जब भी भारत में Triple Jump की बात होती है, तो पंजाब का नाम सबसे पहले लिया जाता है। पंजाब के अमृतसर ज़िले के हरशा छीना गांव में पैदा हुए Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) ने इस खेल में ऐसा मुक़ाम हासिल किया, जिस पर हर हिंदुस्तानी को फ़ख्र है। 30 दिसंबर 1992 को पैदा हुए Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) का सफ़र बिल्कुल आसान नहीं था। ग़रीबी, चोट, नाकामयाबी और मायूसी जैसे मुश्किल दौर से गुज़रने के बावजूद उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। अपनी शानदार छलांगों के दम पर उन्होंने पूरी दुनिया में भारत का परचम बुलंद किया।
एशियन गेम्स में 48 साल बाद भारत को Triple Jump का गोल्ड मेडल दिलाने वाले Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) आज लाखों नौजवानों के लिए एक बड़ी मिसाल हैं। उनकी कहानी बताती है कि अगर इरादे मज़बूत हों, तो कोई भी मुश्किल रास्ता रोक नहीं सकती।
Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) की पैदाइश एक बेहद साधारण परिवार में हुई थी। उनके वालिद जगबीर सिंह भारतीय सेना में हवलदार थे, जबकि उनकी वालिदा हरमीत कौर हाउसवाइफ थीं। उनके वालिद को खेलों का बहुत शौक़ था। वो खुद कबड्डी और हॉकी खेलते थे। उन्होंने ही बचपन से Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) के दिल में खेलों के लिए जुनून पैदा किया।
Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) के वालिद हर रोज़ सुबह 5 बजे उन्हें उठाकर कम से कम 5 किलोमीटर दौड़ लगवाते थे। महज़ 9 साल की उम्र में उन्होंने स्कूल लेवल पर 100 मीटर, 200 मीटर, 300 मीटर दौड़ और Long Jump जैसी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। बचपन में मिली सख़्त ट्रेनिंग, अनुशासन और मेहनत का यही जज़्बा आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताक़त बना।

बेटे के ख़्वाब पूरे करने के लिए पिता ने ज़मीन गिरवी रख दी
साल 1990 में सेना से रिटायर होने के बाद Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) के परिवार की माली हालत काफ़ी मुश्किल हो गई। घर का ख़र्च सिर्फ़ पिता की मामूली पेंशन से चलता था। एक एथलीट की अच्छी डाइट, Sports Kit, Shoes और रोज़ की ट्रेनिंग का ख़र्च उठाना परिवार के लिए आसान नहीं था।
लेकिन बेटे के ख़्वाबों को पूरा करने के लिए उनके पिता जगबीर सिंह ने बड़ी कुर्बानी दी। उन्होंने अपनी डेढ़ एकड़ ज़मीन गिरवी रखकर Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) की ट्रेनिंग और दूसरे ख़र्चों के लिए पैसों का इंतज़ाम किया। पिता का ये फ़ैसला Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) के लिए सिर्फ़ मदद नहीं, बल्कि एक ऐसा हौसला था जिसने उन्हें अंदर से और भी मज़बूत बना दिया।
फिर साल 2014 में, जब Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) ने कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल जीता, तो मिली Prize Money से उन्होंने सबसे पहला काम अपने पिता की गिरवी रखी ज़मीन छुड़ाने का किया। ये एक बेटे की तरफ़ से अपने मां-बाप की कुर्बानियों का सबसे ख़ूबसूरत जवाब था। उनकी ये कहानी बताती है कि जब परिवार साथ खड़ा हो, तो सबसे बड़े ख़्वाब भी हक़ीक़त बन सकते हैं।

करियर की शुरुआत: कई खेल खेले, लेकिन असली पहचान Triple Jump से मिली
अपने करियर के शुरुआती दिनों में अरपिंदर सिंह ने 100 मीटर, 200 मीटर, 400 मीटर दौड़ और Long Jump में भी हाथ आज़माया। लेकिन उन्हें कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिली। फिर स्कूल लेवल की अंडर-17 प्रतियोगिता में उन्होंने Triple Jump में सिल्वर मेडल जीता। बस यहीं से उनका रुझान इस खेल की तरफ़ बढ़ गया और उन्होंने तय कर लिया कि अब इसी में अपना मुक़ाम बनाना है।
जब Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) 14 साल के थे, तो उनके पिता उन्हें अमृतसर में SAI (Sports Authority of India) के कोच डी.एस. बाल के पास लेकर गए। कोच ने Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) का 6 फीट 2 इंच लंबा कद और उनकी फिटनेस देखकर उन्हें Triple Jump अपनाने की सलाह दी। यही सलाह उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई।
शुरुआती ट्रेनिंग के बाद Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) लुधियाना के गुरु नानक स्टेडियम पहुंचे, जहां मशहूर कोच एस.एस. पन्नू ने उनकी ट्रेनिंग शुरू की। 2009 से 2015 तक कोच पन्नू ने उनकी कमियों पर मेहनत की और उन्हें इंटरनेशनल लेवल का खिलाड़ी बनने में बड़ी मदद की। 2009 के Youth National Games में जीत के बाद उन्हें पहचान मिली और उनके परिवार की माली हालत में भी कुछ सुधार आया। इसके बाद उन्होंने केरल में रोमानिया के कोच बैडरोस बैडरोसियन से ट्रेनिंग ली, जिन्होंने उनकी Jumping Technique और Speed को और बेहतर बनाया।
लेकिन कामयाबी का ये सफ़र इतना आसान नहीं था। करियर की शुरुआत में ही अरपिंदर की पीठ में चोट लग गई। डॉक्टरों ने उन्हें तीन महीने Bed Rest करने की सलाह दी। कई लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि अब उनका खेल करियर ख़त्म हो गया है। लेकिन अरपिंदर ने हार नहीं मानी। उन्होंने ज़बरदस्त वापसी की और एक बार फिर मैदान में उतरकर अपनी काबिलियत पूरी दुनिया को दिखा दी।

लंदन में Technique बदली और करियर मुश्किल दौर में पहुंच गया
2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल जीतने के बाद अरपिंदर सिंह को ओलंपिक की तैयारी के लिए लंदन भेजा गया। वहां एक विदेशी कोच ने उनकी Natural Jumping Technique में बदलाव कर दिया। लेकिन ये बदलाव उनके लिए फ़ायदेमंद नहीं रहा। इसका असर उनकी Performance पर साफ़ दिखाई दिया और उनका खेल पहले से कमज़ोर होने लगा। इस दौरान अरपिंदर काफी मेंटल प्रेशर में आ गए। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। भारत लौटने के बाद उन्होंने अपनी पुरानी Technique पर फिर से मेहनत शुरू की। उन्होंने एक बार फिर Zero से शुरुआत की और अपने खेल को पहले जैसा बनाने के लिए दिन-रात मेहनत की।
इसके बाद 2016 रियो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई न कर पाना उनके करियर का सबसे बड़ा झटका साबित हुआ। ये वो ख़्वाब था, जिसके लिए वो कई सालों से मेहनत कर रहे थे। मुश्किलें यहीं ख़त्म नहीं हुई। 2017 एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप, जो भुवनेश्वर में हुई, उसमें अरपिंदर सिर्फ़ 16.33 मीटर की छलांग लगा सके और चौथे नंबर पर रहे। मेडल से चूकना उनके लिए बड़ी मायूसी लेकर आया।
लगातार मिल रही इन नाकामयाबियों ने उनके हौसले का कड़ा इम्तिहान लिया। लेकिन अरपिंदर ने हालात के सामने झुकने के बजाय खुद पर भरोसा रखा। यही जज़्बा आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताक़त बना और उन्हें एक बार फिर कामयाबी की राह पर ले आया।
एशियन गेम्स 2018: जब अरपिंदर सिंह ने रचा इतिहास
कई सालों की नाकामयाबी, चोट और मायूसी के बाद आखिरकार वो दिन भी आया, जिसने अरपिंदर सिंह की ज़िंदगी बदल दी। 2018 एशियन गेम्स में उन्होंने ऐसा कमाल किया, जिसने पूरे देश को उन पर फ़ख्र करने का मौक़ा दिया। इंडोनेशिया के जकार्ता में हुए एशियन गेम्स में अरपिंदर सिंह ने 16.77 मीटर की शानदार छलांग लगाकर गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया। ये सिर्फ़ उनकी नहीं, बल्कि पूरे भारत की बड़ी कामयाबी थी।

इस जीत की सबसे ख़ास बात ये थी कि 48 साल बाद भारत ने Triple Jump में एशियन गेम्स का गोल्ड मेडल जीता था। इससे पहले मोहिंदर सिंह गिल ने ये कारनामा किया था। Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) ने उनकी इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा दिया।
जकार्ता की वो सुनहरी छलांग सिर्फ़ एक मेडल नहीं थी, बल्कि सालों की मेहनत, कुर्बानी और सब्र का इनाम थी। इस कामयाबी के बाद अरपिंदर सिंह पूरे देश के हीरो बन गए और उनकी कहानी लाखों नौजवानों के लिए हौसले और उम्मीद की नई मिसाल बन गई।
मेडलों की झड़ी और देश का गौरव बने अरपिंदर
Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) ने अपने करियर में एक के बाद एक कई बड़े मेडल जीतकर भारत का नाम दुनिया भर में रोशन किया। 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स (ग्लासगो) में उन्होंने 16.91 मीटर की छलांग के साथ ब्रॉन्ज मेडल जीता। इसके बाद 2018 एशियन गेम्स (जकार्ता) में 16.77 मीटर की शानदार छलांग लगाकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया। इसी साल IAAF Continental Cup में भी उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल जीता। इस प्रतियोगिता में मेडल जीतने वाले वो पहले भारतीय एथलीट बने। खेलों में उनके शानदार योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से भी नवाज़ा।
Arpinder Singh (अरपिंदर सिंह) की कहानी एक ऐसे खिलाड़ी की दास्तान है, जिसने मुश्किल हालात को अपनी मंज़िल के बीच कभी नहीं आने दिया। ग़रीबी हो, चोट हो या नाकामयाबी, हर बार उन्होंने पूरे हौसले के साथ वापसी की। पंजाब के एक छोटे से गांव से निकलकर दुनिया के बड़े-बड़े स्टेडियम तक पहुंचने वाला ये खिलाड़ी आज लाखों नौजवानों के लिए एक मिसाल है। अरपिंदर की ज़िंदगी हमें यही सिखाती है कि अगर इरादे मज़बूत हों, मेहनत में कोई कमी न हो और मां-बाप की दुआएं साथ हों, तो कोई भी ख़्वाब हक़ीक़त बन सकता है। उनकी ये कामयाबी आने वाली नस्लों और खिलाड़ियों को हमेशा बड़े ख़्वाब देखने और उन्हें पूरा करने का हौसला देती रहेगी।
स्टोरी– सुखमिंदर भंगू
इस लेख को पंजाबी में पढ़ें
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