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नाज़िम: ग़ालिब के शागिर्द, रामपुर के नवाब और इश्क़ के शायर

नाज़िम उर्दू शायरी की दुनिया का एक ऐसा नाम है, जिसे सिर्फ़ एक शायर के तौर पर नहीं बल्कि अदब के सरपरस्त और शायरों के कद्रदान के रूप में भी याद किया जाता है। उनका असली नाम नवाब यूसुफ़ अली ख़ां था। उनकी पैदाइश 1816 में हुयी और वे रियासत रामपुर के नवाब बने। 19वीं सदी में जब दिल्ली का अदबी माहौल राजनीतिक उथल-पुथल और बदलावों से गुज़र रहा था, तब रामपुर उर्दू अदब का एक अहम केंद्र बनकर उभरा। इस अदबी माहौल को बनाने में नवाब यूसुफ़ अली ख़ां ‘नाज़िम’ का बहुत बड़ा योगदान था।

नाज़िम को शायरी का शौक़ बचपन से था। उन्होंने पहले मशहूर शायर Momin Khan Momin से इस्लाह ली और बाद में Mirza Ghalib के शागिर्द बने। यह बात अपने आप में उनकी अदबी हैसियत को बयान करती है। ग़ालिब जैसे महान शायर का शागिर्द होना किसी भी शायर के लिए बड़े फ़ख़्र की बात थी। ग़ालिब भी रामपुर के नवाब की इल्मी और अदबी समझ के क़ायल थे।

उनके दरबार में दिल्ली और लखनऊ के अनेक मशहूर शायर आते-जाते थे। यही वजह है कि उनकी शायरी में दिल्ली और लखनऊ दोनों स्कूलों के रंग दिखाई देते हैं। उनकी ग़ज़लों में इश्क़, तसव्वुफ़, रूहानियत, हुस्न और ज़िंदगी के नर्म एहसास बड़ी ख़ूबसूरती से सामने आते हैं।

नाज़िम की शायरी की सबसे बड़ी ख़ासियत उसकी सादगी और दिलकशी है। वे कठिन और उलझे हुए अल्फ़ाज़ों के बजाय आसान लेकिन असरदार भाषा का इस्तेमाल करते थे। उनकी शायरी में मोहब्बत भी है, रूहानियत भी और ज़िंदगी का फ़लसफ़ा भी।

“ये किस ज़ोहरा-जबीं की अंजुमन में आमद आमद है,
बिछाया है क़मर ने चांदनी का फ़र्श महफ़िल में।”

इस शेर में महबूब की आमद को इतने ख़ूबसूरत अंदाज़ में बयान किया गया है कि मानो चांद ने खुद उसकी ख़ातिर महफ़िल में चांदनी का फ़र्श बिछा दिया हो। 

“कहते हो सब कि तुझ से ख़फ़ा हो गया है यार,
ये भी कोई बताओ कि किस बात पर हुआ।”

इस शेर में आशिक़ की मासूमियत और हैरानी झलकती है। वह जानना चाहता है कि अगर महबूब नाराज़ है तो आख़िर वजह क्या है। नाज़िम की शायरी में सूफ़ियाना रंग भी दिखाई देता है। उनका यह शेर इसकी मिसाल है।

“वही माबूद है ‘नाज़िम’ जो है महबूब अपना,
काम कुछ हम को न मस्जिद से न बुत-ख़ाने से।”

यहां शायर इश्क़ को इबादत का दर्जा देता है और बताता है कि सच्ची मोहब्बत ही उसके लिए सबसे बड़ी बंदगी इबादत है।

ईद और मयख़ाने के प्रतीकों का इस्तेमाल भी उनकी शायरी में बड़ी ख़ूबसूरती से मिलता है। वे परंपरागत विषयों को नए अंदाज़ में पेश करते थे। यही वजह है कि उनके अशआर में एक तरफ़ रूहानियत है तो दूसरी तरफ़ ज़िंदगी की रंगीनियां भी।

उनकी रुबाइयों में भी गहरी सोच और एहसास मिलता है। एक रुबाई में वे कहते हैं कि अगर ज़ाहिर में महबूब हमदर्द दिखाई नहीं देता तो इसका मतलब यह नहीं कि उसके दिल में मोहब्बत नहीं है। यह इंसानी रिश्तों की बारीकियों को समझने वाली सोच को दर्शाता है।

नवाब यूसुफ़ अली ख़ां ‘नाज़िम’ सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि उर्दू अदब के एक बड़े सरपरस्त भी थे। उन्होंने ऐसे समय में शायरी और साहित्य की सरपरस्ती की, जब उर्दू अदब को नए सहारों की ज़रूरत थी। उनकी शायरी में रामपुर स्कूल की नफ़ासत, दिल्ली की फ़िक्र और लखनऊ की नज़ाकत एक साथ दिखाई देती है।

आज भी नाज़िम का नाम उर्दू अदब की तारीख़ में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी ग़ज़लें और रुबाइयां यह साबित करती हैं कि अच्छा शायर वही होता है जो अपने एहसास को सादगी और ख़ूबसूरती के साथ लोगों के दिलों तक पहुंचा दे। नाज़िम ने अपनी शायरी और अदबी सेवाओं के ज़रिए उर्दू साहित्य को जो विरासत दी, वह हमेशा याद रखी जाएगी।

ये भी पढ़ें: मियां दाद ख़ां सैयाह: उर्दू शायरी का मुसाफ़िर जिसने ज़िंदगी को सफ़र बना दिया    

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