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Mahmood Ahmad Shah की नज़र से कश्मीर का Handicraft सफ़र: 5,000 करोड़ की इंडस्ट्री की पूरी कहानी

कश्मीर की वादियां जितनी ख़ूबसूरत हैं, उतनी ही समृद्ध है यहां की Handicraft परंपरा। यहां के बारीक कढ़ाई वाले शॉल, लकड़ी पर नक़्क़ाशी, पेपर मेशे और कालीनों की बुनाई न सिर्फ़ भारत में, बल्कि दुनिया भर में फेमस हैं। इस अनोखी कारीगरी ने कश्मीर को एक अलग पहचान दी है। इसी कला की गहराई, संघर्ष के बारे में कश्मीर के हैंडिक्राफ्ट्स एंड हैंडलूम डिपार्टमेंट के पूर्व निदेशक रह चुके Mahmood Ahmad Shah ने DNN24 को जानकारी दी।

करीब 5,000 करोड़ की कश्मीरी Handicraft इंडस्ट्री

Mahmood Ahmad Shah ने DNN24 को बताया कि “कश्मीर में कुल सात GI टैग वाले क्राफ्ट्स हैं और आठ अन्य प्रमुख क्राफ्ट्स शामिल हैं। यानी कुल मिलाकर लगभग 15 बड़े क्राफ्ट्स हैं, जबकि 63 क्राफ्ट्स नोटिफाइड हैं। करीब 3.4 लाख आर्टिज़न सीधे तौर पर इस इंडस्ट्री जुड़े हैं। हर साल करीब 1,115 रूपये करोड़ का एक्सपोर्ट होता है और 2,500 से ज़्यादा रजिस्टर्ड मैन्युफैक्चरर्स इस फ़ील्ड का हिस्सा हैं।”

Mahmood Ahmad Shah बताते हैं कि सभी Handicraft जम्मू और कश्मीर के शोरूम में सेल होते है उसके अलावा अलग- अलग देशों में भी सेल किए जाते हैं। कश्मीर की Handicraft इंडस्ट्री करीब 5 हज़ार करोड़ रूपये की हो चुकी है। ये फ़ील्ड न सिर्फ़ राज्य की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करती है, बल्कि लाखों परिवारों की रोज़ी-रोटी का आधार भी है। कश्मीर के Handicraft की ख़ासियत ये है कि ये कला हज़ारों साल पुरानी विरासत है, जिसमें पश्मीना शॉल, कालीन, पेपर मैश, वॉलनट वुड कार्विंग, ख़तमबंद, कॉपरवेयर और ज़री वर्क जैसे कई फेमस प्रोडक्ट शामिल हैं।

सरकारी योजनाओं ने दी कारीगरों को नई ताकत

2020 में आई नई Handicraft नीति के बाद, डिपार्टमेंट ने कई आर्टिज़न-केंद्रित स्कीमें शुरू की हैं जैसे एक स्कीम के तहत जिसमें आर्टिज़न का ग्रुप बनाकर आर्थिक मदद दी जाती है। दूसरी “आर्टिज़न क्रेडिट कार्ड स्कीम” जिसमें आर्टिज़न को बैंक से क्रेडिट कार्ड दिलवाते हैं। तीसरी “एजुकेशन स्कीम” इसमें आर्टिज़न्स के बच्चों की एजुकेशन का खर्च डिपार्टमेंट उठाता है। चौथी “कारखानदार स्कीम” जिसमें राष्ट्रीय या राज्य पुरस्कार कारीगरों के कारखानों में युवाओं को ट्रेनिंग दी जाती है। पांचवीं “एक्सपोर्ट इंसेंटिव स्कीम” जिसमें GI सर्टिफ़ाइड प्रोडक्ट एक्सपोर्ट करता है तो उसे 10% का इंसेंटिव मिलता है।

GI टैग से मिली नई पहचान

Mahmood Ahmad Shah बताते हैं कि साल 2021 से डिपार्टमेंट ने QR कोड पर आधारित GI टैगिंग सिस्टम शुरू किया है। हर असली उत्पाद पर ये टैग लगाया जाता है, जिससे ग्राहक अपने स्मार्टफोन से उसे स्कैन कर प्रोडक्ट की ऑथेंटिसिटी जांच सकता है जैसे कालीन की नॉटेज, आकार, कारीगर का नाम और प्रोडक्ट कहां बनाया गया, की जानकारी मौजूद होती है। अगर कोई व्यापारी मशीन से बने उत्पाद को हस्तशिल्प बताकर बेचता है, तो उसके खिलाफ ब्लैकलिस्टिंग और जुर्माना लगाया जाता है।

2020 की नीति के बाद, साल 20221 में डिपार्टमेंट ने पश्मीना और कालीन के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) निर्धारित किया, ताकि कारीगरों को उनके प्रोडक्ट की सही कीमत मिल सके। श्रीनगर को यूनेस्को क्रिएटिव सिटी ऑफ क्राफ्ट्स, और वर्ल्ड क्राफ्ट सिटी का दर्जा मिला। इन पहलों ने कश्मीर की कला को इंटरनेशनल लेवल पर नई पहचान दिलाई है।

महिला कारीगरों की अहम भूमिका

आज डिपार्टमेंट के 435 ट्रेनिंग सेंटर में 20-20 ट्रेनर का औसत इंटेक है। इनमें से ज़्यादातर महिलाएं हैं, जो पारंपरिक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचा रही हैं। हर साल करीब 7,000 से 8,000 ट्रेनर यहां ट्रेनिंग लेते हैं। Mahmood Ahmad Shah बताते हैं कि अब डिपार्टमेंट की सभी योजनाएं ऑनलाइन हैं। हालांकि ये समझते हुए कि कई कारीगर तकनीकी रूप से प्रशिक्षित (trained) नहीं हैं, डिपार्टमेंट हर ज़िले में सहायता केंद्र चला रहा है, ताकि कोई भी आर्टिज़न आसानी से इन योजनाओं का फ़ायदा उठा सके।

परंपरा और नए दौर का संगम

Mahmood Ahmad Shah ने DNN24 को बताया कि, “हमने हमेशा कोशिश की है कि पारंपरिक कला को मॉडर्न बाज़ार से जोड़ा जाए। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन एग्ज़ीबिशन के ज़रिए आज दुनिया का हर कोना कश्मीरी कारीगरी से जुड़ सकता है।” डिजिटल मार्केटिंग और इंटरनेशनल एग्ज़ीबिशन ने इस इंडस्ट्री को नई ऊंचाइयां दी हैं। कारीगर अब सीधे कस्टमर तक पहुंच पा रहे हैं, जिससे उनके काम की सही कीमत मिल रही है।

कई युवाओं ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे Instagram और YouTube के ज़रिए अपनी कला को इंटरनेशनल लेवल तक पहुंचाया है। ये बदलाव इस बात का संकेत है कि अगर कला को सही दिशा और मंच मिले, तो ये आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है।

दुनियाभर में चमकता कश्मीर का हुनर

कश्मीरी Handicraft की मांग सिर्फ़ भारत में नहीं, बल्कि यूरोप, अमेरिका और मध्य एशिया तक फैली हुई है। पश्मीना शॉल, सिल्क कालीन, और पेपर माशे की वस्तुएं विदेशों में बेहद पसंद की जाती हैं। Mahmood Ahmad Shah ने बताया कि सरकार ने निर्यात प्रमोशन योजनाओं पर भी काम किया है ताकि कारीगरों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुंच मिले। उन्होंने कहा, “हमारा मक़सद हर कारीगर को ग्लोबल प्लेटफॉर्म मिले, जिससे कश्मीर की पहचान और मज़बूत हो।”

कश्मीर का हर कारीगर अपने हाथों से इतिहास गढ़ता है। एक पेपर मेशे कलाकार महीनों तक एक कलाकृति को पूरा करता है, एक पश्मीना बुनकर सैकड़ों धागों को जोड़कर एक शॉल तैयार करता है यही मेहनत कश्मीर की असली पहचान है। Mahmood Shah कहते हैं, “कश्मीरी Handicraft सिर्फ़ एक आर्ट नहीं, बल्कि भावनाओं, इतिहास और संस्कृति की ज़िंदा कहानी है। इसे बचाना, बढ़ाना और दुनिया तक पहुंचाना हम सबकी ज़िम्मेदारी है।”कश्मीरी Handicraft सामाजिक और आर्थिक नज़र से भी ज़रूरी है। ये न सिर्फ़ लाखों कारीगरों को रोज़गार देता है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता का गर्व भी है।

ये भी पढ़ें: Shikara: कश्मीर की झीलों पर तैरती Mohammad Rafiq की मेहनत, मोहब्बत और परंपरा की कहानी

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