तरनतारन शहर का ऐतिहासिक अड्डा बाज़ार, जो श्री दरबार साहिब की तरफ जाता है, शहर के सबसे पुराने और रौनक भरे बाज़ारों में गिना जाता है। इस बाज़ार में हर रोज़ भारी भीड़ रहती है। सिर्फ़ शहर ही नहीं, बल्कि ज़िले के 190 से ज़्यादा गांवों के लोग अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए यहां आते हैं। लेकिन इसी शोर-शराबे और भीड़ के बीच एक ऐसी जगह भी मौजूद है, जहां सुकून, इल्म और किताबों की ख़ुशबू आज भी ज़िंदा है। इस जगह का नाम है “Bhai Mohan Singh Vaid Memorial Library।”
करीब साढ़े तीन दशक पुरानी ये लाइब्रेरी मशहूर लेखक, समाज सुधारक और किताबों से मोहब्बत करने वाले Bhai Mohan Singh Vaid (1881-1936) की याद में बनाई गई थी। आज के डिजिटल दौर में कई स्कूल और कॉलेज के स्टूडेंट्स इस इमारत के सामने से गुज़र जाते हैं, लेकिन उन्हें शायद इसकी अहमियत का अंदाज़ा नहीं होता। वहीं गांवों से आने वाले किताब प्रेमियों के लिए Bhai Mohan Singh Vaid Memorial Library आज भी इल्म का बड़ा मरकज़ बनी हुई है।
लाइब्रेरी के करीब 770 मेंबर
लाइब्रेरी के देखरेख करने वाले 67 साल के दीदार सिंह, जो PSPCL से रिटायर हो चुके हैं, बताते हैं कि इस वक़्त लाइब्रेरी के करीब 770 मेंबर हैं। दिलचस्प बात ये है कि इनमें शहर के लोगों से ज़्यादा गांवों के लोग शामिल हैं। रिकॉर्ड के मुताबिक, ज़िले के 43 गांवों के लोग इस लाइब्रेरी से जुड़े हुए हैं।
दीदार सिंह कहते हैं कि गांवों में अक्सर लाइब्रेरी जैसी सहूलियतें नहीं होती, इसलिए पढ़ने का शौक़ रखने वाले लोग यहां आते हैं। उनका कहना है कि शहर के स्टूडेंट्स की दिलचस्पी भले कम हो, लेकिन गांवों के स्कूलों में किताबों को लेकर अच्छा जोश देखने को मिल रहा है। हाल ही में रसूलपुर गांव के बाबा बसता सिंह हाई स्कूल के 25 स्टूडेंट्स और 3 टीचर लाइब्रेरी देखने आए थे और उन्होंने मेंबर बनने में ख़ास दिलचस्पी दिखाई।
8000 से ज़्यादा किताबों का संग्रह
रिटायर्ड टीचर जसविंदर सिंह, जो पिछले 15 सालों से लाइब्रेरी की खिदमत कर रहे हैं, बताते हैं कि यहां 8000 से ज़्यादा किताबें मौजूद हैं। इनमें सिख इतिहासकारों के लेखन, मज़हबी किताबें, मशहूर हस्तियों की जीवनियां और बड़े लेखकों की रचनाएं शामिल हैं। Bhai Mohan Singh Vaid Memorial Library में भगत पूरण सिंह, रघबीर सिंह बीर, सोहन सिंह सीतल, भाई वीर सिंह और संत सेवा सिंह रामपुर जैसे लेखकों की किताबें भी रखी गई हैं। यहां अंग्रेज़ी किताबों का भी एक अलग सेक्शन मौजूद है, लेकिन स्थानीय पाठकों में पंजाबी साहित्य सबसे ज़्यादा पसंद किया जाता है।

लाइब्रेरी को बेहतर बनाने की ज़रूरत
Bhai Mohan Singh Vaid Memorial Library की एक पाठक का कहना है कि इस ऐतिहासिक इदारे को संभालने और माडर्न बनाने की सख्त ज़रूरत है। उनका कहना है कि गांवों के कई नौजवान, ख़ासकर सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे, किताबें पढ़ना चाहते हैं लेकिन उनके पास कोई संसाधन नहीं हैं।
उन्होंने मांग की कि लाइब्रेरी में बैठने की बेहतर सहूलियतें होनी चाहिए, ख़ासकर लड़कियों के लिए। साथ ही लाइब्रेरी का दायरा भी बढ़ाया जाना चाहिए ताकि ज़्यादा से ज़्यादा नौजवान किताबों और पढ़ाई से जुड़ सकें। उनका मानना है कि किताबों से रिश्ता ही नौजवानों की शख़्सियतें और करियर को मज़बूत बना सकता है।
कौन थे भाई मोहन सिंह वैद?
Bhai Mohan Singh Vaid Memorial की पैदाइश 7 मार्च 1881 को तरनतारन में हुई थी। उन्होंने अपने पिता भाई जैमल सिंह से आयुर्वेद की तालीम हासिल की और एक मशहूर वैद बने। हालांकि उन्होंने कोई बड़ी पढ़ाई नहीं की थी, लेकिन उनकी अंदरूनी जिज्ञासा ने उन्हें सिख इतिहास, सियासत, अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान का विद्वान बना दिया।
उन्होंने अपनी ज़िंदगी में करीब 200 किताबें और ट्रैक्ट लिखे। इसके अलावा उन्होंने कई पश्चिमी क्लासिक किताबों का पंजाबी में तर्जुमा भी किया ताकि पंजाबी पाठक दुनिया के साहित्य को समझ सकें। उनकी कई दुर्लभ किताबें और रिसाले बाद में उनके परिवार की तरफ से पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला को दान कर दिए गए, जो आज उत्तर भारत में एक महत्वपूर्ण संसाधन है।
लाइब्रेरी की शुरुआत
Bhai Mohan Singh Vaid Memorial का 3 अक्टूबर 1936 को निधन हो गया। उनके बेटे सुखबीर सिंह ने साल 1992 में दो कमरों की जगह में Bhai Mohan Singh Vaid Memorial Library की शुरुआत की थी। आज इसकी देखरेख उनकी पोती डॉ. सुरिंदर कौर नरूला, जो यूके में रहती हैं, कर रही हैं।
Bhai Mohan Singh Vaid Memorial Library सिर्फ़ किताबों का संग्रह नहीं, बल्कि गांवों और छोटे कस्बों में ज्ञान की ऐसी लौ है, जो पिछले तीन दशकों से लगातार जल रही है। ज़रूरत इस बात की है कि सरकार और सामाजिक संगठन दोनों मिलकर इस लाइब्रेरी को मॉडर्न सहूलियतों से लैस करें, ताकि पंजाब के युवाओं को फिर से किताबों की दुनिया से जोड़ा जा सके।
स्टोरी– गुरप्रीत सिंह
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