सिख इतिहास कुर्बानियों, बहादुरी और शहादत की अनगिनत मिसालों से भरा हुआ है। धर्म की हिफ़ाज़त के लिए कई सिख योद्धाओं ने अपनी जान तक कुर्बान कर दी। महाराजा रणजीत सिंह जी के इंतकाल के बाद जब ईस्ट इंडिया कंपनी यानी अंग्रेज़ी हुकूमत ने चाल और साज़िशों के ज़रिए ख़ालसा राज पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश की, तो शिरोमणि पंथ अकाली बुद्धा दल और श्री अकाल तख़्त साहिब के जत्थेदारों ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग का बिगुल बजाया।
इन्हीं महान शहीदों में एक बड़ा नाम जत्थेदार Baba Hanuman Singh (बाबा हनुमान सिंह) जी का है। अमर शहीद बाबा हनुमान सिंह जी, शिरोमणि पंथ अकाली बुद्धा दल के 7वें जत्थेदार और श्री अकाल तख़्त साहिब जी के जत्थेदार थे। करीब 90 साल की उम्र में भी उन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ जंग लड़ी और हज़ारों सिंहों के साथ शहादत हासिल की। ये कहानी बाबा जी की ज़िंदगी, उनकी बहादुरी, डोगरा हुक्मरानों की ग़द्दारी और मोहाली के सोहाना में उनके शहीदी स्थल की अहमियत के बारे में बताती है।
Baba Hanuman Singh (बाबा हनुमान सिंह) जी की पैदाइश 18 नवंबर 1755 को फ़िरोज़पुर ज़िले के नरंग सिंह वाला गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार गरजा सिंह और माता का नाम माता हरनाम कौर था। बाबा जी का परिवार गुरसिख ज़िंदगी और शस्त्र विद्या से अच्छी तरह वाकिफ़ था। बचपन से ही बाबा जी को गुरबानी, निस्वार्थ सेवा और हथियारों की ट्रेनिंग में गहरी दिलचस्पी थी। आगे चलकर उन्होंने शिरोमणि पंथ अकाली बुद्धा दल में शामिल होकर ख़ालसा फौज की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।

सिख इतिहास के महान योद्धा और अकाली फौज के जांबाज़ नेता अकाली बाबा फूला सिंह जी ने 1823 में नौशहरा की जंग में शहादत हासिल की। बाबा फूला सिंह जी की शहादत के बाद ख़ालसा पंथ और बुद्धा दल ने बाबा हनुमान सिंह जी की क़ाबिलियत, दूरअंदेशी और जंगी हुनर को देखते हुए उन्हें 1823 में श्री अकाल तख़्त साहिब जी का जत्थेदार और बुद्धा दल का 7वां मुखी नियुक्त किया। महाराजा रणजीत सिंह जी के दौर में Baba Hanuman Singh (बाबा हनुमान सिंह) जी ने श्री अकाल तख़्त साहिब की मर्यादा को क़ायम रखने, पंथ की एकता बनाए रखने और ख़ालसा फौज के हौसले को बुलंद रखने में अहम किरदार निभाया।
महाराजा रणजीत सिंह जी का इंतकाल और डोगरों की साज़िश
शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह जी के इंतकाल के बाद लाहौर दरबार में अस्थिरता बढ़ने लगी। सिख राज के कुछ अंदरूनी हुक्मरानों और डोगरा सरदारों ने अपने निजी फ़ायदे के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी यानी अंग्रेज़ों के साथ गुप्त समझौता कर लिया। इनमें गुलाब सिंह डोगरा, मिसर लाल सिंह और तेज सिंह के नाम प्रमुख थे। ये लोग लाहौर दरबार की ख़ुफ़िया जानकारी और जंग से जुड़ी रणनीतियां अंग्रेज़ों तक पहुंचा रहे थे, ताकि ख़ालसा राज को कमज़ोर किया जा सके।
जब महारानी जिंद कौर को डोगरों की इस ग़द्दारी और अंग्रेज़ों की बढ़ती दख़लंदाज़ी का पता चला, तो उन्होंने ख़ालसा राज को बचाने के लिए सिख पंथ के बड़े योद्धाओं को ख़त लिखे।
महारानी जिंद कौर ने ख़ालसा पंथ के महान जनरल सरदार शाम सिंह अटारीवाला, शिरोमणि पंथ अकाली बुद्धा दल के 7वें जत्थेदार बाबा हनुमान सिंह जी और अमृतसर साहिब के दूसरे प्रमुख सिख सरदारों को ये ख़त भेजे। इन ख़तों में महारानी ने उनसे फ़ौरन आगे आने और अंग्रेज़ों की साज़िशों से ख़ालसा राज को बचाने की अपील की।

अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ पहली ख़ूनी जंग
महारानी जिंद कौर की अपील पर Baba Hanuman Singh (बाबा हनुमान सिंह) जी ने ख़ालसा राज की हिफ़ाज़त के लिए अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान किया। करीब 90 साल की उम्र में बाबा जी ने 32 हज़ार सिख सैनिकों यानी निहंग सिंहों की फौज के साथ अंग्रेज़ों का मुक़ाबला किया। इसे सिखों और अंग्रेज़ी हुकूमत के बीच हुई पहली सीधी और बेहद ख़ूनी जंगों में से एक बताया जाता है।
बाबा हनुमान सिंह जी की क़यादत में सिख फौज ने अंग्रेज़ों पर ज़ोरदार हमला किया। इस जंग में सिख योद्धाओं ने अपनी बहादुरी और जंगी हुनर का प्रदर्शन किया। बताया जाता है कि इस लड़ाई में 10 हज़ार से ज़्यादा अंग्रेज़ सैनिक मारे गए। निहंग सिंहों की बहादुरी और उनकी गुरिल्ला जंग की रणनीति से अंग्रेज़ अफ़सर भी हैरान और ख़ौफ़ज़दा हो गए।
पटियाला के महाराजा की ग़द्दारी और ‘निहंग सिंहां दी ढाब’ की दर्दनाक दास्तान
अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग लड़ते हुए बुद्धा दल की फौज ‘निहंग सिंहां दी ढाब’ यानी एक तालाब के पास पहुंची, जो पटियाला के नज़दीक था। उस वक़्त पटियाला के महाराजा करम सिंह अंग्रेज़ों के साथ मिलकर काम कर रहे थे। उन्होंने सिख पंथ के साथ ग़द्दारी करते हुए अंग्रेज़ी फौज का साथ दिया और बुद्धा दल के सिंहों पर अचानक तोपों से हमला करवा दिया।
इस अचानक हुए हमले में 15 हज़ार से ज़्यादा सिखों की शहादत हुई।
कहा जाता है कि इन शहीद सिंहों की अंगिठा आज भी पटियाला के गुरुद्वारा श्री दुख निवारण साहिब में पवित्र ज्योति के नीचे मौजूद है। ये जगह सिखों की कुर्बानी और उस दौर की ग़द्दारी की कहानी की गवाह मानी जाती है। पटियाला में हुए इस बड़े नुक़सान के बावजूद बाबा हनुमान सिंह जी का हौसला कम नहीं हुआ। बचे हुए सिख योद्धाओं को साथ लेकर बाबा जी अंग्रेज़ों से लगातार जंग करते हुए मजरी (कराला) की तरफ़ बढ़े। यहां अंग्रेज़ी फौज ने सिखों को चारों तरफ़ से घेरने की कोशिश की।
इसी दौरान अंग्रेज़ों की तरफ़ से दागा गया एक तोप का गोला जत्थेदार बाबा हनुमान सिंह जी को लगा और वो बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए। लेकिन ज़ख़्मी होने के बाद भी बाबा जी ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने उसी हालत में दुश्मन का मुक़ाबला जारी रखा। अपने बचे हुए निहंग सिंहों के साथ बाबा जी राजपुरा होते हुए सोहाना पहुंचे। अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आख़िरी और बेहद भयानक जंग सोहाना की धरती पर हुई।

उस वक़्त Baba Hanuman Singh (बाबा हनुमान सिंह) जी की उम्र करीब 90 साल थी। शरीर पर तोप के गोलों और गोलियों के गहरे ज़ख़्म थे, लेकिन बाबा जी दोनों हाथों में दो-धारी खंडा लेकर जंग करते रहे। आख़िरकार इसी पवित्र धरती पर Baba Hanuman Singh (बाबा हनुमान सिंह) जी ने हज़ारों शहीद सिंहों के साथ शहादत हासिल की और सिख इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गए।
आज उसी पवित्र जगह पर, जहां अमर शहीद Baba Hanuman Singh (बाबा हनुमान सिंह) जी ने शहादत हासिल की थी, गुरुद्वारा सिंह शहीदां सोहाना साहिब (मोहाली) पूरी शान के साथ मौजूद है। ये गुरुद्वारा दुनिया भर के सिखों के लिए बेहद अकीदत और आस्था का मरकज़ है। हर साल बाबा हनुमान सिंह जी और उनके साथ शहीद हुए हज़ारों सिंहों की याद में यहां ख़ास शहीदी समागम करवाए जाते हैं। लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचकर शहीदों के आगे सिर झुकाते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं।
Baba Hanuman Singh (बाबा हनुमान सिंह) जी की शहादत सिख इतिहास का एक अहम सफ़हा है। उनकी ज़िंदगी हमें बताती है कि 90 साल की उम्र में भी, जब आम तौर पर इंसान का जिस्म कमज़ोर होने लगता है, बाबा जी ने घोड़े पर सवार होकर अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ जंग लड़ी। 1857 के विद्रोह से पहले ही बाबा हनुमान सिंह जी की क़यादत में सिखों ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग लड़ी थी। पटियाला के राजा और लाहौर के डोगरा हुक्मरानों की ग़द्दारी ये भी दिखाती है कि अपनों की ग़द्दारी से किसी पूरे मुल्क और क़ौम को कितना बड़ा नुक़सान हो सकता है।
श्री अकाल तख़्त साहिब के जत्थेदार और अमर शहीद Baba Hanuman Singh (बाबा हनुमान सिंह) जी की कुर्बानी सिख क़ौम की एक अनमोल विरासत है। उन्होंने ख़ालसा राज की शान, श्री अकाल तख़्त साहिब की इज़्ज़त और पंथ की आज़ादी के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। बाबा जी और उनके साथ शहीद हुए हज़ारों सिंहों की कुर्बानी को आने वाली नस्लें हमेशा सलाम करेंगी। सोहाना साहिब में बना ये शहीदी अस्थान आने वाली पीढ़ियों को अपनी विरासत, कुर्बानी और इज़्ज़त पर फ़ख़्र करना सिखाता रहेगा।
लेख: सविंदर कौर
इस लेख को पंजाबी और अंग्रेज़ी में पढ़ें
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