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रबींद्रनाथ टैगोर: राष्ट्रगान लिखने से लेकर नोबेल पुरस्कार तक का सफ़र

रबींद्रनाथ टैगोर का नाम आते ही ज़हन में एक ऐसी शख़्सियत की तस्वीर उभरती है, जिसने न सिर्फ़ कविताएं और कहानियां लिखी, बल्कि पूरी दुनिया के दिलों को छू लिया। उनका जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ। वो एक ऐसे परिवार में पैदा हुए जहां ज्ञान, कला और समाजसेवा की एक लंबी परंपरा थी। उनके पिता देबेंद्रनाथ टैगोर एक बड़े धार्मिक और समाज सुधारक थे।

रबींद्रनाथ ने बहुत कम उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था। आठ साल की उम्र में उन्होंने पहली कविता लिखी और जब वो सिर्फ़ 16 साल के थे, तब एक कहानी भी लिख डाली। सोचिए, इतनी कम उम्र में वो जो सोचते थे, उसे ख़ूबसूरत शब्दों में पिरो देते थे।

उनकी पढ़ाई भारत और इंग्लैंड दोनों जगहों पर हुई, लेकिन क्लास की पढ़ाई से ज़्यादा उन्हें जिंदगी से सीखना अच्छा लगता था। इसलिए उन्होंने कानून की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और साहित्य, संगीत और कला की तरफ़ अपना रुख किया। यही रास्ता उन्हें उस ऊंचाई तक ले गया, जहां से पूरी दुनिया ने उन्हें सराहा।

टैगोर ने बहुत सारी कविताएं, कहानियां और गीत लिखे। उनका संग्रह ‘मानसी’ 1890 में आया, जिसे उनकी परिपक्व लेखनी का उदाहरण माना जाता है। इस संग्रह में समाज की सच्चाई, जीवन की सुंदरता और मन की भावनाएं, सब कुछ साफ़ झलकता है।

1891 में वो पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) चले गए और वहां के गांवों में रहने लगे। वहां उन्होंने आम लोगों की ज़िंदगी को बहुत करीब से देखा और समझा। उनकी कई कहानियां और कविताएं इन्हीं अनुभवों पर आधारित हैं। गांवों की मिट्टी, नदी की लहरें और किसानों की मेहनत। ये सब उनकी रचनाओं में कहीं न कहीं दिखाई देती हैं।

रबींद्रनाथ टैगोर की यादगार तस्वीरें

भारत और बांग्लादेश राष्ट्रगान के रचयिता

टैगोर ने 2,000 से भी ज़्यादा गीत लिखे, जिन्हें आज ‘रवींद्र संगीत’ के नाम से जाना जाता है। ये गीत बंगाल के हर कोने में गाए जाते हैं और लोगों के दिलों से जुड़े हुए हैं। उनकी कविताओं में इतनी भावनाएं होती हैं कि जब हम उन्हें पढ़ते हैं, तो लगता है जैसे शब्दों के पीछे एक पूरा एहसास छुपा है। उनके लिखे हुए दो गीत, “जन गण मन” (भारत का राष्ट्रगान) और “आमार सोनार बांग्ला” (बांग्लादेश का राष्ट्रगान), एक महान  कवि बनाते हैं।

“जन गण मन-अधिनायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
पंजाब सिंधु गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंगा
बिंध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छलजलधितरंगा
तब शुभ नामें जागे तब शुभ आशीष माँगे,
गाहे तब जयगाथा।
जन गण मनअधिनायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे जय हे जय हे जय जय जय जय हे…..”

गीतांजलि और नोबेल पुरस्कार

उनका सबसे मशहूर कविता संग्रह गीतांजलि (Song Offerings) है, जिसे उन्होंने खुद अंग्रेज़ी में अनुवाद किया। इस किताब ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई और 1913 में उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। वो पहले एशियाई और पहले गैर-यूरोपीय लेखक थे जिन्हें ये सम्मान मिला।

_”Where the mind is without fear and the head is held high…”

ब्रिटिश नाइटहुड की उपाधि लौटाई

रबींद्रनाथ टैगोर सिर्फ़ कवि ही नहीं थे, वो एक शिक्षक, चित्रकार, संगीतकार और चिंतक भी थे। उन्होंने 1901 में शांतिनिकेतन में एक स्कूल शुरू किया, जहां बच्चे पेड़ों के नीचे बैठकर पढ़ते थे। उनका मानना था कि शिक्षा सिर्फ़ किताबों से नहीं, बल्कि प्रकृति और कला से भी मिलती है।

वो बहुत ही सच्चे और निडर इंसान थे। जब 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ, तब उन्होंने अंग्रेज़ों से मिली ‘नाइटहुड’ की उपाधि लौटा दी। ये दिखाता है कि उनके लिए सम्मान से ज़्यादा ज़रूरी इंसानियत और न्याय था।

टैगोर ने तीन देशों को दिया राष्ट्रगान 

क्या आप जानते हैं कि टैगोर ने तीन देशों को राष्ट्रगान दिए? भारत का ‘जन गण मन’, बांग्लादेश का ‘आमार सोनार बांग्ला’ और श्रीलंका का राष्ट्रगान भी उनकी प्रेरणा से जुड़ा है। ये एक ऐसा सम्मान है जो शायद ही किसी लेखक को मिला हो। श्रीलंका का जो नेशनल एंथम है, ‘श्रीलंका मथा’, वह भी टैगोर की रचना से प्रेरित है। श्रीलंका मथा लिखने वाले आनंद समरकून शांति निकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर के पास रहे थे। 

ज़िंदगी के आखिरी सालों में उन्होंने चित्र बनाना शुरू किया और उनकी पेंटिंग भी लोगों को उतनी ही पसंद आईं जितनी उनकी कविताएं। उनके जीवन में दुःख भी कम नहीं थे। उनकी पत्नी और बच्चों की मौत ने उन्हें बहुत तोड़ा, लेकिन उन्होंने अपने दर्द को शब्दों में ढालकर उसे सुंदर बना दिया।

रबींद्रनाथ टैगोर का देहांत 1941 में हुआ, लेकिन उनका लिखा हर शब्द, हर गीत और हर विचार आज भी ज़िंदा है। उनकी कविताएं सिर्फ़ पन्नों में बंद नहीं हैं, बल्कि हमारे दिलों में बसी हुई हैं।

जब हम ‘जन गण मन’ गाते हैं, या उनकी कोई कविता पढ़ते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे टैगोर आज भी हमारे साथ हैं। एक रोशनी की तरह, जो हमें रास्ता दिखा रही है।

ये भी पढ़ें: शायर-ए-इंक़लाब: जोश मलीहाबादी की ज़िंदगी और अदबी सफ़र

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