उर्दू अदब की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिनकी तहरीरें सिर्फ़ काग़ज़ पर लिखे हुए अल्फ़ाज़ नहीं होतीं, बल्कि समाज की धड़कनों की आवाज़ बन जाती हैं। जीलानी बानो भी ऐसी ही अज़ीम अफ़सानानिगार और उपन्यासकार थीं, जिन्होंने अपनी क़लम से औरत, समाज, इंसानियत और हैदराबाद की गंगा-जमुनी तहज़ीब को नई पहचान दी। उन्होंने अपनी कहानियों में उन लोगों की ज़िंदगी को जगह दी, जिनकी आवाज़ अक्सर समाज में दबा दी जाती है।
1 मार्च 2026 को जीलानी बानो इस दुनिया से रुख़्सत हो गईं, लेकिन उनकी तहरीरें आज भी उर्दू अदब के आसमान पर एक रौशन सितारे की तरह चमक रही हैं।
शायरी के माहौल में बीता बचपन
जीलानी बानो की पैदाइश 14 जुलाई 1936 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुयी। उनके वालिद हैरत बदायूनी अपने दौर के मशहूर शायर थे। अदब और शायरी का यह ज़ौक़ उन्हें विरासत में मिला।
बाद में उनका परिवार हैदराबाद दक्कन आकर बस गया। यहीं उनकी परवरिश ऐसे घर में हुई, जहां अदब, इल्म और तहज़ीब की महफ़िलें सजती थीं। उनके घर पर उस दौर के बड़े-बड़े अदीब और शायर—सज्जाद ज़हीर, मख़दूम मोहिउद्दीन, जिगर मुरादाबादी, कृष्ण चंदर और मजरूह सुल्तानपुरी जैसे नाम अक्सर आते-जाते थे।
इन साहित्यिक बैठकों ने जीलानी बानो की सोच को नई दिशा दी। उन्होंने बहुत कम उम्र में यह समझ लिया कि साहित्य सिर्फ़ मनोरंजन का ज़रिया नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने का सबसे असरदार ज़रिया भी है।
सिर्फ़ 16 साल की उम्र में लिखी पहली कहानी
जीलानी बानो ने महज़ 16 साल की उम्र में अपनी पहली कहानी “एक नज़र इधर भी” लिखी। यह कहानी 1952 में लिखी गई थी।
लेकिन उन्हें असली पहचान उनकी मशहूर कहानी “मोम की मरियम” से मिली। इस कहानी ने उर्दू अदब की दुनिया में तहलका मचा दिया और जीलानी बानो को नई पीढ़ी की सबसे मज़बूत अफ़सानानिगारों में शामिल कर दिया।
इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
औरत नहीं, इंसान की कहानी लिखी
अक्सर जीलानी बानो को एक नारीवादी लेखिका कहा जाता है, लेकिन वे ख़ुद इस दायरे में बंधना पसंद नहीं करती थीं। उनका कहना था—
“मैं सिर्फ़ औरतों के मसाइल नहीं लिखती, मैं इंसान के मसाइल लिखती हूं।”
यही वजह है कि उनकी कहानियों में औरतें सिर्फ़ मज़लूम किरदार बनकर नहीं आतीं, बल्कि अपनी पहचान, अपने हक़ और अपनी ख़ुद्दारी के लिए लड़ती हुई नज़र आती हैं।
उनकी नज़र में समाज का दर्द किसी एक तबक़े का दर्द नहीं होता। चाहे वह औरत हो, मज़दूर हो, ग़रीब हो या समाज का कोई भी कमज़ोर इंसान—हर पीड़ा उनकी क़लम में बराबर जगह पाती है।
हैदराबाद की तहज़ीब को शब्दों में उतारने वाली लेखिका
अगर किसी लेखक ने हैदराबाद की तहज़ीब, नवाबी रिवायत, बदलते समाज और टूटते हुए सामंती निज़ाम को सबसे गहराई से अपनी तहरीरों में दर्ज किया, तो उनमें जीलानी बानो का नाम सबसे आगे लिया जाता है।
उन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों में पुरानी हवेलियों की ख़ामोशी, बदलते दौर की बेचैनी, रिश्तों की गर्माहट और समाज की टूटती बुनियाद को बेहद ख़ूबसूरती से पेश किया।
उनकी रचनाओं में सिर्फ़ हैदराबाद नहीं, बल्कि पूरा हिंदुस्तान अपनी तमाम रंगतों के साथ दिखाई देता है।
‘ऐवान-ए-ग़ज़ल’—उर्दू उपन्यास का मील का पत्थर
जीलानी बानो का उपन्यास “ऐवान-ए-ग़ज़ल” उर्दू साहित्य की सबसे अहम कृतियों में गिना जाता है।
इस उपन्यास में उन्होंने हैदराबाद के सामंती समाज के पतन, तेलंगाना आंदोलन, देश के बंटवारे और आसफ़जाही सल्तनत के अंत को बेहद कलात्मक और संवेदनशील ढंग से चित्रित किया।
यह सिर्फ़ एक उपन्यास नहीं, बल्कि इतिहास, समाज और इंसानी जज़्बातों का दस्तावेज़ बन गया।
इसी तरह उनका दूसरा अहम उपन्यास “बारिश-ए-संग” सामाजिक, मानसिक और राजनीतिक संघर्षों की गहरी पड़ताल करता है।
कहानियां जो समाज का आईना बन गईं
जीलानी बानो ने उर्दू अदब को कई यादगार कहानी संग्रह दिए। “रोशनी के मीनार”, “पराया घर”, “रोज़ का क़िस्सा”, “ये कौन हंसा”, “तिरयाक”, “सच के सिवा”, “कुन” और “रास्ता बंद है” जैसी किताबें आज भी उर्दू कहानी की बेहतरीन मिसाल मानी जाती हैं।
उनकी हर कहानी में समाज का कोई न कोई अनकहा सच सामने आता है।
ड्रामा, संस्मरण और डॉक्यूमेंट्री तक फैला सफ़र
जीलानी बानो सिर्फ़ कहानी और उपन्यास तक सीमित नहीं रहीं।
उन्होंने “नर्सिया की बावड़ी” नामक नाटक लिखा, “मैं कौन हूं” शीर्षक से संस्मरण लिखे और “दूर की आवाज़ें” के रूप में अपने ख़तों को भी प्रकाशित किया।
इसके अलावा उन्होंने मशहूर डॉक्यूमेंट्री “Hyderabad: A City, A Culture” की पटकथा भी लिखी, जो हैदराबाद की सांस्कृतिक विरासत को नए अंदाज़ में पेश करती है।
ऐसी आवाज़, जो हमेशा ज़िंदा रहेगी
1 मार्च 2026 को जीलानी बानो इस दुनिया से रुख़्सत हो गईं। लेकिन किसी सच्चे अदीब की पहचान उसकी उम्र से नहीं, उसकी तहरीरों से होती है।
जीलानी बानो ने अपनी क़लम से औरत की ख़ामोशी को आवाज़ दी, समाज के हाशिये पर खड़े लोगों को पहचान दी और हैदराबाद की तहज़ीब को हमेशा के लिए उर्दू अदब का हिस्सा बना दिया।
जीलानी बानो सिर्फ़ एक अफ़सानानिगार नहीं थीं, बल्कि उर्दू अदब की वह रौशन आवाज़ थीं, जिसने अपनी क़लम से समाज की रूह को अल्फ़ाज़ दिए।
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