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सूफ़ी ग़ुलाम मुस्तफ़ा तबस्सुम: शायरी, मोहब्बत और अदब की एक ख़ूबसूरत आवाज़

“देखे हैं बहुत हम ने हंगामे मोहब्बत के
आग़ाज़ भी रुस्वाई, अंजाम भी रुस्वाई”

उर्दू और फ़ारसी अदब की दुनिया में सूफ़ी ग़ुलाम मुस्तफ़ा तबस्सुम एक ऐसी शख़्सियत हैं, जिनकी शायरी में मोहब्बत, तन्हाई, इंसानी जज़्बात और ज़िंदगी की गहरी सच्चाइयां एक साथ दिखाई देती हैं। उनकी पैदाइश 4 अगस्त 1899 को अमृतसर में हुयी थी। उनका ताल्लुक़ कश्मीरी मूल के एक ख़ानदान से था।

इल्म से अदब तक का सफ़र

सूफ़ी तबस्सुम ने फ़ोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज, लाहौर से फ़ारसी अदब में एम.ए. किया। इसके बाद उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में अध्यापन शुरू किया और आगे चलकर फ़ारसी विभाग के प्रमुख के पद तक पहुंचे। 1954 में वह सरकारी कॉलेज से रिटायर हुए, लेकिन उनका अदबी सफ़र इसके बाद भी जारी रहा।

वह सिर्फ़ शायर ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन शिक्षक, अनुवादक और अदबी रहनुमा भी थे। उन्हें फ़ारसी, उर्दू और पंजाबी तीनों ज़बानों पर गहरी पकड़ हासिल थी।

शायरी में मोहब्बत और तन्हाई

सूफ़ी तबस्सुम की शायरी में इश्क़ के साथ-साथ ज़िंदगी की तन्हाई और इंसानी बेबसी का एहसास भी मिलता है। उनके अशआर सीधे दिल पर असर करते हैं।

“सौ बार चमन महका, सौ बार बहार आई
दुनिया की वही रौनक़, दिल की वही तन्हाई” 

इन पंक्तियों में बदलते मौसम और दुनिया की रौनक़ के बीच दिल की तन्हाई का जो एहसास है, वही उनकी शायरी की ख़ास पहचान बन जाता है।

“जाने किस की थी ख़ता, याद नहीं
हम हुए कैसे जुदा, याद नहीं”

यह सादगी भरा अंदाज़ उनकी शायरी को आम पाठक के दिल तक पहुंचाता है।

उर्दू, फ़ारसी और पंजाबी के बीच एक पुल

सूफ़ी तबस्सुम ने सिर्फ़ अपनी शायरी तक ख़ुद को महदूद नहीं रखा। उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब और अमीर ख़ुसरो की फ़ारसी शायरी का उर्दू में अनुवाद किया और उर्दू-फ़ारसी की कई रचनाओं को पंजाबी में भी पेश किया।

उनका यह काम तीनों ज़बानों के अदब के बीच एक ख़ूबसूरत पुल की तरह था। उन्होंने विलियम शेक्सपियर के नाटक A Midsummer Night’s Dream का भी पंजाबी में अनुवाद किया।

बच्चों की दुनिया के प्यारे शायर

सूफ़ी तबस्सुम की एक बड़ी पहचान बच्चों के लिए लिखी गई उनकी कविताएं भी हैं। उनका किरदार “टोट-बटोट” बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ।

टोट-बटोट, झूलने और तलमातोल जैसी रचनाओं ने बच्चों की दुनिया में शायरी को खेल, मुस्कान और कल्पना से जोड़ दिया। यही वजह है कि उन्हें पाकिस्तान में बाल-अदब के प्रमुख रचनाकारों में भी शुमार किया जाता है।

रेडियो और टेलीविज़न से गहरा रिश्ता

सूफ़ी तबस्सुम का रिश्ता सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं था। उन्होंने लंबे समय तक रेडियो पाकिस्तान और पाकिस्तान टेलीविज़न के अदबी और काव्य कार्यक्रमों में हिस्सा लिया।

उनकी कई रचनाएं मशहूर गायकों की आवाज़ में गीत बनकर लोगों तक पहुंचीं। “सौ बार चमन महका, सौ बार बहार आई” जैसे कलाम ने उनकी शायरी को महफ़िलों और संगीत की दुनिया में भी अमर कर दिया।

अदबी महफ़िलों के अहम नाम

लाहौर की अदबी फ़िज़ा में सूफ़ी तबस्सुम का अपना एक ख़ास मक़ाम था। वह नियाज़मंदान-ए-लाहौर से जुड़े हुए थे, जहां उस दौर के कई नामवर साहित्यकार और कलाकार जमा होते थे।

पत्रास बोखारी, अब्दुल मजीद सालिक, इम्तियाज़ अली ताज, एम.डी. तासीर, चिराग़ हसन हसरत और हफ़ीज़ जालंधरी जैसी शख़्सियतों के साथ उनकी अदबी रफ़ाक़त रही।

अदब के लिए उनकी ख़िदमात को कई बड़े सम्मानों से नवाज़ा गया। उन्हें प्राइड ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस, ईरान सरकार की ओर से तमग़ा-ए-निशान-ए-सिपास और सितारा-ए-इम्तियाज़ जैसे सम्मान मिले।

उनकी अदबी ख़िदमात को बाद की पीढ़ियों ने भी याद रखा और 2023 में उन्हें मरणोपरांत निशान-ए-इम्तियाज़ से सम्मानित किया गया।

सूफ़ी तबस्सुम की विरासत

उनकी किताबों में कुल्लियात-ए-सूफ़ी तबस्सुम, दामन-ए-दिल, नज़रां करदियां गल्लां, नक़्श-ए-इक़बाल, झूलने और बच्चों के लिए लिखी गई कई मशहूर रचनाएं शामिल हैं।

7 फ़रवरी 1978 को लाहौर में सूफ़ी ग़ुलाम मुस्तफ़ा तबस्सुम का इंतिक़ाल हुआ, लेकिन उनकी शायरी आज भी ज़िंदा है। उनकी आवाज़ कभी मोहब्बत की उदासी बनकर सामने आती है, कभी बच्चों की मुस्कान बनकर और कभी तीन ज़बानों के अदब को जोड़ने वाली एक रौशन कड़ी बनकर।

“इक लहज़ा बहें आंसू, इक लहज़ा हंसी आई
सीखे हैं नए दिल ने अंदाज़-ए-शकेबाई।”

ये भी पढ़ें: वहीद जहां बेग़म: तालीम के ज़रिए समाज बदलने वाली शख़्सियत

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