अगर आपको शायरी या गीतों का ज़्यादा शौक़ नहीं भी है, तब भी कुमार विश्वास का नाम आपने ज़रूर सुना होगा। मौजूदा दौर में वे हिंदी के सबसे मक़बूल शायरों और कवियों में शुमार किए जाते हैं। उनकी आवाज़, अंदाज़-ए-बयां और अश्आर ने लाखों नौजवानों को कविता से जोड़ा है। जब वे किसी महफ़िल या कवि सम्मेलन में अपनी मशहूर नज़्म “कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है…” पढ़ते हैं, तो पूरा हॉल एक साथ उसे गुनगुनाने लगता है।
कुमार विश्वास सिर्फ़ एक कामयाब कवि ही नहीं, बल्कि बेहतरीन ख़तीब (वक्ता) भी हैं। वे अपनी दिलकश गुफ़्तगू, हाज़िरजवाबी और असरदार पेशकश से घंटों तक सामईन (श्रोताओं) को अपने साथ जोड़े रखते हैं। उनकी शायरी में इश्क़ भी है, एहसास भी, वतन से मुहब्बत भी और इंसानी जज़्बात की गहराई भी।
उनकी सबसे ख़ास बात यह है कि वे उर्दू मुशायरों में भी पूरे एतमाद के साथ हिंदी गीत सुनाते हैं और ज़बानों के बीच मुहब्बत का पैग़ाम देते हैं।
“ये उर्दू बज़्म है और मैं तो हिंदी मां का जाया हूं,
ज़बानें मुल्क की बहनें हैं, ये पैग़ाम लाया हूं।
मुझे दुगुनी मुहब्बत से सुनो उर्दू ज़बां वालों,
मैं हिंदी मां का बेटा हूं, मैं घर मौसी के आया हूं।”
इन अश्आर से साफ़ ज़ाहिर होता है कि उनके नज़दीक हिंदी और उर्दू दो अलग-अलग ज़बानें नहीं, बल्कि एक ही तहज़ीब की दो ख़ूबसूरत बहनें हैं।
कुमार विश्वास की पैदाइश 10 फ़रवरी 1970 को उत्तर प्रदेश के पिलखुवा में बसंत पंचमी के दिन हुयी। उनका असली नाम विश्वास कुमार शर्मा था, जिसे बाद में बदलकर कुमार विश्वास कर दिया गया। बचपन से ही उन्हें शायरी और कविता लिखने का शौक़ था। ख़ानदान चाहता था कि वे इंजीनियर बनें, लेकिन उनका दिल अदब की दुनिया में बसता था। यही वजह रही कि उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई अधूरी छोड़कर हिंदी साहित्य का दामन थाम लिया।
तालीम मुकम्मल करने के बाद 1994 में उन्होंने राजस्थान के लाला लाजपत राय कॉलेज में अध्यापन शुरू किया। इसी दौरान वे मुल्क भर के कवि सम्मेलनों और मुशायरों में शिरकत करने लगे। धीरे-धीरे उनकी पहचान एक ऐसे शायर की बनी, जिसने मंचीय कविता को नई बुलंदी दी।
उनकी सबसे मशहूर नज़्म “कोई दीवाना कहता है” आज भी नौजवानों की पसंदीदा रचनाओं में शामिल है।
“कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है,
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है…”
बरसों बाद भी लोगों की ज़ुबान पर हैं। इसी नाम से उनका चर्चित काव्य-संग्रह भी प्रकाशित हुआ। इसके अलावा “एक पगली लड़की के बिन” और “फिर तेरी याद” जैसी किताबों को भी काफ़ी मक़बूलियत मिली।
कुमार विश्वास की शायरी सिर्फ़ इश्क़-ओ-मोहब्बत तक महदूद नहीं है। उन्होंने वतन, इंसानियत और सामाजिक सरोकारों पर भी दिल से लिखा। उनकी रचनाएं “बांसुरी चली आओ”, “होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो” और “जिसकी धुन पर दुनिया नाचे” आज भी महफ़िलों की रौनक़ हैं।
साल 2011 में अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के दौरान वे सामाजिक और सियासी तौर पर भी सक्रिय रहे। बाद में वे आम आदमी पार्टी से जुड़े, लेकिन हमेशा यह कहते रहे कि उनकी असली पहचान एक शायर की है। उनकी ये पंक्तियां आज भी बहुत मशहूर हैं।
“सियासत में मेरा खोया या पाया हो नहीं सकता,
सृजन का बीज हूं, मिट्टी में जाया हो नहीं सकता।”
आज कुमार विश्वास हिंदुस्तान ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई मुल्कों में होने वाले कवि सम्मेलनों और अदबी महफ़िलों की पहचान बन चुके हैं। उन्होंने अपनी दिलनशीं आवाज़ और असरदार पेशकश के ज़रिए नई नस्ल को हिंदी कविता से जोड़ा है। उनकी “तर्पण” सीरीज़ ने भी घर-घर तक कविता पहुंचाने में अहम किरदार अदा किया। इसके अलावा उन्होंने 2018 में रिलीज़ हुई फ़िल्म “परमाणु: द स्टोरी ऑफ़ पोखरण” के लिए गीत भी लिखा।
इश्क़, एहसास, वतनपरस्ती और इंसानी जज़्बात को आसान अल्फ़ाज़ में बयान करने की उनकी सलाहियत ही उन्हें आज के दौर के सबसे मक़बूल और असरदार कवियों में शामिल करती है।
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