कभी शाहजहांनाबाद थी, कभी सल्तनतों की शान, आज भी हर दौर का अक्स अपने दामन में रखती है। दिल्ली सिर्फ़ एक शहर नहीं, बल्कि सदियों की याददाश्त है। यहां की गलियों में तारीख़ बोलती है, इमारतों में तहज़ीब सांस लेती है और लोगों की ज़िंदगी में साझा विरासत झलकती है। इसी दिल्ली को एक अलग नज़र से पढ़ने और पढ़ाने का काम करते हैं सोहेल हाशमी- जिन्हें लोग “ओरल हिस्टोरियन” कहते हैं, लेकिन वो खुद को बस “दिल्ली का आदमी” मानते हैं।
बचपन, तालीम और दिल्ली से रिश्ता
सोहेल हाशमी की शुरुआती तालीम दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन के एक एक्सपेरिमेंटल नर्सरी स्कूल से शुरू हुई। फिर कुछ साल अलीगढ़ में गुज़रे। हायर सेकेंडरी के बाद उन्होंने किरोड़ीमल कॉलेज से बीए किया और आगे चलकर जेएनयू से जियोग्राफी पढ़ी। दिलचस्प बात ये है कि इतिहास में गहरी दिलचस्पी होने के बावजूद उन्होंने उसे बाकायदा सब्जेक्ट के तौर पर नहीं पढ़ा।
वो कहते हैं “हिस्टोरियन का तमगा लोगों ने दे दिया, मैंने कभी दावा नहीं किया।”
“Discover Delhi Walks” की शुरुआत
कहानी शुरू हुई बच्चों से। हाशमी दिल्ली में एक क्रिएटिव एक्टिविटी सेंटर चलाते थे। बातचीत में उन्हें एहसास हुआ कि बच्चे दिल्ली में रहते तो हैं, मगर अपने शहर को जानते नहीं। बस स्कूल और घर के बीच की दुनिया ही उनकी दिल्ली थी।
यहीं से “Discover Delhi Walks” की बुनियाद पड़ी। बच्चों को रिज़र्व फॉरेस्ट, रेल म्यूज़ियम, नेशनल म्यूज़ियम और पुराने खंडहरों में ले जाया जाने लगा। बच्चों ने घर आकर कहा “हमें ऐसी ही दिल्ली फिर दिखाइए।” फिर बड़े भी जुड़ गए। धीरे-धीरे यह वॉक्स मक़बूल हो गईं।
हाशमी के मुताबिक़, दिल्ली की सबसे बड़ी तब्दीली 1947 में आई। बंटवारे ने शहर की शक्ल बदल दी। लोग उजड़े, नई आबादियां बसीं, लहजे बदले, ख़ान-पान बदला। वह कहते हैं “1947 सिर्फ़ सियासी आज़ादी नहीं, दिल्ली की पहचान का नया जन्म था।” शाहजहांनाबाद, जो डेढ़-दो लाख लोगों के लिए बना था, आज थोक बाज़ारों का बोझ ढो रहा है। हवेलियां गोदाम बन गईं। अगर सच में इस शहर को बचाना है, तो कारोबार को शहर के बाहर शिफ्ट करना होगा।
दिल्ली “गंगा-जमुनी तहज़ीब” का आईना
दिल्ली को अक्सर “गंगा-जमुनी तहज़ीब” का आईना कहा जाता है। हाशमी इस जुमले को रोमांटिक मानते हैं। उनके मुताबिक तहज़ीब दो नदियों के नाम से नहीं बनती। वह बनती है रोज़मर्रा की साझेदारी से- कारीगरों, बुनकरों, सुनारों और मज़दूरों के रिश्तों से। “कल्चर कभी प्योर नहीं होता। अगर प्योर है, तो मरा हुआ है।”
उर्दू सफ़र करती हुई ज़बान
हाशमी बताते हैं कि जिसे आज हम हिंदी या उर्दू कहते हैं, वह सदियों की आवाजाही का नतीजा है। दिल्ली की हिंदवी गुजरात गई तो गुजरी बनी, दक्खिन पहुंची तो दक्कनी बनी। बाद में वही परिपक्व होकर लौटी। Wali Dakhni की शायरी जब दिल्ली पहुंची, तब लोगों को एहसास हुआ कि इस ज़बान में भी शायरी की ताक़त है।
शायरी में शहर
Mirza Ghalib, Mir Taqi Mir और Faiz Ahmed Faiz इन नामों का ज़िक्र आते ही दिल्ली का ज़िक्र होता है। 1857 की तबाही ग़ालिब के अशआर में झलकती है, मगर मीर के यहां शहर का उजड़ना-बचना एक ज़िंदा तजुर्बा बन जाता है। हाशमी कहते हैं “शायर अपने शहर की रूह साथ लेकर चलता है।”
क्या मीनार मस्जिद का हिस्सा नहीं थी?
Red Fort, Jama Masjid और Qutub Minar को “मुस्लिम आर्किटेक्चर” कहकर सीमित कर देना सही नहीं। उनके मुताबिक़ स्थापत्य का रिश्ता मौसम, सामग्री और तकनीक से है मज़हब से नहीं। कश्मीर और केरल की पुरानी मस्जिदों में न गुम्बद है, न मीनार क्योंकि कशमीर में बर्फ़ ज़्यादा गिरती है इस लिहाज़ से छत कोनिकल होती है। शाहजहां के वक़्त से पहले दिल्ली की किसी भी मस्जिद में मीनार नही है।
मिथक और हक़ीक़त
“जोधाबाई की रसोई” या “ताजमहल के कारीगरों के हाथ कटवाए गए”- ऐसी कहानियां इतिहास से ज़्यादा कल्पना को खुश करती हैं। हाशमी कहते हैं “हर बात को परंपरा के नाम पर सच मत मानिए, सवाल पूछिए।” जब उनसे सवाल किया गया “दिल्ली आपके लिए क्या मायने रखती है?” तो उन्होंने ठहर कर सिर्फ़ दो लफ़्ज़ कहे “मेरा शहर।”
इन दो शब्दों में उनकी पूरी फ़िक्र और फ़लसफ़ा समाया हुआ है। दिल्ली उनके लिए कोई दावा, बहस या नारा नहीं; एक जीता-जागता तजुर्बा है। यह वह जगह है जहां तहज़ीब किसी एक रंग में नहीं ढलती और ज़बान किसी एक ख़ाने में क़ैद नहीं होती। यहां सब कुछ मिलकर बना है ज़रूरतों से, रिश्तों की गर्माहट से, और संघर्षों की आंच से।
शायद यही दिल्ली की असली पहचान है। दरारें आईं, ज़माने बदले, चेहरे बदले-मगर शहर की रूह ने हर दौर की आवाज़ को अपने दामन में जगह दी। सदियों की यादें, तकलीफ़ें, ख़्वाब और कहानियां आज भी इसकी फ़िज़ा में गूंजती हैं। दिल्ली सिर्फ़ एक मुक़ाम नहीं, एक सिलसिला है जो चलता रहा है, और चलता रहेगा।
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