बचपन में हाथ में सुई और धागा पकड़ा था, शायद तब Neelofar (नीलोफ़र) ने सोचा भी नहीं होगा कि यही हुनर एक दिन उनकी पहचान बन जाएगा। श्रीनगर के नवाकदल की रहने वाली नीलोफ़र ने पारंपरिक कढ़ाई से अपने सफ़र की शुरुआत की, लेकिन इसे आगे बढ़ाने का रास्ता बिल्कुल आसान नहीं था। उन्होंने दोबारा शुरुआत करने के लिए अपने सोने के गहने बेच दिए और सिर्फ़ 4,000 रूपये से अपने काम को फिर से खड़ा किया। आज उनकी मेहनत सिर्फ़ उनकी अपनी पहचान नहीं है, बल्कि 40 से ज़्यादा कारीगरों के लिए रोज़गार का ज़रिया बन चुकी है।
बचपन की कढ़ाई बनी नीलोफ़र की पहचान
Neelofar (नीलोफ़र) का रिश्ता कढ़ाई के काम से बचपन से ही रहा है। बचपन में वो थोड़ा-बहुत आरी वर्क करती थी। शादी के बाद उनके ससुर का अपना कारखाना था, जहां पारंपरिक कढ़ाई का काम होता था। धीरे-धीरे Neelofar (नीलोफ़र) की भी इस काम में दिलचस्पी बढ़ने लगी। उनके ससुर ने उन्हें कढ़ाई की बारीकियां सिखाईं और यही से उनके हुनर का सफ़र आगे बढ़ा।
जब Neelofar (नीलोफ़र) ने अपना काम शुरू किया, तो शुरुआत में वो बेडशीट और कुशन कवर तैयार करती थी। इसके बाद उन्होंने अपने काम को आगे बढ़ाया और चेन स्टिच के साथ-साथ नमदा पर भी काम करना शुरू किया। नमदा का काम कुछ समय के लिए बंद हो गया था, लेकिन Neelofar (नीलोफ़र) ने इसे दोबारा शुरू करने की कोशिश की। धीरे-धीरे यही पारंपरिक कला उनकी पहचान बनती गई।

बाढ़ के बाद बदले हालात, फिर शुरू हुआ नया सफ़र
Neelofar (नीलोफ़र) के लिए ये सफ़र आसान नहीं था। जब उन्होंने अपना काम शुरू किया, उसी दौरान बाढ़ आ गई। इसका असर उनके काम पर भी पड़ा और ऑर्डर कम होने लगे। आमदनी घट गई और घर के आर्थिक हालात भी ठीक नहीं थे। ऐसे समय में उनके सामने अपने काम को दोबारा खड़ा करने के साथ-साथ परिवार की ज़िम्मेदारियां निभाने की चुनौती भी थी।
उस मुश्किल दौर में Neelofar (नीलोफ़र) के पास सिर्फ़ ₹4,000 थे। उन्होंने इन्हीं पैसों से थोड़ा सामान खरीदा और दोबारा काम शुरू करने की कोशिश की। लेकिन काम को आगे बढ़ाने के लिए और पैसों की ज़रूरत थी। इसके बाद उन्होंने अपने सोने के गहने बेच दिए। गहने बेचकर मिले पैसों को उन्होंने अपने काम में लगा दिया। उनका मक़सद बड़ा कारोबार खड़ा करना नहीं, बल्कि अपने पैरों पर दोबारा खड़ा होना और अपने काम को आगे बढ़ाना था। यही छोटी-सी शुरुआत आगे चलकर एक बड़े सफ़र की शुरुआत बनी।

परिवार का मिला साथ और 40 से ज़्यादा कारीगरों को दिया रोज़गार
इस मुश्किल वक़्त में Neelofar (नीलोफ़र) को अपने परिवार का पूरा सपोर्ट मिला। उनके पति भी उनके साथ खड़े रहे और काम को आगे बढ़ाने में उनकी मदद की। अपनी दो बेटियों की ज़िम्मेदारी भी उनके लिए एक बड़ा मोटिवेशन थी। नीलोफ़र नहीं चाहती थी कि मुश्किल हालात उनके सपनों और मेहनत के रास्ते में रुकावट बनें।
जिस काम को Neelofar (नीलोफ़र) ने सिर्फ़ ₹4,000 से दोबारा शुरू किया था, आज उससे 40 से ज़्यादा कारीगर जुड़े हुए हैं। इनमें से कुछ कारीगर जम्मू से भी उनके साथ काम कर रहे हैं। Neelofar (नीलोफ़र) के लिए ये कारीगर सिर्फ़ उनके साथ काम करने वाले लोग नहीं हैं, बल्कि उनकी ज़िम्मेदारी भी हैं। वो कहती हैं कि अपने कारीगरों की मेहनत और उनकी उम्मीद को टूटने नहीं देना चाहती।
हुनर को ताक़त बनाया, अब दूसरों को भी दे रहीं हौसला
Neelofar (नीलोफ़र) के साथ काम करने वाले कारीगर अपनी परेशानियां भी उनसे साझा करते हैं। उन्हें अच्छा लगता है कि कारीगर उनके साथ खुलकर अपनी बातें करते हैं। वो कोशिश करती हैं कि उनकी मेहनत का पूरा पैसा उन्हें मिले। उनका मानना है कि किसी के आगे हाथ फैलाने से बेहतर है कि इंसान मेहनत करके अपने लिए चार पैसे कमाए। यही सोच उन्हें अपने साथ काम करने वाले लोगों के लिए भी मेहनत करने की प्रेरणा देती है।
Neelofar (नीलोफ़र) दूसरी महिलाओं को भी घर में खाली न बैठने की सलाह देती हैं। उनका कहना है कि महिलाओं को अपनी काबिलियत के हिसाब से कुछ न कुछ काम करते रहना चाहिए। उनके मुताबिक, अगर किसी महिला के पास कोई हुनर है, तो वो उसी हुनर को अपनी ताक़त बना सकती है। छोटी शुरुआत भी आगे चलकर बड़ी पहचान बन सकती है।

सरकार से चाहती हैं बेहतर प्लेटफॉर्म
अपने हैंडीक्राफ्ट को ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए नीलोफ़र एग्ज़िबिशन में भी हिस्सा लेती हैं। वो चाहती हैं कि सरकार उन्हें और दूसरे कारीगरों को एक बेहतर प्लेटफॉर्म दें, ताकि उनका काम ज़्यादा लोगों तक पहुंच सके। उनका मानना है कि अगर कारीगरों को सही मार्केट और प्लेटफॉर्म मिले, तो वो अपनी पारंपरिक कला को बचाने के साथ-साथ अपनी आमदनी भी बढ़ा सकते हैं।
Neelofar (नीलोफ़र) ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि ₹4,000 से शुरू किया गया उनका काम एक दिन 40 से ज़्यादा कारीगरों के रोज़गार का ज़रिया बन जाएगा। आज उनकी कहानी सिर्फ़ एक महिला के दोबारा अपने पैरों पर खड़े होने की कहानी नहीं है। ये कहानी बताती है कि मुश्किल हालात कितने भी बड़े क्यों न हों, अगर इंसान अपने हुनर, मेहनत और हिम्मत पर भरोसा रखे, तो एक छोटी-सी शुरुआत भी कई ज़िंदगियों में बदलाव ला सकती है।
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