Monday, September 21, 2026
30.1 C
Delhi

Dhokra: बस्तर की वो अनोखी धातुओं की लुप्त होती भाषा जो सिंधु घाटी से चली आ रही है

अगर नहीं, तो चलिए ले चलते हैं हम आपको छत्तीसगढ़ के बस्तर के उस जादुई गांव में, जहां मिट्टी, मोम और आग कमाल कर दिखाते हैं। यहां हाथों में सिर्फ औज़ार नहीं, बल्कि हड़प्पा-मोहनजोदड़ो (Harappa & Mohenjodaro) की सांसें बसती हैं। ये है ढोकरा (Dhokra) धातुओं की वो लुप्त होती भाषा, जिसे पूरी दुनिया सलाम करती है।

पहली नज़र में लगता है साधारण, पर है अद्भुत!

जब आप बस्तर के बाजार में हाथी, मोर या आदिवासी देवता ‘पेड़सा पेन’ (Persa Pen) की मूर्ति देखेंगे, तो लगेगा, पीतल ढाला है। पर नहीं.. ये तो ‘लॉस्ट वैक्स तकनीक’ (Lost Wax Technique) का चमत्कार है। यानी पहले मोम का बेहद बारीक नमूना बनाया जाता है, फिर उसे मिट्टी की परतों में दफना दिया जाता है। और जब आग की तपिश बढ़ती है, तो मोम पिघलकर ‘गायब’ हो जाता है। उसी खाली जगह में पिघला हुआ कबाड़ धातु (scrap metal) जैसे टूटे बरतन, डाला जाता है। ठंडा होने पर मिट्टी तोड़ते हैं… और एक अनोखी चमक-दमक से भरी कलाकृति जन्म लेती है।

सबसे मजेदार बात: यहां कोई सांचा नहीं, कोई मशीन नहीं। 16 लंबे स्टेप से गुजरकर हर टुकड़ा खुद में एक ‘मास्टरपीस’ बनता है।

incredibleindia.gov.in

घुमंतू से विश्व पटल तक

इसका जन्मदाता कोई राजा नहीं, बल्कि पूर्वी और मध्य भारत की घुमंतू जातियां (nomadic communities) हैं। उन्होंने देखा कि कैसे मोम और मिट्टी अगर साथ खेलें, तो धातु रूई की तरह ढल सकती है। आज ये कला बस्तर की पहचान है। इतना गहरा संबंध है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर में देश का पहला GiTAGGED पंचायत (भौगोलिक संकेत टैग) भी पाया है। यानी असली ढोकरा अब ‘प्रमाणित विरासत’ है।

एक ढोकरा घर लाने का मतलब?

सिर्फ एक शो-पीस नहीं, बल्कि एक कहानी। ये कहानी उस कारीगर के हाथों की जलन की है, जिसने 40 डिग्री में मोम पिघलाया, राख और चावल की भूसी (rice husk) से सांचा बनाया, और बिना किसी मॉडल के सिर्फ अपने अनुभव से अनोखी लाइन्स खींची।

जब आप असली ढोकरा खरीदते हैं, तो आप:

  • एक बस्तर के परिवार को रोज़गार देते हैं,
  • सिंधु घाटी की 5000 साल पुरानी कला को बचाते हैं,
  • और अपने घर ले जाते हैं ‘कबाड़ से किमिया’ (scrap to art) का जादू।

अब जानिए वो राज़ जो कोई नहीं बताता

आम ढलाई में एक ही सांचे से सैकड़ों मूर्तियां बनती हैं, पर ढोकरा में हर टुकड़ा अलग होता है। क्योंकि मोम का हर नमूना हाथ से गढ़ा जाता है। अगर मूर्ति बड़ी है, तो उसके हाथ-पैर अलग से ढालकर जोड़े जाते हैं। और हां, इस्तेमाल होने वाला मोम असली मधुमक्खी का मोम (beeswax) या पैराफिन मोम होता है, जिसमें अखरोट का तेल और पेड़ की राल मिलाई जाती है।

ये भी पढ़ें:   ‘ऐब-ए-रवां’ से ‘बाफ़्त-हवा’ तक : वो भारतीय शान जिसने मुगलों को दीवाना बनाया, मलमल जिसे देख यूरोप हैरान रह गया

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

ज़ियाउद्दीन अहमद: दक्कन के इतिहास और अदब का रौशन नाम

मोहम्मद ज़ियाउद्दीन अहमद शाकेब, जिन्हें एम.जे.ए. शाकेब के नाम...

कश्मीरी लाल ज़ाकिर: तरक़्क़ीपसंद सोच का बेबाक क़लमकार

कश्मीरी लाल ज़ाकिर उर्दू और हिंदी अदब के उन...

इज़हार असर: उर्दू साइंस फ़िक्शन के संजीदा क़लमकार और उनकी शायरी

इज़हार असर उर्दू अदब के उन गिने-चुने लिखने वालों...

Topics

ज़ियाउद्दीन अहमद: दक्कन के इतिहास और अदब का रौशन नाम

मोहम्मद ज़ियाउद्दीन अहमद शाकेब, जिन्हें एम.जे.ए. शाकेब के नाम...

कश्मीरी लाल ज़ाकिर: तरक़्क़ीपसंद सोच का बेबाक क़लमकार

कश्मीरी लाल ज़ाकिर उर्दू और हिंदी अदब के उन...

इज़हार असर: उर्दू साइंस फ़िक्शन के संजीदा क़लमकार और उनकी शायरी

इज़हार असर उर्दू अदब के उन गिने-चुने लिखने वालों...

लेफ्टिनेंट जनरल Harbaksh Singh: 1965 की जंग का हीरो

लेफ्टिनेंट जनरल Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) भारतीय फ़ौज के...

रविश सिद्दीक़ी: वो शायर जिसने कश्मीर की वादियों को ग़ज़ल में पिरोया

कुछ शायर अपने लफ़्ज़ों में सिर्फ़ महबूब की तस्वीर...

Related Articles

Popular Categories