उर्दू अदब की तारीख़ में, जिन्होंने अपनी इल्मी ख़िदमात, शायरी और तहक़ीक़ के ज़रिए हमेशा के लिए अपनी पहचान बनायी। मौलवी सैयद मोहम्मद अब्दुल ग़फ़ूर ‘शहबाज़’ (1857–1908) उन्हीं बुलंद नामों में शामिल हैं। वह एक उम्दा शायर, बेहतरीन मुतर्जिम (अनुवादक), आलोचक और शोधकर्ता थे। अदबी दुनिया में उन्हें “आंखों का शायर” भी कहा जाता था। नज़ीर अकबराबादी पर उनकी गहरी तहक़ीक़ आज भी उर्दू अदब में एक अहम संदर्भ मानी जाती है।
शहबाज़ की पैदाइश 1857 में बिहार के मौजूदा नालंदा ज़िले के सरमेरा गांव में एक बावक़ार सैयद ख़ानदान में हुयी। उनके वालिद सैयद तालिब अली एक ज़मींदार और इल्म-दोस्त शख़्सियत थे। शुरुआती तालीम उन्होंने अपने वालिद से हासिल की, जिसके बाद मुज़फ्फ़रपुर डिस्ट्रिक्ट हाई स्कूल में पढ़ाई की। आगे चलकर उन्होंने पटना के नेशनल कॉलेजिएट स्कूल से 1887 में इंट्रेंस परीक्षा पास की। अरबी, फ़ारसी, उर्दू, अंग्रेज़ी और बंगला जैसी कई ज़बानों पर उनकी शानदार पकड़ थी। मशहूर इस्लामी चिंतक अल्लामा जमालुद्दीन अफ़ग़ानी से भी उन्होंने अरबी अदब की कई किताबें पढ़ीं।
“मिट्टी का ही घर न होगा बर्बाद,
मिट्टी तेरे तन का घर भी होगा।”
तालीम पूरी करने के बाद 15 जुलाई 1897 को उन्हें औरंगाबाद इंटरमीडिएट कॉलेज में भौतिकी के व्याख्याता के रूप में नियुक्त किया गया। विज्ञान के शिक्षक होने के बावजूद उनका असली शौक़ अदब और इल्म की ख़िदमत थी। उन्होंने चिकित्सा से जुड़ी कई अंग्रेज़ी किताबों का उर्दू में अनुवाद किया ताकि इल्मी मालूमात आम लोगों तक उनकी अपनी ज़बान में पहुंच सके। अंग्रेज़ी शायरी की कई नज़्मों का भी उन्होंने मंज़ूम उर्दू तर्जुमा किया। बच्चों के लिए भी उन्होंने दिलचस्प और शिक्षाप्रद नज़्में लिखीं।
शहबाज़ की सबसे बड़ी पहचान नज़ीर अकबराबादी पर उनकी बेहतरीन तहक़ीक़ है। उनकी किताब “ज़िंदगानी-ए-बेनज़ीर” नज़ीर अकबराबादी की पहली मुकम्मल जीवनी मानी जाती है। इसके अलावा उन्होंने “कुल्लियात-ए-नज़ीर” का संपादन भी किया, जो आज भी शोधकर्ताओं और उर्दू के विद्यार्थियों के लिए एक अहम संदर्भ ग्रंथ है।
ज़िंदगी के एक दौर में उन्हें आर्थिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ा। हालात इतने मुश्किल हो गए कि उन्होंने अनुवाद(तर्जुमा) के साथ-साथ किताबें बेचने और ट्यूशन पढ़ाने का काम भी किया। लेकिन इन मुश्किलों ने उनके हौसले को कभी कमज़ोर नहीं किया। उन्होंने इल्म और अदब की ख़िदमत का सिलसिला लगातार जारी रखा।
उनकी इल्मी क़ाबिलियत को देखते हुए 1905 में भोपाल रियासत की नवाब शाहजहां बेगम ने उन्हें शिक्षा विभाग का संचालक और पहला लोक शिक्षा निदेशक नियुक्त किया। यह उनके इल्मी मुक़ाम और भरोसे का सबसे बड़ा सबूत था। उस दौर के बड़े शायर अल्ताफ़ हुसैन हाली और अकबर इलाहाबादी से उनके गहरे ताल्लुक़ात थे। नवाब सैयद महमूद आज़ाद के फ़ारसी दीवान की प्रस्तावना भी उन्होंने ही लिखी।
साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनका अहम योगदान रहा। उन्होंने “नूर-ए-बसीरत” नामक मासिक साहित्यिक पत्रिका की स्थापना और संपादन किया। इसके अलावा “दार-उल-सल्तनत” अख़बार के संपादक रहे और कई दूसरी पत्र-पत्रिकाओं से भी जुड़े रहे। उनकी किताब “तफ़रीह-अल-क़ुलूब” में उनकी तस्वीर और हस्तलेख आज भी सुरक्षित हैं, जो उनके अदबी सफ़र की यादगार निशानी माने जाते हैं।
शहबाज़ की शायरी में इश्क़, इंसानियत, फ़लसफ़ा और ज़िंदगी की सच्चाइयां बड़ी सादगी और असरदार अंदाज़ में नज़र आती हैं। उनके कई अशआर आज भी ज़बान-ए-ख़ल्क़ पर हैं। जैसे
“ख़ुदा ने मुंह में ज़बान दी है तो शुक्र ये है कि मुंह से बोलो,
कि कुछ दिनों में न मुंह रहेगा, न मुंह में चलती ज़बां रहेगी।”
“है इश्क़ तो फिर असर भी होगा,
जितना है इधर, उधर भी होगा।”
मौलवी सैयद मोहम्मद अब्दुल ग़फ़ूर ‘शहबाज़’ ने अपनी छोटी-सी ज़िंदगी में उर्दू अदब को जो दौलत दी, वह आज भी क़ीमती विरासत मानी जाती है। शायरी, अनुवाद, शोध, पत्रकारिता और शिक्षा—हर मैदान में उनकी ख़िदमात हमेशा याद रखी जाएंगी। उनकी ज़िंदगी इस बात की मिसाल है कि सच्चा इल्म और अदब वक़्त के साथ और ज़्यादा रोशन होता जाता है। आज भी उर्दू साहित्य का कोई गंभीर विद्यार्थी या शोधकर्ता शहबाज़ की इल्मी और अदबी ख़िदमात का ज़िक्र किए बिना अपनी बात मुकम्मल नहीं कर सकता।
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