उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सिर्फ़ शायरी या लेखनी तक महदूद नहीं रहते, बल्कि पूरी एक ज़बान की रूह को संवारने में अपनी ज़िंदगी लगा देते हैं। शानुल हक़ हक़्क़ी उन्हीं चंद हस्तियों में से एक थे। 15 सितंबर 1917 को दिल्ली में जन्मे इस शख़्स ने आगे चलकर वो कारनामे अंजाम दिए जिनकी वजह से आज भी उर्दू पढ़ने-लिखने वाला हर शख़्स उनका एहसानमंद है चाहे वो शायरी का शौक़ीन हो या डिक्शनरी का इस्तेमाल करने वाला आम पाठक।
घर से मिली अदब की विरासत
हक़्क़ी साहब को अदब विरासत में मिला था। उनके वालिद एहतशामुद्दीन हक़्क़ी खुद एक क़ाबिल लेखक थे, जिन्होंने फ़ारसी शायर हाफ़िज़ शिराज़ी पर काम किया और बाबा-ए-उर्दू मौलवी अब्दुल हक़ की मशहूर लुग़त तैयार करने में मदद की। ज़ाहिर है, ऐसे माहौल में पले-बढ़े बच्चे के लिए अदब से दूर रहना मुमकिन ही नहीं था।
तालीम का सफ़र
पढ़ाई-लिखाई के मामले में हक़्क़ी साहब ने दो बड़े इदारों से फ़ैज़ हासिल किया। पहले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीए किया, फिर दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से अंग्रेज़ी अदब में एमए की डिग्री ली। दिलचस्प बात यह है कि उनकी बीवी सलमा हक़्क़ी भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की ही ग्रेजुएट थीं यानी अलीगढ़ का रिश्ता उनकी ज़िंदगी में गहरा जुड़ा रहा।
बंटवारे के बाद नया सफ़र
1947 की तक़सीम के बाद हक़्क़ी साहब सरहद पार पाकिस्तान चले गए, जहां उन्होंने भाषा और अदब के इदारों में बड़े ओहदों पर काम किया। यहीं उनकी असली पहचान बननी शुरू हुई।
शायरी में एक अलग रंग
उनकी शायरी में एक ख़ास तरह की सादगी और गहराई एक साथ नज़र आती है। उनका यह शेर आज भी दिलों को छूता है:
बड़ी तलाश से मिलती है ज़िंदगी ऐ दोस्त
क़ज़ा की तरह पता पूछती नहीं आती
‘तार-ए-पैराहन’ और ‘हर्फ़-ए-दिलरस’ जैसे शायरी के मजमुए इसी सादा मगर असरदार अंदाज़ की मिसाल हैं।
कोशकार के तौर पर बड़ा कारनामा
लेकिन हक़्क़ी साहब की सबसे बड़ी ख़िदमत शायद उनकी लुग़त-निगारी थी। 1958 से 1975 तक, यानी पूरे 17 साल, उन्होंने उर्दू डिक्शनरी बोर्ड के साथ मिलकर 22 जिल्दों की एक ज़बरदस्त उर्दू लुग़त तैयार की। इसके अलावा उन्होंने ‘फ़रहंग-ए-तलफ़्फ़ुज़’ नाम से एक उच्चारण डिक्शनरी भी बनाई, और मशहूर ऑक्सफ़र्ड इंगलिश-उर्दू डिक्शनरी को भी अपनी मेहनत से तैयार किया। यह काम आज भी उर्दू पढ़ने-लिखने वालों के लिए एक अनमोल तोहफ़ा है।
अनुवाद के मैदान में भी उनका काम बेमिसाल रहा। शेक्सपियर के ‘एंटनी एंड क्लियोपेट्रा’ से लेकर भगवद गीता और कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ तक, उन्होंने अलग-अलग ज़बानों और तहज़ीबों को उर्दू के क़रीब लाने का काम किया।
11 अक्टूबर 2005 को कनाडा के मिसिसॉगा में फेफड़ों के कैंसर की वजह से हक़्क़ी साहब इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। उस वक़्त वो अपनी बेटी के पास थे। उनके क़रीबी दोस्त इफ़्तिख़ार आरिफ़ ने उन्हें याद करते हुए कहा था कि हक़्क़ी साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी लफ़्ज़ों के सही इस्तेमाल और तलफ़्फ़ुज़ की दुरुस्ती के लिए वक़्फ़ कर दी थी।
शानुल हक़ हक़्क़ी सिर्फ़ एक शायर नहीं थे वो एक ऐसे मुहाफ़िज़ थे जिन्होंने उर्दू ज़बान की शीरीनी को नस्लों के लिए महफ़ूज़ रखा।
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