“उठ गया अपने यहां से टेलीफ़ोन
अब कहीं जा कर मिलेगा अगली जून”
उर्दू अदब में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने बहुत कम लिखा, लेकिन जितना लिखा वह हमेशा के लिए यादगार बन गया। पतरस बुख़ारी भी ऐसी ही शख़्सियत थे। उनका पूरा नाम पीर सैयद अहमद शाह बुख़ारी था। वह एक बेहतरीन लेखक, हास्यकार, शिक्षक, प्रसारक और कूटनीतिज्ञ थे। उनकी पहचान ख़ास तौर पर उनकी मशहूर किताब ‘पतरस के मज़ामीन’ से बनी।
कश्मीर से पेशावर तक
पतरस बुख़ारी के पूर्वज कश्मीर से आकर पेशावर में बसे थे। उनकी पैदाइश 1 अक्टूबर 1898 को पेशावर में हुयी। उनके पिता सैयद असद-उल्लाह एक वकील के मुंशी थे। घर का माहौल इल्म और तहज़ीब से जुड़ा हुआ था, जिसका असर पतरस की शख़्सियत पर भी पड़ा।
उनकी शुरुआती तालीम पेशावर में हुई। इसके बाद उन्होंने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में अंग्रेज़ी साहित्य की पढ़ाई की। आगे की उच्च शिक्षा के लिए वह इंग्लैंड गए और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के इमैनुएल कॉलेज से अंग्रेज़ी साहित्य में उच्च शिक्षा हासिल की।
कैम्ब्रिज में उन्हें अंग्रेज़ी साहित्य के मशहूर विद्वानों से सीखने का अवसर मिला। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह लाहौर लौटे और गवर्नमेंट कॉलेज में अध्यापन शुरू किया।
शिक्षक से प्रिंसिपल तक
पतरस बुख़ारी सिर्फ़ एक लेखक नहीं थे, बल्कि एक शानदार शिक्षक भी थे। उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में लंबे समय तक अंग्रेज़ी पढ़ाई और बाद में इसी संस्थान के प्रिंसिपल भी बने।
उनके शागिर्दों में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, नून मीम राशिद और कन्हैयालाल कपूर जैसे नाम शामिल थे। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वह अपने दौर के साहित्यिक और बौद्धिक हल्क़ों में किस क़दर असर रखते थे।
पतरस बुख़ारी को उर्दू अदब में सबसे बड़ी शोहरत उनकी किताब ‘पतरस के मज़ामीन’ से मिली। इस संग्रह में केवल 11 मज़ामीन हैं, लेकिन यही छोटी-सी किताब उर्दू के हास्य-व्यंग्य साहित्य में एक अहम मुक़ाम रखती है।
उनके मज़ामीन की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि वह रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों को भी ऐसे अंदाज़ में पेश करते हैं कि पाठक मुस्कुराए बिना नहीं रह सकता।
उनके हास्य में सिर्फ़ हंसी नहीं है। उसके पीछे इंसानी फ़ितरत, सामाजिक अव्यवस्था और ज़िंदगी की पेचीदगियों पर गहरी नज़र भी दिखाई देती है। वह मामूली से मामूली घटना में भी ऐसा पहलू तलाश लेते थे, जो पाठक को हंसाने के साथ सोचने पर भी मजबूर करता है।
हास्य में तहज़ीब और ज़बान की मिठास
पतरस का हास्य शोर-शराबे वाला हास्य नहीं था। उनकी बात में शराफ़त, ज़बान की नफ़ासत और बौद्धिक गहराई मौजूद थी। वह किसी व्यक्ति या समाज पर सीधे हमला करने के बजाय ऐसी स्थिति पैदा करते थे कि उसकी ख़ामी ख़ुद-ब-ख़ुद सामने आ जाती थी।
उनकी लेखन शैली में अंग्रेज़ी साहित्य का अध्ययन, उर्दू की नफ़ासत और रोज़मर्रा की ज़िंदगी का अनुभव एक साथ दिखाई देता है।
यही वजह है कि दशकों बीत जाने के बाद भी ‘पतरस के मज़ामीन’ पढ़ते हुए उनकी बातें आज की ज़िंदगी से जुड़ी हुई महसूस होती हैं।
रेडियो और पत्रकारिता से रिश्ता
पतरस बुख़ारी ने ऑल इंडिया रेडियो में भी अहम ज़िम्मेदारियां निभाईं और कुछ समय तक उसके महानिदेशक रहे। रेडियो के ज़रिए उन्होंने साहित्य और संस्कृति को आम लोगों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
वह पत्रकारिता से भी जुड़े रहे। उन्होंने विभिन्न अख़बारों और पत्रिकाओं के लिए लिखा और संपादकीय कार्य किया। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के संपादन में निकलने वाले ‘पाकिस्तान टाइम्स’ के लिए भी उन्होंने कुछ संपादकीय लिखे।
‘पतरस’ नाम कैसे पड़ा?
उनके उपनाम ‘पतरस’ के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। उनके स्कूल के एक शिक्षक उनके नाम ‘पीर’ का उच्चारण अंग्रेज़ी अंदाज़ में करते थे। यह उच्चारण ‘पियरे’ जैसा सुनाई देता था। फ्रांसीसी भाषा में ‘पियरे’ का अर्थ पीटर होता है और ग्रीक परंपरा में इसका रूप ‘पेत्रोस’ है।
इसी से प्रभावित होकर अहमद शाह बुख़ारी ने अपने उर्दू लेखन के लिए ‘पतरस’ को अपना तख़ल्लुस बना लिया।
पतरस बुख़ारी की क़ाबिलियत सिर्फ़ उर्दू अदब तक सीमित नहीं रही। संयुक्त राष्ट्र में उनके साथ काम करने वाले लोगों ने उन्हें एक विद्वान, विचारक और दूरदर्शी अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व के रूप में याद किया।
उनकी सोच का दायरा इंसान, शांति, आज़ादी और बेहतर ज़िंदगी जैसे बड़े सवालों तक फैला हुआ था। यही वजह है कि साहित्य और कूटनीति—दोनों क्षेत्रों में उनका नाम सम्मान से लिया जाता है।
आख़िरी सफ़र और विरासत
5 दिसंबर 1958 को न्यूयॉर्क में पतरस बुख़ारी का इंतिक़ाल हुआ। उनकी मौत के बाद भी उनकी अदबी विरासत लगातार ज़िंदा रही। बाद में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें मरणोपरांत हिलाल-ए-इम्तियाज़ जैसे बड़े नागरिक सम्मान से नवाज़ा।
उनके नाम पर पतरस बुख़ारी पुरस्कार भी स्थापित किया गया, जो पाकिस्तानी साहित्य में अंग्रेज़ी गद्य की उत्कृष्ट किताब के लिए दिया जाता है।
पतरस बुख़ारी ने बहुत कम लिखा, लेकिन उनकी लेखनी ने उर्दू हास्य-व्यंग्य को एक नया अंदाज़ दिया। उनकी सबसे बड़ी ख़ूबी यही थी कि वह हंसी के पीछे छिपी ज़िंदगी की सच्चाई को पहचानते थे।
उनका साहित्य आज भी यह एहसास कराता है कि अच्छी हंसी वही है, जिसमें ज़बान की मिठास, सोच की गहराई और ज़िंदगी को देखने का एक नया नज़रिया शामिल हो।
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