उर्दू अदब की दुनिया में पहचान सिर्फ़ उनके अशआर से नहीं बल्कि उनके पूरे फ़िक्र, अंदाज़-ए-बयां और इंसानी सोच से होती है। हिमायत अली शायर उन्हीं चुनिंदा शायरों में से एक थे। उन्होंने ग़ज़ल, नज़्म, फ़िल्मी गीत, रेडियो, टेलीविज़न और तालीम—हर मैदान में अपनी क़ाबिलियत का ऐसा रंग बिखेरा कि उनका नाम उर्दू अदब के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।
बचपन से अदब तक का सफ़र
हिमायत अली शायर की पैदाइश 14 जुलाई 1926 को ब्रिटिश भारत के औरंगाबाद (हैदराबाद दक्कन) में हुयी। उनका असली बचपन आसान नहीं था। जब वे केवल तीन साल के थे, तभी उनकी मां का इंतिक़ाल हो गया। मां की ममता से महरूम इस बच्चे ने बहुत जल्दी ज़िंदगी की तल्ख़ियों को महसूस कर लिया।
अपने किसी अमल पे नदामत नहीं मुझे
था नेक-दिल बहुत जो गुनहगार मुझ में था।
कम उम्र में ही उनका मेल-जोल उस दौर के तरक़्क़ीपसंद अदीबों और शायरों से हुआ। यही संगत उनकी सोच और शायरी की बुनियाद बनी। बाद में उन्होंने सिंध विश्वविद्यालय, जामशोरो से उर्दू साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की।
ऑल इंडिया रेडियो से रेडियो पाकिस्तान तक
हिमायत अली शायर ने अपने पेशेवर सफ़र की शुरुआत ऑल इंडिया रेडियो से की। विभाजन के बाद वे 1951 में पाकिस्तान चले गए और रेडियो पाकिस्तान, कराची से जुड़ गए। रेडियो ने उनकी आवाज़, उनकी तहरीर और उनकी अदबी पहचान को एक नई बुलंदी दी।
उनका पहला शे’री मजमूआ “आग में फूल” 1956 में प्रकाशित हुआ। इस किताब को इतनी सराहना मिली कि 1958 में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
फ़िल्मी दुनिया में भी छोड़ी अमिट छाप
हिमायत अली शायर सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने पाकिस्तानी फ़िल्मों के लिए भी ऐसे गीत लिखे जो आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं।
फ़िल्म “आंचल” (1962) और “दामन” (1963) के लिए उन्हें करीब 2 साल तक निगार पुरस्कार से नवाज़ा गया।
इस जहां में तो अपना साया भी
रौशनी हो तो साथ चलता है।
उनके मशहूर गीतों में शामिल हैं।
- ना चुरा सकोगे दामन
- जाग उठा है सारा वतन
- खुदावंदा ये कैसी आग
- जब रात ढली
- तुझ को मालूम नहीं
- तुझ को क्या मालूम
इन गीतों में कभी मोहब्बत बोलती है, कभी वतन से लगाव और कभी इंसानी जज़्बात।
एक प्रोफ़ेसर जिसने अदब को ज़िंदगी बना लिया
साल 1976 में मशहूर सिंधी शायर शेख अयाज़ के आग्रह पर उन्होंने सिंध विश्वविद्यालय में उर्दू साहित्य के एसोसिएट प्रोफ़ेसर का पद संभाला।
करीब 11 साल तक उन्होंने तालेबा को उर्दू पढ़ाई। 1987 में रिटायरमेंट के बाद उन्होंने पूरी तरह साहित्य को अपना लिया।
तुझ से वफ़ा न की तो किसी से वफ़ा न की,
किस तरह इंतिक़ाम लिया अपने आप से।
सम्मान और पहचान
हिमायत अली शायर को अनेक पुरस्कारों से नवाज़ा गया।
- प्राइड ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस (2002)
- दो बार निगार पुरस्कार
- राष्ट्रपति पुरस्कार
- अल्लामा इक़बाल पुरस्कार
2010 में सिंध के हैदराबाद में उनके सम्मान में एक भव्य साहित्यिक समारोह आयोजित किया गया। इसी अवसर पर “हिमायत अली शायर चेयर” स्थापित करने की घोषणा भी की गई, ताकि उनके साहित्य पर एम.फिल. और पीएचडी स्तर पर शोध को बढ़ावा मिल सके।
उन्होंने 1949 में मेराज नसीम से विवाह किया। दोनों ने करीब 52 साल साथ बिताए। उनकी पत्नी का कनाडा में लीवर कैंसर की वजह से निधन हो गया।
जीवन के आख़िरी साल में हिमायत अली शायर पाकिस्तान और कनाडा के बीच समय बिताते रहे, जबकि अपने जन्मस्थान भारत से उनका रिश्ता भी हमेशा बना रहा।
15 जुलाई 2019 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी शायरी आज भी ज़िंदा है।
हम भी हैं किसी कहफ़ के असहाब के मानिंद,
ऐसा न हो जब आंख खुले वक़्त गुज़र जाए।
हिमायत अली शायर की विरासत
हिमायत अली शायर उन शायरों में थे जिन्होंने उर्दू को सिर्फ़ शायरी की ज़बान नहीं रहने दिया, बल्कि उसे तहज़ीब, मोहब्बत, इंसानियत और इल्म का ज़रिया बनाया। उनकी ग़ज़लों में एहसास है, नज़्मों में फ़िक्र है, गीतों में रूह है और तहरीरों में इतिहास।
आज भी जब उर्दू अदब की बात होती है, हिमायत अली शायर का नाम बड़े एहतराम से लिया जाता है। उनकी शायरी हमें याद दिलाती है कि अल्फ़ाज़ अगर दिल से निकलें, तो सदियों तक लोगों के दिलों में ज़िंदा रहते हैं।
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