उर्दू थिएटर की दुनिया में डॉ. मोहम्मद सईद आलम एक ऐसा नाम हैं जिन्होंने न सिर्फ़ रंगमंच को नई ज़िंदगी दी, बल्कि यह भी साबित किया कि थिएटर समाज की आवाज़ और ज़माने का आईना होता है। एक ख़ास बातचीत में उन्होंने अपने बचपन, अलीगढ़ के तालीमी माहौल, थिएटर से जुड़ने की दास्तान और उर्दू रंगमंच के मुस्तक़बिल पर खुलकर अपने ख़यालात पेश किए।
बचपन से रंगमंच तक का सफ़र
डॉ. सईद आलम बताते हैं कि बचपन में उन्हें ड्रामा करने से ज़्यादा उसे देखने का शौक़ था। स्कूल के दिनों में पहली बार मंच पर आने का मौक़ा मिला और वहीं से थिएटर से दिलचस्पी पैदा हुई। बाद में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का माहौल उनकी शख़्सियत और फ़िक्र को नई दिशा देने वाला साबित हुआ।
अलीगढ़ ने दी फ़िक्र और फ़न को नई पहचान
उन्होंने कहा कि अलीगढ़ सिर्फ़ डिग्री हासिल करने की जगह नहीं, बल्कि तहज़ीब, अदब, गुफ़्तगू और सोचने का सलीक़ा सिखाने वाली यूनिवर्सिटी है। यहीं के माहौल ने उनके अंदर छिपे लेखक, निर्देशक और अभिनेता को परवान चढ़ाया।
राजनीति विज्ञान(Political Science) में पीएचडी और पत्रकारिता से जुड़े रहने के बावजूद उन्होंने थिएटर को अपना मुक़द्दर बना लिया। एक रिहर्सल देखने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि रंगमंच ही उनकी असली मंज़िल है। उन्होंने पुराने और दोहराए जाने वाले नाटकों की बजाय नए और मौलिक विषयों पर लिखना शुरू किया। उनका पहला नाटक लोगों को इतना पसंद आया कि वहीं से उनका थिएटर का सफ़र शुरू हो गया।
डॉ. सईद आलम का मानना है कि सबसे बेहतरीन ड्रामा हमारे आसपास की ज़िंदगी में मौजूद है। समाज के बदलते हालात, आम लोगों की परेशानियां और रोज़मर्रा के मसाइल ही थिएटर के सबसे मज़बूत मौज़ू होने चाहिए। थिएटर तभी ज़िंदा रहेगा जब वह अपने दौर की आवाज़ बनेगा।
उर्दू थिएटर की कमज़ोरी की असली वजह
उनके मुताबिक़ उर्दू थिएटर इसलिए कमज़ोर हुआ क्योंकि उसे सिर्फ़ उर्दू जानने वालों तक महदूद कर दिया गया। जबकि उर्दू और हिंदी एक-दूसरे के बेहद क़रीब हैं। अगर उर्दू थिएटर को हर तबक़े और हर शहर तक पहुंचाया जाए, तो उसकी लोकप्रियता फिर से बढ़ सकती है।
कामयाब ड्रामा निगार बनने का राज़
डॉ. आलम कहते हैं कि सिर्फ़ कमरे में बैठकर ड्रामा लिखने से कोई अच्छा नाटककार नहीं बन सकता। एक लेखक को रोज़ रिहर्सल का हिस्सा बनना चाहिए, कलाकारों के साथ काम करना चाहिए और मंच की ज़रूरतों को समझना चाहिए। उनका मानना है कि स्टेज पर बार-बार खेले जाने वाले नाटक ही असल मायनों में कामयाब होते हैं।
उनका कहना है कि ओटीटी और सोशल मीडिया ने थिएटर के कलाकारों को नई पहचान दी है। थिएटर कलाकारों के लिए एक तालीमी इदारा है, जहां से सीखकर लोग फ़िल्मों, वेब सीरीज़ और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर कामयाबी हासिल करते हैं।
उर्दू का मुस्तक़बिल रोशन है
डॉ. सईद आलम का यक़ीन है कि उर्दू ज़ुबान कभी ख़त्म नहीं होगी, क्योंकि वह हिंदी से बेहद क़रीब है और रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है। हालांकि उन्होंने इस बात पर अफ़सोस जताया कि नई नस्ल धीरे-धीरे उर्दू और हिंदी दोनों की लिपियों से दूर होती जा रही है। उनका कहना है कि अगर हम अदब से रिश्ता बनाए रखें और भाषा को रोज़मर्रा में इस्तेमाल करें, तो उर्दू का मुस्तक़बिल हमेशा रोशन रहेगा।
डॉ. मोहम्मद सईद आलम की बातें सिर्फ़ उर्दू थिएटर तक महदूद नहीं हैं, बल्कि अदब, ज़ुबान और समाज के बीच गहरे रिश्ते को भी बयान करती हैं। उनका पैग़ाम साफ़ है अगर थिएटर ज़िंदगी से जुड़ा रहेगा, नई सोच को अपनाएगा और आम लोगों तक पहुंचेगा, तो उसकी रिवायत भी ज़िंदा रहेगी और उसका मुस्तक़बिल भी रौशन होगा।
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