भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब सेशेल्स की कोई कोई गिफ्ट दिया, तो वो सिर्फ एक ‘तोहफा’ नहीं था। ये हजारों सालों की मेहनत, सूफियाना अंदाज़ में बुनी गई एक कहानी थी, जो भारत की ‘रूह’ को समेटे हुए थी। मध्य प्रदेश के माहेश्वर की ‘रेशमी-सूती’ साड़ी (Maheshwari Silk)। सेशेल्स की फर्स्ट लेडी, वेरोनिक हर्मिनी (Seychelles’ First Lady, Veronique Herminie) को भारत की हथकरघा और मेटलक्राफ्ट परंपराओं को दर्शाने वाला माहेश्वरी सिल्क स्टोल (Maheshwari Silk Stole) और बिदरीवेयर बॉक्स भेंट किया गया।
ये उपहार सिर्फ दो देशों के रिश्तों का प्रतीक नहीं बना, बल्कि ये उस ‘हुनरमंद’ भारत की पहचान बना, जो आज भी अपनी पुरानी ‘तहज़ीब’ को संजोए हुए है। चलिए, आज हम इसी तोहफे की ‘तफ़सील’ में जाते हैं और जानते हैं कि आख़िर इसमें ऐसा क्या था, जिसने एक पूरे देश के दिल को छू लिया।

माहेश्वरी रेशमी स्टोल: नर्मदा के किनारे बुना गया ‘ख्वाब’
मध्य प्रदेश के माहेश्वर शहर की ये ‘माहेश्वरी’ स्टोल है। ये वो जगह है जहां नर्मदा नदी बहती है और रानी अहिल्याबाई होल्कर ने 18वीं सदी में इस कला को ‘जन्नत’ जैसा बना दिया था।
रानी अहिल्याबाई ने सूरत और मांडू से बुनकरों (जुलाहों) को बुलाकर यहां बसाया। कहा जाता है कि पहली माहेश्वरी साड़ी की डिजाइन खुद रानी ने बनाई थी।
खास बुनावट: इसमें ‘बाना’ (Weft) में सूती धागा और ‘ताना’ (Warp) में रेशम (सिल्क) का इस्तेमाल होता है। इसलिए ये बेहद हल्की, चमकदार और गर्मी में ठंडी महसूस होती है।
डिजाइन: इसके किनारे (Border) पर बने डिजाइन कहीं से कॉपी नहीं किए गए हैं। ये माहेश्वर किले की ईंटों (ईंट), नर्मदा की लहरों (लेहरिया), और चटाई (चटाई) के आकार से प्रेरित हैं। यानी, जो दिखता है, वहीं बुन दिया जाता है, जैसे कपड़े पर किले की ‘तस्वीर’ उतर आई हो।

जीआई टैग: एक ‘पहचान’ जो कोई नहीं चुरा सकता
इस कला को 2010 में भौगोलिक संकेत (GI Tag) मिला। इसका मतलब है कि ‘माहेश्वरी’ नाम सिर्फ माहेश्वर का ‘हक़’ है। ये ऐसा टैग है जो बताता है कि ये असली है, नकली नहीं। ये उन 3,000 से ज्यादा करघों (लूम) पर काम करने वाले बुनकरों के ‘पसीने’ (मेहनत) की निशानी है।
हिंदुस्तानी ‘अंदाज़’ और सेशेल्स की ‘सोंधी महक’
प्रधानमंत्री मोदी ने ये गिफ्ट चुनकर भारत के ‘ग्रामीण’ और ‘आदिवासी’ हुनर को एक ग्लोबल मंच दिया। यह सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि भारत का ‘अक्स’ है।
माहेश्वरी स्टोल ने बताया कि हमारी रानियां कितनी बड़ी कलाकार थीं और हमारे बुनकर कितने ‘माहिर’ (Expert) हैं।

हुनर की ये ‘पोथी’ कभी बंद नहीं होगी
जब भी कोई विदेशी मेहमान इस शॉल या स्टोल को देखेगा, तो उसे लगेगा कि उसके हाथ में सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि एक ‘तारीख’ (इतिहास) और एक ‘जज़्बा’ (जुनून) है। मोदी जी ने इस उपहार के जरिए दुनिया को बताया कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी ‘विविधता’ (Diversity) और उसके ‘हुनरमंद’ हाथ हैं।
आज माहेश्वर की करघों की खड़खड़ाहट दुनिया भर में भारत का ‘नाम’ रोशन कर रहे हैं। ये कहानी हमें सिखाती है कि जब हम अपनी ‘जड़ों’ को याद करते हैं, तो पूरी दुनिया हमारी तरफ ‘देखती’ है। ये सिर्फ एक शॉल या स्टोल नहीं है। ये ‘हिंदुस्तान’ का वो आईना है, जिसमें उसकी ‘आत्मा’ दिखती है।
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