श्रीनगर के लाल बाज़ार की उमर कॉलोनी में एक छोटी-सी दुकान जहां लकड़ी सिर्फ़ लकड़ी नहीं रहती, बल्कि एहसास बन जाती है। जैसे ही आप अंदर कदम रखते हैं, लकड़ी पर बारीक नक़्क़ाशी और हर तरफ फैली कारीगरी आपको एक अलग ही दुनिया में ले जाती है। इसी दुकान में मंज़ूर अहमद बजाज एक ऐसे कारीगर, जिनके हाथों में हुनर है और दिल में अपनी विरासत को ज़िंदा रखने का जज़्बा।
मंज़ूर अहमद बजाज कश्मीरी वुड कार्विंग (wood carving) की कई पीढ़ियों पुरानी विरासत को संभाल रहे हैं। वो मशहूर शिल्प गुरु और नेशनल अवॉर्डी हाजी अब्दुल अज़ीज़ बजाज के बेटे हैं। बचपन से ही उन्होंने अपने घर में इस कला को पलते-बढ़ते देखा। पिछले 40 सालों से वो इस बारीक और सब्र मांगने वाली कला को पूरी मेहनत और लगन से निभा रहे हैं। ये उनके लिए सिर्फ़ रोज़गार नहीं, बल्कि एक पहचान है एक ऐसी पहचान, जो उन्हें अपने बाबा से विरासत में मिली।
पिता से मिली तालीम, सब्र से सीखा हुनर
मंज़ूर साहब बताते हैं कि वुड कार्विंग (wood carving) को सीखना आसान नहीं था। उन्होंने करीब 10-12 साल अपने बाबा के पास बैठकर सिर्फ़ देखा और समझा। उस दौर में हाथ से ज़्यादा दिमाग और नज़र काम करती थी। कैसे लकड़ी को काटना है, कैसे उसे साफ करना है, कैसे उस पर डिज़ाइन बनाना है और फिर औजारों से उसे एक ख़ूबसूरत शक्ल देनी है ये सब उन्होंने धीरे-धीरे सीखा।

उन्होंने DNN24 को बताया कि, “शुरुआत में मैं बस देखता था समझता था। बाबा के हाथ चलते थे और मैं हर हरकत को याद करता था। फिर एक दिन ऐसा आया जब मेरे अपने हाथ भी उसी रास्ते पर चलने लगे।” ये सीख सिर्फ तकनीक की नहीं थी, बल्कि सब्र, मेहनत और मोहब्बत की भी थी।
लकड़ी पर उभरती रूहानी तस्वीरें
आज मंज़ूर साहब की बनाई चीज़ों में सिर्फ़ डिज़ाइन नहीं, बल्कि एक एहसास होता है। उनकी कारीगरी में इस्लामिक आर्ट की झलक साफ दिखाई देती है। वो ख़ाने काबा, मदीना शरीफ़ और कुरान की आयतों की बारीक नक़्क़ाशी करते हैं। जब DNN24 की टीम उनसे मिलने पहुंची तो वो मदीना शरीफ़ का एक ख़ास पीस बना रहे थे, जिसे तैयार होने में करीब 3-4 महीने लगेंगे। हर लाइन, हर नक़्श को इतनी बारीकी से उकेरा जाता है कि देखने वाला बस उसमें खो जाता है। उनके हाथों से निकली हर कृति एक कहानी कहती है मोहब्बत की, आस्था की और मेहनत की।
मंज़ूर साहब के लिए वुड कार्विंग (wood carving) की सबसे बड़ी दौलत पैसा नहीं, बल्कि इज़्ज़त है। वो बताते हैं कि ख़ासकर बाहर के लोग वुड कार्विंग (wood carving) को बहुत पसंद करते हैं, क्योंकि ये पूरी तरह हाथ से बनाया जाता है। मशीन से बनी चीज़ों में वो रूह नहीं होती, जो हाथों से बनी चीज़ों में होती है। “जब कोई हमारे काम की तारीफ़ करता है, तो दिल को सुकून मिलता है,” वो कहते हैं। यही सुकून उन्हें हर दिन फिर से काम पर बैठने की ताक़त देता है।
बदलता दौर, बदलती पसंद
वक़्त के साथ इस हुनर में भी बदलाव आया है। पहले के दौर में बड़े-बड़े फर्नीचर-डाइनिंग टेबल, बेड, सोफा सेट पर बारीक नक़्क़ाशी होती थी। लेकिन अब लोगों की ज़रूरत और पसंद बदल चुकी हैं। आजकल छोटे-छोटे आइटम जैसे वॉल हैंगिंग, ड्राई फ्रूट ट्रे, सर्विंग ट्रे और गिफ़्ट आइटम ज़्यादा पसंद किए जाते हैं। लोग ऐसी चीज़ें चाहते हैं, जो ख़ूबसूरत भी हो और इस्तेमाल में भी आसान हो।
मंज़ूर साहब बताते हैं,“अब करीब 80 फीसदी काम कस्टमर की पसंद से होता है। वो बताते हैं कि डिज़ाइन कैसी हो, साइज़ क्या हो हम उसी के हिसाब से काम करते हैं।” यानी अब ये कला सिर्फ़ कारीगर की सोच तक सीमित नहीं, बल्कि कस्टमर की पसंद के साथ भी जुड़ गई है।

सबसे मुश्किल चेहरे की नक़्क़ाशी
वुड कार्विंग (wood carving) में सबसे नाज़ुक और मुश्किल काम होता है किसी चेहरे को बनाना। चाहे देवी-देवता हों या कोई इंसानी चेहरा, हर भाव को सही तरीके से दिखाना बहुत मुश्किल होता है। मंज़ूर साहब कहते हैं कि चेहरे की एक छोटी-सी गलती पूरी पीस का असर बदल सकती है। इसलिए इसमें बेहद बारीकी, धैर्य और अनुभव की ज़रूरत होती है। यही वजह है कि इस काम को सीखने में सालों लग जाते हैं।
इतनी ख़ूबसूरत कला होने के बावजूद मंज़ूर साहब के दिल में एक फिक्र भी है। वो कहते हैं कि आज की नई नस्ल इस हुनर से दूर होती जा रही है। “आजकल बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर बनना चाहते हैं। इस काम में दिलचस्पी कम हो गई है,” वो बताते हैं। एक वक़्त ऐसा भी आया था जब कोई सीखने नहीं आता था। लेकिन अब धीरे-धीरे कुछ बच्चे फिर से इस कला की तरफ लौट रहे हैं। फिर भी, ये रफ़्तार अभी बहुत धीमी है।
सीखने वालों के लिए खुला दरवाज़ा
वुड कार्विंग (wood carving) को ज़िंदा रखने के लिए मंज़ूर साहब खुद आगे आए हैं। वो कश्मीर हाट में अपनी दुकान पर 15 दिन की मुफ़्त ट्रेनिंग कोर्स देते हैं। जो भी सीखना चाहता है, वो आकर उनसे सीख सकता है। उन्होंने अब तक कई बच्चों को ये हुनर सिखाया है। कुछ बच्चे अपनी पढ़ाई के साथ-साथ घर में छोटा काम भी शुरू कर चुके हैं और अपनी रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं। उनके लिए ये सिर्फ़ सिखाना नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी है अपनी विरासत को आगे बढ़ाने की।

तालीम के साथ हुनर भी ज़रूरी
मंज़ूर साहब का मानना है कि सिर्फ़ किताबों की तालीम काफी नहीं है। वो कहते हैं, “बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ कोई हुनर भी सीखना चाहिए। अगर स्कूल में जैसे इंग्लिश और साइंस पढ़ाई जाती है, वैसे ही क्राफ्ट की भी क्लास हो, तो बच्चे बचपन से ही इसे सीख सकते हैं।” उनका मानना है कि अगर शुरुआत स्कूल से होगी, तो बच्चे इस कला को सिर्फ़ शौक नहीं, बल्कि करियर के तौर पर भी देख सकते हैं।
मंज़ूर अहमद बजाज की कहानी सिर्फ़ एक कारीगर की कहानी नहीं है, बल्कि एक पूरी विरासत की आवाज़ है। ये कहानी उनके सफ़र, उनके जुनून और उस उम्मीद को दिखाती है, जिसके ज़रीए वो वुड कार्विंग (wood carving) को ज़िंदा रखना चाहते हैं। उनका पैग़ाम साफ है “पढ़ाई के साथ-साथ कोई हुनर भी सीखो क्योंकि यही हुनर आपको अपने पैरों पर खड़ा करना सिखाता है।” और शायद इसी जज़्बे के साथ, उनकी उंगलियां आज भी लकड़ी में नई कहानियां तराश रही हैं ताकि आने वाली नस्लें सिर्फ़ इन्हें देखें ही नहीं, बल्कि इन्हें आगे भी बढ़ाएं।
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