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700 साल पुरानी रामचरितमानस और दरगाह से मिली 300 साल पुरानी पांडुलिपियां

भारत की पहचान सिर्फ़ उसके किले, मंदिर और ऐतिहासिक इमारतों से नहीं है। हमारी सबसे बड़ी धरोहर उन हस्तलिखित पांडुलिपियों में भी छिपी है, जिनमें सदियों का ज्ञान, इतिहास, धर्म, दर्शन, साहित्य और संस्कृति दर्ज है। ये पांडुलिपियां हमारे अतीत की ऐसी अमानत हैं, जो बताती हैं कि भारत की ज्ञान परंपरा कितनी समृद्ध रही है। लेकिन समय के साथ इनमें से कई पांडुलिपियां नमी, धूल, दीमक और सही देखभाल न मिलने की वजह से खराब होने लगी।

इन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने के मक़सद से केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ की शुरुआत की है। इस मिशन के तहत देशभर के मंदिरों, मठों, गुरुद्वारों, मस्जिदों, दरगाहों, पुस्तकालयों और निजी संग्रहों में मौजूद दुर्लभ पांडुलिपियों को खोजा जा रहा है, उनका सर्वे किया जा रहा है और उन्हें डिजिटल तौर पर हमेशा के लिए सुरक्षित किया जा रहा है।

Source: PB SHABD

नालंदा निभा रहा है अहम भूमिका

इस राष्ट्रीय अभियान में बिहार का नालंदा एक बार फिर ज्ञान की धरती के तौर पर अपनी ख़ास भूमिका निभा रहा है। नालंदा में मौजूद नव नालंदा महाविहार को राज्य का क्लस्टर सेंटर बनाया गया है। यही संस्थान बिहार के 13 ज़िलों में फैली दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज, उनकी पहचान, दस्तावेजीकरण और डिजिटाइजेशन का काम कर रहा है। जिस धरती पर कभी दुनिया का सबसे प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र हुआ करता था, वहीं से आज भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को भविष्य के लिए सुरक्षित रखने की नई शुरुआत हो रही है।

तीन लाख पांडुलिपियों का सर्वे, लाखों दस्तावेज़ डिजिटल

नव नालंदा महाविहार की करीब 26 लोगों की टीम लगातार अलग-अलग ज़िलों में जाकर इस मिशन पर काम कर रही है। अब तक बिहार के 13 ज़िलों में करीब 3 लाख पांडुलिपियों का सर्वे किया जा चुका है। इनमें से लगभग 1.63 लाख पांडुलिपियों की स्कैनिंग पूरी हो चुकी है, जबकि 1,000 से ज़्यादा पांडुलिपियों का विस्तार से दस्तावेजीकरण भी किया गया है। ये काम आसान नहीं है, क्योंकि कई पांडुलिपियां सैकड़ों साल पुरानी और बेहद नाज़ुक हालत में हैं। इसलिए विशेषज्ञ पूरी सावधानी के साथ उन्हें संभालते हुए डिजिटल तौर पर सुरक्षित कर रहे हैं, ताकि उनकी मूल स्थिति को कोई नुकसान न पहुंचे।

Source: PB SHABD

इतिहास के कई अनमोल ख़ज़ाने आए सामने

इस अभियान के दौरान कई ऐसी दुर्लभ पांडुलिपियां भी सामने आई हैं, जिन्होंने इतिहास के भूले-बिसरे पन्नों को फिर से ज़िंदा कर दिया है। राजगीर के वीरायतन से लगभग 700 हस्तलिखित पांडुलिपियां मिली हैं। वहीं लखीसराय से करीब 700 साल पुरानी रामचरितमानस की पांडुलिपि मिली है, जबकि गया ज़िले की बीथो शरीफ़ दरगाह से लगभग 300 वर्ष पुरानी पांडुलिपियां सामने आई हैं। ये खोजें सिर्फ़ धार्मिक नज़रिये से ही नहीं, बल्कि इतिहास, भाषा, साहित्य और संस्कृति के अध्ययन के लिए भी बेहद अहम मानी जा रही हैं। इन दस्तावेज़ों से आने वाले समय में शोधकर्ताओं को भारत के अतीत को और बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी।

Source: PB SHABD

आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ी पहल

नव नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह का कहना है कि ये मिशन भारत की हज़ारों वर्षों पुरानी ज्ञान परंपरा को दुनिया के सामने लाने की दिशा में एक अहम कदम है। उनके मुताबिक आज भी देश के कई धार्मिक स्थलों और निजी संग्रहों में ऐसी अनमोल पांडुलिपियां सुरक्षित हैं, जिनमें बेहद कीमती जानकारी छिपी हुई है। अगर इन्हें समय रहते संरक्षित नहीं किया गया, तो ये विरासत हमेशा के लिए खो सकती है। यही वजह है कि इन पांडुलिपियों का वैज्ञानिक तरीकों से संरक्षण और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है।

दुनिया तक पहुंचेगी बिहार की विरासत

इस परियोजना से जुड़ी टीम का मानना है कि डिजिटल तकनीक के ज़रिए इन पांडुलिपियों को नई ज़िंदगी मिल रही है। क्लस्टर नोडल अधिकारी प्रो. विश्वजीत कुमार, मिशन सदस्य प्रीति कुमारी और टीम सदस्य चेतन कीर्ति सिंह के मुताबिक, ये पहल भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को सुरक्षित रखने के साथ-साथ उसे नई पीढ़ी और दुनिया तक पहुंचाने का भी एक अहम ज़रिया बनेगी।

Source: PB SHABD

इन सभी पांडुलिपियों को राष्ट्रीय डिजिटल पोर्टल पर उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे देश-विदेश के शोधकर्ता, विद्यार्थी और इतिहास में रुचि रखने वाले लोग इनका अध्ययन कर सकेंगे। कभी नालंदा ने पूरी दुनिया को ज्ञान का प्रकाश दिया था, और आज उसी धरती से उस ज्ञान को डिजिटल रूप में हमेशा के लिए सुरक्षित रखने की एक नई कहानी लिखी जा रही है।

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