“दिल्ली की हस्ती मुनासिर कई हंगामों पर है” Mirza Ghalib के ये अल्फ़ाज़ उस दौर की याद दिलाते हैं, जब दिल्ली अपनी रौनक, अपनी तहज़ीब और अपनी पहचान के बदलते रंग देख रही थी। किला, चांदनी चौक, जामा मस्जिद, जमुना के पुल की सैर ये सब सिर्फ़ जगहें नहीं थी, बल्कि एक ज़िंदा शहर की धड़कन थी। इन्हीं धड़कनों में बसी है एक ख़ूबसूरत रिवायत “सैर-ए-गुल फरोशां” यानी Phool Walon Ki Sair, जो आज भी महरौली की फिज़ाओं में मोहब्बत की ख़ुशबू बिखेरती है। ये सैर सिर्फ फूलों की नहीं, बल्कि गंगा-जमुनी तहज़ीब की एक जीती-जागती मिसाल है जहां एक मन्नत दरगाह से उठकर मंदिर तक जाती है और दोनों को मोहब्बत के धागे में पिरो देती है।
एक मन्नत से शुरू हुई कहानी
Phool Walon Ki Sair की शुरुआत मुग़ल दौर में हुई और 1812 से ये रिवायत चली आ रही है। उस दौर के बादशाह अकबर शाह द्वितीय के दौर की एक कहानी इससे जुड़ी है। बादशाह अपने बेटे मिर्ज़ा जहांगीर को गद्दी देना चाहते थे, लेकिन अंग्रेज़ी हुक़ूमत इसके खिलाफ थी। अंग्रेज़ी हुक़ूमत के प्रतिनिधि मिस्टर आरकिबाल्ज सीटन चाहते थे कि ये गद्दी बादशाह के बड़े शहजादे मिर्ज़ा अबू ज़फ़र को मिले। सीटन के इस फैसले से नाराज़ होकर एक दिन गुस्से में मिर्ज़ा जहांगीर ने अंग्रेज़ अफसर पर गोली चला दी, लेकिन गोली उन्हें नहीं लगी। अंग्रेज़ो ने उन्हें इलाहाबाद के किले में नज़रबंद कर दिया गया।
दिल्ली में मायूसी छा गई। मिर्ज़ा जहांगीर की मां बेग़म ज़ीनत महल बहुत परेशान हुई। किसी ने उन्हें बताया कि Hazrat Qutbuddin Bakhtiyar Kaki Dargah पर मांगी गई मन्नत खाली नहीं जाती। उन्होंने दुआ मांगी कि अगर उनका बेटा वापस आ जाए, तो वो दरगाह पर फूलों की चादर चढ़ाएंगी और पास के योगमाया मंदिर में पंखा चढ़ाएंगी।

जब मन्नत पूरी हुई और सैर शुरू हुई
जब उनकी दुआ कबूल हुई, तो एक शानदार जुलूस निकाला गया। महलों से हाथी-घोड़े निकले, लोग सजे-धजे बाहर आए और पूरा काफिला महरौली की तरफ चल पड़ा। इस काफिले में फूल बेचने वाले गुलफरोश अपने हाथों से बनाई हुई चादरें और पंखे लेकर चल रहे थे। चारों तरफ फूलों की ख़ुशबू थी, रंग-बिरंगी सजावट थी और लोगों के चेहरों पर खुशी। यही मंज़र आगे चलकर “Phool Walon Ki Sair” के नाम से जाना गया एक ऐसी सैर, जिसे देखकर दिल खुश हो जाए।
धीरे-धीरे ये मेला हिंदू-मुस्लिम एकता की पहचान बन गया। दरगाह पर चादर चढ़ती है, तो मंदिर में पंखा भी चढ़ाया जाता है। ये रिवायत बताती है कि यहां धर्म से पहले इंसानियत है। यही वजह है कि ये मेला दिल्ली की गंगा-जमुनी तहज़ीब की सबसे ख़ूबसूरत मिसाल माना जाता है।
अंग्रेज़ों का दौर और फूल वालों की सैर पर असर
1857 के बाद अंग्रेज़ों ने “डिवाइड एंड रूल” यानी बांटो और राज करो की नीति अपनाई। उन्हें लगा कि ये मेला लोगों को जोड़ता है, इसलिए इसे ख़त्म करना ज़रूरी है। इसी वजह से Phool Walon Ki Sair को बंद कर दिया गया। धीरे-धीरे इसकी रौनक कम हो गई और ये रिवायत थम सी गई। कई साल बाद 1961-62 में इस मेले को फिर से शुरू किया गया। इसमें सबसे बड़ा रोल योगेश्वर दयाल जी का था।
उन्होंने उस वक़्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिलकर कहा कि ये मेला सिर्फ़ एक त्योहार नहीं, बल्कि मोहब्बत और एकता का पैग़ाम है। पंडित नेहरू ने उनकी बात मानी और इस मेले को फिर से शुरू करने में मदद की। इसके बाद “अंजुमन सैर-ए-गुलफरोशां” नाम का एक ट्रस्ट बनाया गया, जो आज तक इस मेले को संभाल रहा है।

एक बेटी का वादा
योगेश्वर दयाल जी की बेटी ऊषा बताती हैं कि जब 1961 में मेला दोबारा शुरू हुआ, उसी साल उनकी शादी हो गई थी और वो जालंधर चली गई। लेकिन 1973 के वक़्त जब वो वापस आई, तो उन्होंने इस मेले से फिर से जुड़ना शुरू किया। उनके घर में Phool Walon Ki Sair की तैयारियां होती थी रिहर्सल, खाना, लोगों का आना-जाना पूरा माहौल किसी त्योहार जैसा होता था।
उन्होंने “मन्नत” नाम का एक नाटक भी तैयार किया, जिसे जहाज़ महल में पेश किया गया। ये बहुत यादगार रहा। 2006 में उनके पिताजी के इंतकाल से पहले उन्होंने उनसे वादा लिया कि ये मेला कभी बंद नहीं होगा। तब से वो हर साल इसे निभा रही हैं एक ज़िम्मेदारी की तरह, एक मोहब्बत की तरह।
एक दिन से हफ़्ते तक का सफ़र
“अंजुमन सैर-ए-गुलफरोशां” के वाइस प्रेसिडेंट विनोद वत्स बताते हैं कि शुरुआत में Phool Walon Ki Sair एक दिन का होता था। फिर इसे तीन दिन का किया गया एक दिन दरगाह, एक दिन मंदिर और एक दिन जहाज महल में बड़ा प्रोग्राम होता था। धीरे-धीरे ये मेला एक हफ्ते का हो गया। 1961 के बाद इसमें सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश के अलग-अलग राज्यों ने हिस्सा लेना शुरू किया। हर राज्य अपने-अपने पंखे लेकर आता है। राष्ट्रपति भवन से भी दो ख़ास पंखे भेजे जाते हैं एक दरगाह के लिए और एक योगमाया मंदिर के लिए।

मेले की शुरुआत बच्चों की ड्रॉइंग कंपटीशन से होती है, जिसमें आसपास के स्कूलों के बच्चे हिस्सा लेते हैं। उन्हें इनाम भी दिए जाते हैं। इसके बाद बड़े-बड़े मेहमान जैसे लेफ्टिनेंट गवर्नर, मुख्यमंत्री और दूसरे अफ़सरों को बुलाया जाता है। इस तरह ये मेला हर उम्र और हर वर्ग के लोगों को जोड़ता है। आज भी जब Phool Walon Ki Sair निकलती है, तो महरौली की फिज़ा फूलों की ख़ुशबू से भर जाती है। रंग-बिरंगे पंखे, सजी हुई चादरें और लोगों की भीड़ सब मिलकर एक ख़ूबसूरत मंज़र बनाते हैं। Phool Walon Ki Sair हमें याद दिलाता है कि असली ताकत मोहब्बत में है, साथ रहने में है।
Phool Walon Ki Sair सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक एहसास है, जो हर साल ज़िंदा होता है। ये हमें सिखाता है कि अगर दिलों में मोहब्बत हो, तो हर फर्क मिट सकता है। और शायद इसी लिए, जब भी ये सैर निकलती है, तो हर फूल एक कहानी कहता है मोहब्बत की, भाईचारे की, और उस दिल्ली की, जो आज भी सबको अपने दिल में जगह देती है।
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