दो कश्तियां मिली हैं डुबोने के वास्ते”

मुनीर की शायरी में मोहब्बत, दर्द, जुदाई और ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तें अलग-अलग रंगों में दिखाई देती हैं।

“ज़माने की फ़िक्रों ने खाया है हम को
  हज़ारों के मुंह के निवाले हुए हैं”

मुनीर शिकोहाबादी की शायरी को सिर्फ़ एक शायर की आवाज़ मानना कम होगा। उनकी ज़िंदगी और उनका कलाम उस दौर की कहानी भी सुनाते हैं, जब एक तरफ़ उर्दू अदब अपने नए रंग तलाश कर रहा था और दूसरी तरफ़ हिंदुस्तान अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ जद्दोजहद कर रहा था।

मुनीर शिकोहाबादी ने अपने कलाम और अपनी ज़िंदगी, दोनों से यह साबित किया कि शायर सिर्फ़ ख़्वाब देखने वाला नहीं होता, बल्कि अपने दौर की आवाज़ भी बन सकता है।

ये भी पढ़ें: अमृता प्रीतम: मोहब्बत, तन्हाई और बंटवारे के दर्द की आवाज़

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