ओडिशा का संबलपुरी बांधा (इकत) केवल एक साड़ी नहीं, बल्कि धागों पर लिखी गई एक ऐसी नज़्म है जिसे बुनकर अपनी रूह से लिखते हैं। ये वेस्टर्न ओडिशा की वो कारीगरी है जिसमें रंग और डिज़ाइन कपड़े पर नहीं, बल्कि बुनाई से पहले धागों में ही उतार दिए जाते हैं। इसीलिए इसे ‘बांधा’ कहते हैं, यानी बांधने की कला, जहां धागों को बांधकर, रंगकर, फिर खोलकर बुना जाता है।
तारीख़ की गहराई में
इस कला की जड़ें बहुत पुरानी हैं। कहा जाता है कि 14वीं सदी के मध्य में पटनागढ़ के चौहान शासक रामाई देव ने रायपुर (मध्य प्रदेश) से सौ से ज़्यादा बुनकर परिवारों को यहां बसाया था। लेकिन खंडगिरि की गुफाओं के पत्थरों पर मिले शिलालेख बताते हैं कि इस इलाक़े में बुनाई की कला ईसा पूर्व 600 साल पहले भी मौजूद थी। यानी जब दुनिया कई हुनरों को तराश भी नहीं पाई थी, ओडिशा के कारीगर रंगों को धागों में पिरोना जान चुके थे।

बाक़ी इकत से जुदा पहचान
दुनिया में इकत कई जगह बुना जाता है, लेकिन संबलपुरी की बात ही और है। यहां डिज़ाइन सिर्फ़ geometrical नहीं होते। यहां शंख, फूल, मछली, लता, मंदिर, हंस जैसे नाज़ुक और मुड़े-तुड़े नक़्शे बनते हैं। रंगों की आपसी आमेज़िश से एक ऐसी चमक पैदा होती है जैसे इंद्रधनुष धागों में उतर आया हो। फूलों और जानवरों के मोटिफ़्स में शेडिंग का अंदाज़ इसे और भी ख़ास बनाता है। यहां तक कि फ़िश मोटिफ़ को सिर्फ़ सजावट नहीं, बल्कि सौभाग्य, प्योर और ख़ुशहाली का प्रतीक माना जाता है। जैसे मछली की आंखें कभी बंद नहीं होतीं, वैसे ही गृहिणी की नज़र हमेशा अपने घर पर रहती है।
बुनाई का जादू: डबल इकत
संबलपुरी बांधा की सबसे बड़ी ख़ासियत है इसकी डबल इकत तकनीक। इसमें वार्प (ताना) और वेफ़्ट (बाना) दोनों धागों को बुनाई से पहले बांधा और रंगा जाता है। फिर जब ये धागे करघे पर मिलते हैं, तो नक़्शा बिल्कुल सधा हुआ, बिना किसी गड़बड़ के उभरता है। सबसे मशहूर पैटर्न है डबल इकत चेकरबोर्ड, जो बुनकर की महारत का सबूत है। एक नाज़ुक साड़ी बुनने में 4 से 8 दिन लगते हैं, जबकि किसी भारी सिल्क वाली चीज़ में महीनों का वक़्त जाता है।

रंग, रिवाज और रोज़गार
शुरुआत में ये साड़ियां ख़ास मौक़ों, पूजा-पाठ और त्योहारों के लिए बुनी जाती थीं। 1980 के दशक में जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इन्हें अपनाया, तो संबलपुरी साड़ी नेशनल पहचान बन गई। दूरदर्शन की न्यूज़रीडर तक इसे पहनने लगीं। आज ये जियोग्राफ़िकल इंडिकेशन (GI) के तहत रजिस्टर्ड है , और हज़ारों बुनकर परिवारों की रोज़ी-रोटी का ज़रिया भी।
भुलिया, कोष्ठा और पटारा जैसी बुनकर बिरादरियां पीढ़ियों से ये हुनर सहेज रही हैं। हर साड़ी में सब्र, सटीकता और ओडिशा की सांस्कृतिक आन-बान-शान बसी होती है। यही वजह है कि संबलपुरी बांधा आज भी भारत की सबसे कीमती हस्तनिर्मित विरासतों में शुमार है। एक ऐसी विरासत जो हर धागे में एक कहानी, हर रंग में एक रिवाज़ और हर नक़्शे में एक दुआ लिए हुए है।
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