कभी-कभी ज़िदगी ऐसे मोड़ पर ले आती है, जहां इंसान के सामने सिर्फ़ दो रास्ते होते हैं या तो वो हालात के आगे हार मान ले या फिर उन्हीं हालात को अपनी ताक़त बना ले। हरियाणा के सिरसा के रहने वाले पद्मश्री Gurvinder Singh (गुरविंदर सिंह) ने दूसरा रास्ता चुना। एक सड़क हादसे ने उनका शरीर व्हीलचेयर के सहारे हो गया,लेकिन उनके हौसले को नहीं तोड़ पाया। जिस दर्द ने उनकी अपनी ज़िदगी बदल दी, उसी दर्द ने उन्हें हज़ारों बेबस और ज़रूरतमंद लोगों का सहारा बना दिया।
आज Gurvinder Singh (गुरविंदर सिंह) का नाम सिर्फ़ एक सोशल वर्कर के तौर पर नहीं, बल्कि इंसानियत की उस मिसाल के तौर पर लिया जाता है, जिसने बिना किसी लालच और उम्मीद के लोगों की खिदमत को अपनी ज़िंदगी का मक़सद बना लिया। साल 2024 में उनकी इसी बेमिसाल सेवा को देश ने सलाम किया और उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाज़ा गया। लेकिन Gurvinder Singh (गुरविंदर सिंह) के लिए ये सम्मान मंज़िल नहीं, बल्कि एक और बड़ी ज़िम्मेदारी है।

एक हादसा जिसने पूरी ज़िंदगी बदल दी
साल 1997 की बात है। Gurvinder Singh (गुरविंदर सिंह) एक आम ज़िंदगी जी रहे थे। काम करते थे, परिवार के सपने देखते थे और भविष्य को लेकर उम्मीदें थी। लेकिन एक सड़क हादसे ने सब कुछ बदल दिया। एक चलता-फिरता इंसान अचानक व्हीलचेयर पर आ गया। डॉक्टरों ने साफ़ कह दिया कि अब उनकी जिंदगी इसी सहारे गुज़रेगी। वो वक़्त उनके लिए बेहद मुश्किल था। लेकिन इसी अंधेरे दौर में उन्हें एक नई रोशनी मिली।
हादसे के बाद वो लुधियाना के DMC अस्पताल में करीब चार महीने तक भर्ती रहे। वहां उन्होंने एक ऐसी सेवा देखी, जिसने उनकी सोच बदल दी। एक संस्था के लोग रोज सुबह-शाम अस्पताल आते और मरीजों को दूध, दातुन और ब्रेड बांटते थे। Gurvinder Singh (गुरविंदर सिंह) घंटों उन्हें देखते रहते थे। वो कहते हैं, “तभी मुझे समझ आया कि असली सेवा वही है, जो किसी ज़रूरतमंद इंसान के मुश्किल वक़्त में उसके काम आए। मैंने उसी दिन तय कर लिया था कि अगर मुझे मौक़ा मिला तो मैं अपने शहर सिरसा में भी ऐसी सेवा ज़रूर शुरू करूंगा।
200 ग्राम दूध से लिखी गई सेवा की नई कहानी
अस्पताल से लौटने के बाद Gurvinder Singh (गुरविंदर सिंह) ने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर एक छोटी सी पहल शुरू की। कुछ लोगों ने हर महीने सिर्फ़ एक रुपये का योगदान देना शुरू किया। इसी छोटी सी मदद से सिरसा के सिविल अस्पताल में मरीज़ों को रात के समय 200 ग्राम दूध बांटने की सेवा शुरू हुई। शायद किसी ने नहीं सोचा था कि ये छोटी सी कोशिश एक दिन हज़ारों लोगों के लिए उम्मीद का सहारा बन जाएगी।

1 जनवरी 2005 को भाई कन्हैया मानव सेवा ट्रस्ट की नींव रखी गई। शुरुआत में संसाधन बहुत कम थे, लेकिन इरादे मज़बूत थे। धीरे-धीरे ट्रस्ट की सेवाओं का दायरा बढ़ता गया। साल 2006 में पहला ब्लड डोनेशन कैंप लगाया गया, जिसमें करीब 90 यूनिट खू़न जमा हुआ। इसके बाद स्कूल में दूध सेवा शुरू की गई।
जिसने अपने दर्द को दूसरों का मरहम बना दिया
Gurvinder Singh (गुरविंदर सिंह) ने बताया कि उनके हादसे के दौरान उन्हें सिरसा से लुधियाना एक गाड़ी में ले जाया गया। डॉक्टरों ने कहा था कि अगर उन्हें सही एंबुलेंस से लाया जाता तो शायद उनकी हालत बेहतर हो सकती थी। अपने इस एक्सपीरियंस की वजह से साल 2008 में ट्रस्ट ने अपनी पहली मुफ़्त एंबुलेंस सेवा शुरू की। सड़क हादसे, हार्ट अटैक, डिलीवरी या किसी भी मेडिकल इमरजेंसी में लोगों को अस्पताल तक पहुंचाने की ये सेवा बिल्कुल मुफ़्त रखी गई। आज एक एंबुलेंस से शुरू हुआ सफर 15 एंबुलेंस तक पहुंच चुका है। सिरसा के साथ-साथ आसपास के कई इलाकों में ये सेवा लोगों की ज़िंदगी बचाने का काम कर रही है।
एक बेसहारा महिला ने दिखाया नया रास्ता
कई बार एक छोटी सी घटना इंसान की ज़िंदगी का सबसे बड़ा फैसला बदल देती है। गुरविंदर सिंह के साथ भी ऐसा ही हुआ। एक दिन उनके सर्विस स्टेशन के पास एक महिला मिली, जिसकी मानसिक हालत ठीक नहीं थी। उन्होंने और उनकी टीम ने उसे सुरक्षित जगह पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन कोई इंतजाम नहीं हो पाया। कुछ समय बाद उस महिला की मौत हो गई। ये घटना Gurvinder Singh (गुरविंदर सिंह) के दिल में गहरा असर छोड़ गई।

उन्होंने सोचा, “अगर हम एक बेसहारा इंसान को भी सुरक्षित जगह नहीं दे सकते, तो हमारी ज़िम्मेदारी क्या है?” इसके बाद उन्होंने अमृतसर के पिंगलवाड़ा आश्रम को देखा और वहीं से प्रेरणा लेकर सिरसा में भी ऐसा आश्रम बनाने का फैसला किया। आज उनके दो आश्रम हैं, जहां करीब 480 ज़रूरतमंद लोग रह रहे हैं। इनमें बुज़ुर्ग, महिलाएं, बच्चे और मानसिक रूप से परेशान लोग शामिल हैं। यहां उनके खाने, रहने और इलाज की पूरी ज़िम्मेदारी ट्रस्ट उठाता है।
वेदा की कहानी: जब खोया हुआ परिवार फिर मिला
Gurvinder Singh (गुरविंदर सिंह) के सफ़र में कई ऐसी कहानियां हैं, जो इंसानियत पर भरोसा बढ़ाती हैं। साल 2014 में आश्रम के पास एक महिला मिली। बाद में उसका नाम वेदा पता चला। इलाज के बाद उसकी हालत बेहतर हुई, लेकिन वो सिर्फ़ दक्षिण भारत की कोई भाषा बोलती थी। एक दिन वो बार-बार “मोहित” का नाम लेकर रोने लगी। टीम ने कर्नाटक से जुड़े एक पुलिस अधिकारी की मदद ली और पता चला कि वो कर्नाटक के कोलार ज़िले की रहने वाली है।
वेदा ने बताया कि उसके पति उसे एक बाबा के पास ले गए थे, जहां इलाज के नाम पर उसके शरीर पर गर्म सलाखें लगाई गई। दर्द से परेशान होकर वो वहां से भाग गई और भटकते-भटकते करीब 2500 किलोमीटर दूर सिरसा पहुंच गई। जब परिवार से संपर्क किया गया तो भाई ने कहा कि उसकी बहन तो दो साल पहले मर चुकी है। दरअसल, एक गलत पहचान की वजह से परिवार ने किसी और महिला को वेदा समझकर अंतिम संस्कार कर दिया था। जब भाई और वेदा की बात हुई तो दोनों की आंखों से आंसू निकल पड़े। अगले दिन भाई सिरसा पहुंचा और वेदा के इलाज के बाद अपने परिवार के पास लौट गई।

एक स्कूल, 400 सपने और बदलाव की नई कहानी
साल 2022 से भाई कन्हैया मानव सेवा ट्रस्ट एक स्कूल भी चला रहा है, जहां करीब 400 ज़रूरतमंद बच्चों को मुफ़्त शिक्षा दी जा रही है। इन बच्चों के लिए सिर्फ़ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि बस सुविधा, खाना, किताबें और दूसरी ज़रूरतों का भी इंतज़ाम ट्रस्ट करता है। Gurvinder Singh (गुरविंदर सिंह) एक मां की कहानी बताते हैं, जिसने उन्हें शिक्षा की असली ताक़त दिखाई। एक गरीब बस्ती की महिला ने अपनी बेटी की पढ़ाई के बारे में बात करते हुए कहा कि उसकी आंखों में आए आंसू दुख के नहीं, खुशी के थे।
उसने बताया कि उसके परिवार में पहले कभी किसी ने अंग्रेज़ी के दो शब्द नहीं बोले थे, लेकिन आज उसकी बेटी अंग्रेज़ी में बात करती है। उस मां के लिए ये सिर्फ़ बेटी की पढ़ाई नहीं थी, बल्कि पूरी पीढ़ी की सोच बदलने वाली शुरुआत थी।

भाई कन्हैया ट्रस्ट में दिखती गंगा-जमुनी तहज़ीब की तस्वीर
भाई कन्हैया मानव सेवा ट्रस्ट में गंगा-जमुनी तहज़ीब की खूबसूरत तस्वीर दिखाई देती है। Gurvinder Singh (गुरविंदर सिंह) कहते हैं, “गुरु नानक देव जी ने सिखाया है कि एक ही नूर से पूरी दुनिया बनी है। हमारे लिए इंसान सबसे पहले है।” यहां हर धर्म और समुदाय के लोग रहते हैं। अगर किसी मुस्लिम भाई या बहन का इंतकाल होता है तो उनकी अंतिम रस्में मुस्लिम समाज की परंपराओं के मुताबिक ही की जाती हैं। उनके लिए सेवा का मतलब है न कोई भेदभाव, न कोई लालच और न किसी से नफरत।
सेवा का कारवां लगातार जारी है
आज ट्रस्ट के आश्रम में करीब 400 लोग रह रहे हैं, जबकि करीब 600 लोग इलाज और देखभाल के बाद अपने घर लौट चुके हैं। मुफ़्त एंबुलेंस सेवा से अब तक हज़ारों लोगों को फ़ायदा पहुंच चुका है। स्कूल में 400 बच्चे पढ़ रहे हैं और पर्यावरण के लिए भी ट्रस्ट ने आधे एकड़ ज़मीन में करीब 1000 पौधों का जंगल तैयार किया है। Gurvinder Singh (गुरविंदर सिंह) की ख़ास बात ये है कि उन्होंने कभी किसी पुरस्कार के लिए काम नहीं किया। उन्हें ज़िला या राज्य स्तर का कोई बड़ा सम्मान पहले नहीं मिला था।
लेकिन उनकी खामोश सेवा ने उन्हें सीधे पद्मश्री तक पहुंचा दिया। वो कहते हैं कि पद्मश्री खुशी ज़रूर देता है, लेकिन साथ ही ज़िम्मेदारी भी बढ़ाता है। “अब हमें और ज़्यादा सजग रहना है कि हमारे पास रहने वाले हर इंसान को सम्मान मिले, अच्छा इलाज मिले और बेहतर जिंदगी मिले। Gurvinder Singh (गुरविंदर सिंह) की कहानी सिर्फ़ एक समाजसेवी की कहानी नहीं है। ये उस इंसान की दास्तान है, जिसने अपने दर्द को दूसरों के लिए मरहम बना दिया।
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