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गौस शेख़: हाथ नहीं, हौसले से बनाई अपनी नई पहचान

क्या आपने कभी सोचा है कि बिना हाथों के कोई अपनी ज़िंदगी के हर छोटे-बड़े काम को कैसे पूरा कर सकता है? महाराष्ट्र के लातूर ज़िले के महापुर गांव में रहने वाले गौस शेख़ ने अपनी ज़िंदगी से इस सवाल का जवाब दिया है। जन्म से ही बिना हाथों के पैदा हुए गौस ने अपनी हर कमी को अपनी ताकत में बदल दिया। वे न सिर्फ़ पैरों से ख़ूबसूरत पेंटिंग बनाते हैं, बल्कि रोजमर्रा के सभी काम पैरों से ही करते हैं।

गौस के लिए बचपन आसान नहीं था। जहां स्कूल के बाकी बच्चे अपनी कॉपियों में पेंसिल से लिखते थे, वहां गौस के लिए ये असंभव था। पर उनके माता-पिता और शिक्षकों ने हार नहीं मानी। उन्होंने गौस को पैर के अंगूठे से पेंसिल पकड़कर लिखना सिखाया। धीरे-धीरे, कड़ी मेहनत और लगन से गौस न सिर्फ़ लिखने में माहिर हो गए, बल्कि पढ़ाई में भी आगे बढ़ते गए।

पैरों से ब्रश पकड़कर बनाते हैं पेंटिंग

गौस शेख़ की लगन का नतीजा था कि उन्होंने 10वीं में 89% और 12वीं में 78% अंक हासिल किए। आज गौस स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, लातूर में आर्ट्स के छात्र हैं। उनका सपना है चार्टर्ड ऑफिसर बनना, और इसके लिए वे कड़ी मेहनत कर रहे हैं। उनकी पेंटिंग्स में सिर्फ़ रंग ही नहीं, उनकी ज़िंदगी के संघर्षों की कहानी भी झलकती है। गौस जब अपने पैरों से ब्रश पकड़ते हैं और कैनवास पर रंग भरते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे उनकी कला उनकी आवाज़ बन जाती है। गौस अपने माता-पिता को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं। गौस की कहानी सिर्फ़ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस जज़्बे की है जो हमें हर मुश्किल से लड़ने और आगे बढ़ने की ताकत देता है।

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