हज़रत शेख़ अहमद फ़ारूक़ी सरहिंदी का नाम बहुत एहतराम से लिया जाता है। उन्हें “मुजद्दिद-ए-अल्फ़-ए-सानी” और “इमाम-ए-रब्बानी” के ख़िताब से याद किया जाता है। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी दीन की ख़िदमत, तसव्वुफ़ और समाज की इस्लाह के लिए वक़्फ़ कर दी।
इल्मी घराने में पैदाइश
शेख़ अहमद सरहिंदी की पैदाइश 26 मई 1564 ईस्वी को सरहिंद में हुयी थी। उनके वालिद शेख़ अब्दुल अहद एक मशहूर सूफ़ी और आलिम थे। शेख़ अहमद ने अपनी शुरुआती तालीम घर पर ही अपने वालिद से हासिल की।
बाद में उन्होंने सरहिंद, सियालकोट और अजमेर में कई उलेमा से इल्म हासिल किया। उन्होंने क़ुरआन, हदीस, फ़िक़्ह, तफ़्सीर, तर्क और दर्शन जैसे विषयों का गहराई से मुताला किया। कम उम्र में ही वे एक काबिल आलिम के तौर पर पहचाने जाने लगे।
दीन की इस्लाह का मिशन
शेख़ अहमद सरहिंदी का दौर मुग़ल बादशाह अकबर के ज़माने से जुड़ा था। उस समय धार्मिक मामलों में कई तरह के बदलाव और नए विचार सामने आ रहे थे। शेख़ अहमद ने लोगों को क़ुरआन और सुन्नत की बुनियादी तालीम की तरफ़ लौटने की दावत दी।
उनका मक़सद था कि लोग दीन को सही तरीके से समझें और ग़लत रस्मों और गैर-ज़रूरी बातों से बचें। इसी वजह से उन्हें मुजद्दिद-ए-अल्फ़-ए-सानी कहा गया, यानी दूसरे हज़ार साल में दीन की ताज़गी और इस्लाह करने वाला।
तसव्वुफ़ में उनका नज़रिया
शेख़ अहमद सरहिंदी नक़्शबंदी सिलसिले से जुड़े थे। उनके पीर हज़रत बाक़ी बिल्लाह देहलवी थे। उन्होंने तसव्वुफ़ को शरीअत से जोड़कर देखने पर ज़ोर दिया।
उनका मानना था कि तरीक़त और शरीअत एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। उनके नज़दीक सच्ची रूहानियत वही है जो क़ुरआन और सुन्नत की तालीम के मुताबिक़ हो।
उन्होंने वहदत-उल-वजूद की कुछ तशरीहात पर अपनी राय पेश की और वहदत-उश-शुहूद का विचार सामने रखा। उनका मक़सद तसव्वुफ़ की सही समझ को लोगों तक पहुंचाना था।
शेख़ अहमद सरहिंदी ने अपने दौर के उलेमा, सूफ़ियों, अमीरों और बादशाहों को बहुत से ख़त लिखे। इन ख़तों का मशहूर मजमूआ “मकतूबात-ए-इमाम-ए-रब्बानी” के नाम से जाना जाता है।
इन मकतूबात में दीन, तसव्वुफ़, अख़लाक़ और समाज की इस्लाह से जुड़े कई अहम ख़्यालात मिलते हैं। उनके ख़त आज भी उनके इल्मी और रूहानी फ़िक्र को समझने का अहम ज़रिया हैं।
बादशाह जहांगीर से मतभेद
बादशाह जहांगीर के दौर में शेख़ अहमद सरहिंदी को कुछ समय के लिए क़ैद भी किया गया। इसकी वजह उनके धार्मिक विचार और शाही दरबार से हुए मतभेद बताए जाते हैं।
क़ैद के बावजूद उन्होंने अपने उसूलों से समझौता नहीं किया। बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया और उनका असर पहले से भी ज़्यादा बढ़ गया।
लोगों को दिया सीधा पैग़ाम
शेख़ अहमद सरहिंदी लोगों को नमाज़, रोज़ा, शरीअत और अच्छे अख़लाक़ की तरफ़ बुलाते थे। उनका कहना था कि सिर्फ़ इल्म हासिल करना काफ़ी नहीं, बल्कि उस इल्म को अपनी ज़िंदगी और किरदार में भी उतारना ज़रूरी है।
उनकी तालीम का ख़ुलासा यही था कि शरीअत के बिना तरीक़त अधूरी है और सच्ची रूहानियत इंसान के अच्छे अमल और किरदार से ज़ाहिर होती है।
रौज़ा शरीफ़ आज भी अकीदत का मरकज़
10 दिसंबर 1624 ईस्वी को शेख़ अहमद सरहिंदी का इंतिक़ाल हुआ। उनका मज़ार सरहिंद में रौज़ा शरीफ़ के नाम से मशहूर है।
रौज़ा शरीफ़ आज भी नक़्शबंदी सिलसिले से जुड़े लोगों के लिए एक अहम रूहानी मरकज़ है। हर साल उनकी बरसी के मौक़े पर बड़ी तादाद में अकीदतमंद यहां पहुंचते हैं।
शेख़ अहमद सरहिंदी की ज़िंदगी इल्म, तसव्वुफ़, दीन की इस्लाह और रूहानी रहनुमाई की एक अहम मिसाल है। उनकी तालीम और मकतूबात आज भी लोगों को दीन, अख़लाक़ और रूहानियत की तरफ़ मुतवज्जेह करते हैं।
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