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समय के साथ कैसे बदली Mithila Painting? National Awardee Manisha Jha की प्रदर्शनी में मिलते हैं इसके जवाब

बिहार की मिट्टी में बसी कला और तहज़ीब हमेशा से लोगों को अपनी तरफ खींचती रही है। इन्हीं कलाओं में एक ख़ास नाम है मिथिला पेंटिंग (Mithila painting) का, जिसने गांव के आंगन और घरों की दीवारों से निकलकर आज दुनिया के बड़े-बड़े म्यूज़ियम तक अपना मुक़ाम बना लिया है। हाल के दिनों में बिहार म्यूज़ियम में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित कलाकार Manisha Jha की मिथिला पेंटिंग (Mithila painting) की एक ख़ास एग्ज़िबिशन लगाई गई, जो सिर्फ कला का प्रदर्शन नहीं बल्कि बिहार की विरासत, महिलाओं की रचनात्मकता और लोक संस्कृति की एक ख़ूबसूरत तस्वीर पेश करती है।

रंगों में बसी मिथिला की दुनिया

इस एग्ज़िबिशन में मिथिला पेंटिंग (Mithila painting) की कई शानदार कलाकृतियां दिखाई गई हैं। हर पेंटिंग अपने रंगों, बारीक डिज़ाइन और कहानी के ज़रिए लोगों को मिथिला की संस्कृति से जोड़ती है। कहीं देवी-देवताओं की तस्वीरें हैं, तो कहीं गांव की ज़िंदगी, रिश्ते, त्योहार और प्रकृति की झलक दिखाई देती है। इन पेंटिंग्स को देखकर ऐसा महसूस होता है जैसे बिहार की पुरानी रवायतें कैनवास पर ज़िंदा हो उठी हों।

मिथिला पेंटिंग (Mithila painting) की सबसे ख़ास बात है कि ये सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि महिलाओं की ज़िंदगी और उनके जज़्बातों से जुड़ी हुई परंपरा है। सदियों से बिहार के गांवों में महिलाएं त्योहारों, शादी-ब्याह और ख़ास मौक़ों पर अपने घरों की दीवारों और आंगनों में ये चित्र बनाती रही हैं। पहले ये कला सिर्फ़ घरों तक सीमित थी, लेकिन धीरे-धीरे इसने दुनिया भर में अपनी पहचान बना ली।

Image: PB Shabd

Manisha Jha की नई सोच

Manisha Jha उन कलाकारों में शामिल हैं जिन्होंने मिथिला पेंटिंग (Mithila painting) को नई सोच और नया मंच दिया। उन्होंने पारंपरिक विषयों के साथ-साथ महिलाओं के अधिकार, बदलते शहर, पर्यावरण और समाज जैसे मुद्दों को भी अपनी कला में जगह दी। उनकी पेंटिंग्स में दिल्ली, बनारस, जैसलमेर और मुंबई जैसे शहरों की झलक भी दिखाई देती है। यही वजह है कि उनकी कला पुराने और नए दौर को एक साथ जोड़ती नज़र आती है। साल 2014 में Pranab Mukherjee ने मनीषा झा को मिथिला लोक कला के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया था।

Manisha Jha एक self-taught artist हैं। उन्होंने ये कला अपनी दादी फूलमाया देवी, मां मंजू झा और मधुबनी ज़िले के सतलखा गांव की दूसरी महिलाओं को देखकर सीखी। बाद में उन्होंने दिल्ली में पढ़ाई की और Interior Designing का डिप्लोमा भी किया, लेकिन मिथिला पेंटिंग (Mithila painting) से उनका रिश्ता कभी नहीं टूटा। पिछले 35 सालों से वो लगातार इस कला को नए अंदाज़ में दुनिया के सामने पेश कर रही हैं।

महिलाओं की आवाज़ बनी मिथिला कला

Manisha Jha का मानना है कि मिथिला पेंटिंग (Mithila painting) महिलाओं की यात्रा की तरह है, क्योंकि इसे महिलाओं ने ही विकसित किया, संभाला और आगे बढ़ाया। उनके मुताबिक 1967 के बाद इस कला और इससे जुड़ी महिलाओं की दुनिया तक पहुंच तेज़ी से बढ़ी। आज मिथिला पेंटिंग (Mithila painting) सिर्फ़ बिहार तक सीमित नहीं रही, बल्कि दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बना चुकी है।

Image: PB Shabd

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता Manisha Jha ने दशकों तक पेंटिंग्स का संग्रह किया है और दुनिया भर में 300 से ज़्यादा प्रदर्शनियों का आयोजन किया है। लेकिन उन्होंने पहली बार अपना संग्रह बिहार में प्रदर्शित किया है। उनका कहना है कि इस एग्ज़िबिशन में पहली बार मिथिला पेंटिंग (Mithila painting) को chronological order यानी समयक्रम में दिखाया गया है। इससे आने वाली पीढ़ियां समझ सकेंगी कि अलग-अलग समय में कौन-से रंग, सामग्री और विषय इस्तेमाल किए जाते थे।

प्रदर्शनी में कई ऐसी पेंटिंग्स भी हैं जो बदलते समाज की कहानी बयान करती हैं। कहीं गांव से शहर की तरफ़ पलायन को दिखाया गया है, तो कहीं आधुनिक ज़िंदगी और प्रकृति के रिश्ते को। कुछ पेंटिंग्स में देवी काली और राधा-कृष्ण के पारंपरिक रूप दिखाई देते हैं, जबकि कुछ में शहरों की भागदौड़ और इंसानी जज़्बातों को रंगों के ज़रिए पेश किया गया है।

बिहार म्यूज़ियम की अहम कोशिश

बिहार म्यूज़ियम लगातार कोशिश कर रहा है कि बिहार की कला और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। इसी सोच के तहत इस एग्ज़िबिशन का आयोजन किया गया। उद्घाटन के मौक़े पर बिहार म्यूज़ियम के महानिदेशक Anjani Kumar Singh और कला एवं संस्कृति विभाग के सचिव प्रणव कुमार भी मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि इस तरह की नुमाइशें लोगों को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने का काम करती हैं।

अंजनी कुमार सिंह ने बताया कि जब बिहार म्यूज़ियम की योजना बनाई गई थी, तब ये तय किया गया कि बिहार की लोक कलाओं को भी उतनी ही अहमियत दी जाएगी जितनी ऐतिहासिक धरोहर को। इसी सोच के तहत म्यूज़ियम में लोक कला के लिए अलग गैलरी बनाई गई।

Image: PB Shabd

बिहार म्यूज़ियम में लगी ये एग्ज़िबिशन सिर्फ़ कला प्रेमियों के लिए नहीं, बल्कि हर उस इंसान के लिए ख़ास है जो अपनी संस्कृति, विरासत और लोक कलाओं को करीब से समझना चाहता है। ये एग्ज़िबिशन दिखाती है कि गांव के छोटे-से आंगन में शुरू हुई एक परंपरा आज पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना चुकी है। मिथिला पेंटिंग (Mithila painting) का ये सफ़र सिर्फ़ रंगों का सफ़र नहीं, बल्कि महिलाओं की मेहनत, रचनात्मकता और बिहार की समृद्ध तहज़ीब की कहानी भी है।

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