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हुनर की मिसाल बने बबलू कुमार, PM Vishwakarma मंच पर बढ़ाया बिहार का गौरव

बिहार के गया ज़िले के रहने वाले बबलू कुमार एक कुशल शिल्पकार हैं। वे पिछले करीब 10 साल से लकड़ी की मूर्तियां बना रहे हैं। यह काम उनके परिवार की पहचान बन चुका है। बबलू कुमार अपने दो भाइयों के साथ मिलकर इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं। तीनों भाई मिलकर अलग-अलग तरह की देवी-देवताओं और महापुरुषों की मूर्तियां तैयार करते हैं।

परिवार के साथ जुड़ा हुनर

बबलू बताते हैं कि इस काम की शुरुआत उनके बड़े भाई ने की थी। उन्होंने अपने बड़े भाई को काम करते हुए देखा, सीखा और धीरे-धीरे खुद भी इस कला में माहिर हो गए। आज तीनों भाई एक टीम की तरह काम करते हैं। उनका कहना है कि किसी भी कला को सीखने में समय और धैर्य बहुत ज़रूरी होता है। मूर्ति बनाने का काम एक-दो साल में पूरी तरह नहीं सीखा जा सकता। इस काम में माहिर बनने के लिए कम से कम 10 साल का अनुभव चाहिए।

वे मुख्य रूप से लकड़ी की मूर्तियां बनाते हैं। पत्थर की मूर्तियां नहीं बनाते। ग्राहक की मांग के अनुसार वे शंकर जी, गणेश जी, दुर्गा जी, हनुमान जी जैसी देवी-देवताओं की मूर्तियां तैयार करते हैं। इसके अलावा अगर कोई ग्राहक किसी महापुरुष की मूर्ति बनवाना चाहे, जैसे महात्मा गांधी या किसी और का चेहरा, तो वह भी बना देते हैं। यानी वे लगभग हर तरह की लकड़ी की मूर्ति बनाने में सक्षम हैं।

कौन-कौन सी बनाते हैं मूर्तियां?

बबलू कुमार बताते हैं कि वे अलग-अलग साइज़ की मूर्तियां बनाते हैं। 12 इंच से लेकर 2 फीट और 3 फीट तक की मूर्तियां आम तौर पर बनाई जाती हैं। अब तक उन्होंने सबसे बड़ी 5 फीट की मूर्ति तैयार की है। वह मूर्ति भगवान बुद्ध की थी, जिसमें उन्हें तपस्या करते हुए दिखाया गया था। इस तरह की मूर्तियां बनाने में काफी समय, मेहनत और बारीकी की ज़रूरत होती है।

PM Vishwakarma मंच पर बबलू कुमार ने बढ़ाया बिहार का मान

एक मूर्ति बनाने में कितना समय लगेगा, यह उसके आकार और डिज़ाइन पर निर्भर करता है। छोटी मूर्ति दो दिन में बन सकती है, जबकि कुछ मूर्तियां पांच दिन या दस दिन भी ले सकती हैं। बड़ी और जटिल मूर्तियों में ज़्यादा मेहनत लगती है, इसलिए समय भी ज़्यादा लगता है। बबलू कहते हैं कि लकड़ी की सही कटाई, आकार देना और फिर फिनिशिंग करना सबसे अहम हिस्सा होता है। अच्छी फिनिशिंग से ही मूर्ति सुंदर और आकर्षक बनती है।

लागत और मुनाफ़ा

लकड़ी की कीमत भी अलग-अलग होती है। कभी 500 रुपये की लकड़ी मिल जाती है, तो कभी 5 हज़ार या 20 हज़ार रुपये तक की लकड़ी भी खरीदनी पड़ती है। यह लकड़ी की गुणवत्ता और साइज़ पर निर्भर करता है। एक मूर्ति बनाने में लागत 2 हज़ार रुपये से लेकर 10 हज़ार रुपये तक आ सकती है। साइज़ जितना बड़ा होगा, लागत उतनी ही ज़्यादा होगी।

मुनाफे़ की बात करें तो हर मूर्ति में कमाई अलग-अलग होती है। कभी 1 हज़ार या 1500 रुपये का फ़ायदा होता है, तो कभी 8 हज़ार रुपये तक का लाभ भी हो जाता है। यह पूरी तरह ग्राहक की मांग, मूर्ति के साइज़ और डिज़ाइन पर निर्भर करता है।

बबलू कुमार और उनके भाइयों को हाल ही में PM Vishwakarma Scheme के तहत 6 दिन का ट्रेनिंग भी मिली है। इस ट्रेनिंग के दौरान उन्हें आधुनिक तरीके और बेहतर तकनीक सिखाई गई। साथ ही उन्हें टूल किट भी दी गई, जिससे उनका काम और आसान हो गया है। वे मानते हैं कि इस तरह की योजनाएं कारीगरों के लिए बहुत मददगार हैं।

आज बबलू कुमार और उनके भाई अपने हुनर के दम पर परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ़ रोज़गार नहीं, बल्कि एक कला है, जिसे वे दिल से निभाते हैं। उनका सपना है कि आने वाली पीढ़ी भी इस कला को सीखे और इसे आगे बढ़ाए, ताकि लकड़ी की मूर्तियों की यह खूबसूरत परंपरा हमेशा जीवित रहे।

ये भी पढ़ें: मशहूर इतिहासकार प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब के साथ एक यादगार मुलाक़ात

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