केरल के उस कोने में जहां ज़मीन समंदर से हाथ मिलाती है और हरियाली अपने पांव पसारे है, वहां एक हुनर सदियों से सांस ले रहा है। ये हुनर है ‘कासरगोड’ (Kasaragod-The Art of Weaving Handloom Sarees) की हथकरघा साड़ियां बुनने की कला। ये महज़ एक परिधान नहीं, बल्कि एक रिवायत, एक अमानत है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हाथों-हाथ बुनी जा रही है।
इमेजिन, सुबह की पहली किरणें एक पुरानी बुनाई कोठी में आती हैं। वहां लकड़ी के करघों की खनक और थिरकन पूरी फिज़ा में रूहानियत भर देती है। बूढ़े दादा-दादी से लेकर नौजवान लड़के-लड़कियां, सब एक साथ बैठे हैं। उनकी उंगलियां मानो सुई-धागे से नहीं, बल्कि अपने बुज़ुर्गों की यादों, सपनों और थकानों को बुन रही हैं। ये महज़ एक काम नहीं, ये इबादत है।

वो चीज़ जो बाज़ार से नहीं, ‘दिल’ से ख़रीदी जाती है
आप बाज़ार में जितनी भी चमकीली मशीनी साड़ियां देख लें, वो उस नर्मी, उस कातिलाना कोमलता और सादगी की नज़ाकत को नहीं हरा सकतीं, जो कासरगोड की साड़ी के एक धागे में है। ये साड़ियं 60, 80 या 100 की बारीक ‘काउंट’ वाले सूती धागे से बुनी जाती हैं। पहले ये सिर्फ सूती होती थीं, गर्मी में ठंडी और रोज़ के लिए बेहद आरामदायक। लेकिन अब ज़माने के साथ-साथ इन कारीगरों ने भी चालाकी सीख ली है।
आज के दौर में यहां सूत में रेशम (Silk) का जामा पहनाया जाने लगा है। ख़ूबसूरत रंग, वात डाई (Chemical Dye) जो रंगों को उड़ने नहीं देती, और किनारों पर लटकता गोल्डन ज़री का जाल… ये सब कासरगोड की बुनाई को एक नई शान और पहचान दे रहा है। इतना कि इस साड़ी को Geographical Indication(GI) टैग मिल चुका है, यानी ये दुनिया में सिर्फ यहीं की अनमोल धरोहर है।

बस एक साड़ी नहीं, ‘दक्षिणी तहज़ीब’ का चेहरा
केरल के किसी भी त्योहार, शादी या किसी ख़ास मौके को देख लीजिए। यहां की हर औरत चाहे वो अमीर हो या गरीब, कासरगोड साड़ी को बड़े फ़ख्र से पहनती है। ये साड़ी ‘सस्ती’ नहीं, ‘क्योंकि वाजिब’ है और इसे पहनकर औरतें ऐसा कहती हैं मानो संस्कृति की नींव पर चल रही हैं।
लेकिन इस हुनर की कहानी बड़ी गहरी है। असलियत कुछ और ही है।
दिलचस्प कहानी: कहा जाता है कि इस कला की शुरुआत उस समय हुई जब मैसूर (कर्नाटक) के ‘पद्मशाली’ समुदाय के बुनकर यहां आकर बसे। शुरू में ये बुनकर सिर्फ कर्नाटक के राजाओं और राजघरानों की औरतों के लिए बुनते थे। ‘पद्मशाली’ शब्द आप सुनकर हैरान हो जाएंगे – ‘पद्म’ यानी कमल और ‘शाली’ यानी बुनकर। उनका मिथक है कि धागा भगवान के कमल से फूटा है यानी बुनाई दिव्य है।
चंद्रगिरी नदी के किनारे इन बुनकरों ने रियासती ठाट से लेकर आज के आम इंसान तक का सफर तय किया।

ज़माना बदला, करघा नहीं बदला
हालांकि मशीनों ने दस्तक दे दी है, लेकिन यहां के मास्टर कारीगर (जो अक्सर बूढ़े दादा-दादा हैं) अब वापस आ गए हैं। उनकी मजबूरी नहीं, उनका जज़्बा है। वो अपने धागे में अपनी हस्ती बुनते हैं। साल 1938 में बनी ‘Kasaragod Weavers Society’ आज भी इन्हें ख्वाबों की तरह सहेजे हुए है। यहां नए लोगों को तालीम दी जाती है और महीने की तनख्वाह भी दी जाती है।
हां, मजदूरी कम है। पहले जहां बुनकर 5 मीटर कपड़ा रोज़ बुन लेते थे, वो अब घंटों बैठकर मुश्किल से डेढ़ मीटर ही बुन पाते हैं। बावजूद इसके, वो रुकते नहीं। क्योंकि ये सिर्फ धागे नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों की विरासत को एक अनोखी तरह – Dobby Technique or Jacquard की मदद से बुन रहे हैं।

‘भगवान का घर’ है ये भूमि
ये ज़मीन यानी कासरगोड अकेले हुनर की नहीं, बल्कि अकीदत की भी ज़मीन है। यहां बेकल का किला है। जो समंदर के सीने पर छाती ताने खड़ा है। वलीयापरम्बा (Valiyaparamba) के बैकवॉटर हैं, मधुर विनायक मंदिर (Madhur Vinayak Temple) है और मलिक दीनार मस्जिद (Malik Dinar Mosque)। इसे ‘सप्त भाषा संगम भूमि’ (The Land of the Confluence of Seven Languages) कहा जाता है क्योंकि एक ही छत के नीचे सात ज़बानें बोली जाती हैं।
ये साड़ियां सिर्फ कपड़ा नहीं हैं, बल्कि उस तेज़ दौड़ती दुनिया के लिए एक पैग़ाम हैं कि – रुको, महसूस करो, और हाथों की सौंधी ख़ुशबू को अपने तन से लगाओ। ये करघे आज भी उम्मीद बुन रहे हैं कि ‘हाथ से बुना’ वो चीज़ है जो दिल तक सीधी जाती है, और जिसे मशीन कभी नहीं जीत सकती।
कासरगोड की ये साड़ी सिर्फ एक परिधान नहीं, बल्कि केरल की रूह है। ठंडी, कोमल और फिर भी मज़बूत।
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